महाभारतम्-02-सभापर्व-090

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भौमवचनम्।। 1।। विकर्णवचनम्।। 2।। दुःशासनेन द्रौपदीवस्त्रापहारः।।3।। श्रीकृष्णप्रसादात् द्रौपद्यः वस्त्रराशिप्रादुर्भावः।। 4।। विदुरवचनम्।। 5।।

भीम उवाच। 2-90-1x
भवन्ति गेहे बन्धक्यः कितवानां युधिष्ठिर।
भवन्ति दीव्यन्ति दया चैवास्ति तावस्वपि।।
2-90-1a
2-90-1b
काश्यो यद्धनमाहार्षीद्द्रव्यं यच्चान्यदुत्तमम्।
तथाऽन्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन्।।
2-90-2a
2-90-2b
वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि च।
राज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परैः।।
2-90-3a
2-90-3b
न च मे तत्र कोपोऽभूत्सर्वस्येशो हि नो भवान्।
इमं त्वतिक्रमं मन्यो द्रौपदी यत्र पण्यते।।
2-90-4a
2-90-4b
एषा ह्यनर्हती बाला पाण्डवान्प्राप्य कौरवैः।
त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः।।
2-90-5a
2-90-5b
अस्याः कृते मन्युरयं त्वयि राजन्निपात्यते।
बाहू ते सम्प्रधक्ष्यामि सहदेवाग्निमानयः।।
2-90-6a
2-90-6b
अर्जुन उवाच। 2-90-7x
न पुरा भीमसेन त्वमीदृशीर्वदिता गिरः।
परैस्ते नाशितं नूनं नृशंसैर्धर्मगौरवम्।।
2-90-7a
2-90-7b
न सकामाः परो कार्या धर्ममेवाचरोत्तमम्।
भ्रातरं धार्मिकं ज्येष्ठं कोऽतिवर्तितुमर्हति।।
2-90-8a
2-90-8b
आहूतो हि परै राजा क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्।
दीव्यते परकामेन तन्नः कीर्तिकरं महत्।।
2-90-9a
2-90-9b
भीमसेन उवाच।। 2-90-10x
एवमस्मिन्कृतं विद्यां यदि नाहं धनञ्जय।
दीप्तेऽग्नौ सहितौ बाहू निर्दहेयं बलादिव।।
2-90-10a
2-90-10b
वैशम्पायन उवाच।। 2-90-11x
तथा तान्दुः खितान्दृष्ट्वा पाण्डवान्धृतराष्ट्रजः।
कृष्यमाणां च पाञ्चालीं विकर्ण इदमब्रवीत्।।
2-90-11a
2-90-11b
याज्ञसेन्या यदुक्तं तद्वाक्यं विब्रूत पार्थिवाः।
अविवेकेन वाक्यस्य नरकः सद्य एव नः।।
2-90-12a
2-90-12b
भीष्मश्च धृतराष्ट्रश्च कुरुवृद्धतमावुभौ।
समेत्य नाहतुः किञ्चिद्विदुरश्च महामतिः।।
2-90-13a
2-90-13b
भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्यः कृप एव च।
कुत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ।।
2-90-14a
2-90-14b
ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतोदिशम्।
कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते ब्रुवन्तु यथामति।।
2-90-15a
2-90-15b
यदितं द्रौपदी वाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा।
विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा वदतोत्तरम्।।
2-90-16a
2-90-16b
वाशम्पायन उवाच।। 2-90-17x
एवं स बहुशः सर्वानुक्तवांस्तान्सभासदः।
न च ते पृथिवीपालास्तमूचुः साध्वसाधु वा।।
2-90-17a
2-90-17b
उक्त्वाऽसकृत्तथा सर्वान्विकर्णः पृथिवीपतीन्।
पाणौ पाणिं विनिष्पिष्य निःश्वसन्निदमब्रवीत्।।
2-90-18a
2-90-18b
विब्रूत पृथिवीपाला वाक्यं मा वा कथञ्चनि।
मन्ये न्याय्यं यदत्राहं तद्वि वक्ष्यामि कौरवाः।।
2-90-19a
2-90-19b
चत्वार्याहुर्नश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम्।
मृगयां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिरक्तताम्।।
2-90-20a
2-90-20b
एतेषु हि नरः सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते।
यथाऽयुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते।।
2-90-21a
2-90-21b
तथेयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम्।
समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपणः।।
2-90-22a
2-90-22b
साधारणी च सर्वेषां पाण्डवानामनिन्दिता।
जितेन पूर्वं चानेन पाण्डवेन कृतः पणः।।
2-90-23a
2-90-23b
इयं च कीर्तिता कृष्णा सौबलेन पणार्थिना।
एतत्सर्वं विचार्याहं मन्ये न विजितामिमाम्।।
2-90-24a
2-90-24b
वैशम्पायन उवाच।। 2-90-25x
एतच्छ्रुत्वा महान्नादः सभ्यानामुदतिष्ठत।
विकर्णं शंसमानानां सौबलं चापि निन्दताम्।।
2-90-25a
2-90-25b
तस्मिन्नुपरते शब्दे राधेयः क्रोधमूर्छितः।
प्रगृह्य रुचिरं बाहुमिदं वचनमब्रवीत्।।
2-90-26a
2-90-26b
कर्ण उवाच।। 2-90-27x
दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि बहून्यपि।
तज्जातस्तद्विनाशाय यथाऽग्निररणिप्रजः।।
2-90-27a
2-90-27b
एते न किञ्चिदप्याहुश्चोदिता ह्यपि कृष्णया।
धर्मेण विजितामेतां मन्यन्ते द्रपदात्मजाम्।।
2-90-28a
2-90-28b
त्वं तु केवलबाल्येन धार्तराष्ट्र विदीर्यसे।
यद्ब्रवीषि सभाम्ध्ये बालः स्थविरभाषितम्।।
2-90-29a
2-90-29b
न च धर्म यथावत्त्वं कृष्णां च जितेति सुमन्दधीः।
यद्ब्रवीषि जितां कृष्णां न जितेति सुमन्दधीः।।
2-90-30a
2-90-30b
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज।
यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान्पाण्डवाग्रजः।।
2-90-31a
2-90-31b
अभ्यन्तर च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ।
एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम्।।
2-90-32a
2-90-32b
कीर्तिता द्रौपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवैः।
भवत्यविजिता केन हेतुनैषा मता तव।।
2-90-33a
2-90-33b
मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम्।
अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तमम्।।
2-90-34a
2-90-34b
एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरुनन्दन।
इयं त्वनेकवशगा बन्धकीति विनिश्चिता।।
2-90-35a
2-90-35b
अस्याः सभामानयनं न चित्रमिति मे मतिः।
एकाम्बरधरत्वं वाऽप्यथवाऽपि विवस्त्रता।।
2-90-36a
2-90-36b
यच्चैषां द्रविणं किञ्चिद्य चैषा ये च पाण्डवाः।
सौबलेनेह तत्सर्वं धर्मेण विजितं वसु।।
2-90-37a
2-90-37b
दुःशासन सुबालोऽयं विकर्णः प्राज्ञवादिकः।
पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर।।
2-90-38a
2-90-38b
वैशम्पायन उवाच।। 2-90-39x
तच्छ्रुत्वा पाण्डवाः सर्वे स्वानि वासांसि भारत।
अवकीर्योत्तरीयाणि सभायां समुपाविशन्।।
2-90-39a
2-90-39b
ततो दुःशासनो राजन्द्रौपद्या वसनं बलात्।
सभामध्ये सभाक्षिप्य व्यपाक्रष्टुं प्रचक्रमे।।
2-90-40a
2-90-40b
`आकृष्यमाणे वसने विललाप सुदुःखिता।
ज्ञातं मया विसिष्ठेन पुरा गीतं महात्मना।।
2-90-41a
2-90-41b
महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान्हरिः।
इति निश्चित्य मनसा शरणागतवत्सलम्।
आकृष्यमाणे वसने द्रौपदी कृष्णमस्तरत्।।
2-90-42a
2-90-42b
2-90-42c
शङ्खचक्रगदापाणे द्वारकानिलयाच्युत।
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रक्ष मां शरणागताम्।।
2-90-43a
2-90-43b
हा कृष्ण द्वारकावासिन्क्वासि यादवन्दन।
इमामवस्थां सम्प्राप्तामनाथां किमुपेक्षसे।।
2-90-44a
2-90-44b
गोविन्द द्वारकावासिन्कृष्ण गोपीजनप्रिय।
कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव'।।
2-90-45a
2-90-45b
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।
कौरवार्णवग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन।।
2-90-46a
2-90-46b
कृष्णकृष्ण महायोगिन्विश्वात्मन्विश्व्भावन।
प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरमध्येऽवसीदतीम्।।
2-90-47a
2-90-47b
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम्।
प्रारुदद्दुः खिता राजन्मुखमाच्छाद्य भामिनी।।
2-90-48a
2-90-48b
तस्य प्रसाद्द्रौपद्याः कृष्णमाणेऽम्बरे तदा।
तद्रूपमपरे वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः।।
2-90-49a
2-90-49b
नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो।
प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात्।।
2-90-50a
2-90-50b
ततो हलहलाशब्दस्तत्रासीद्घोरदर्शनः।
तदद्भुततमं लोके वीक्ष्य सर्वे महीभृतः।।
2-90-51a
2-90-51b
शशंसुर्द्रौपदीं तत्र कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम्।
`धिग्धिगित्यशिवां वाचमुत्सृजन्कौरवान्प्रति'।।
2-90-52a
2-90-52b
यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः'।
तदा दुःशासनः श्रान्तो व्रीडितः समुपाविशत्
2-90-53a
2-90-53b
शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये बृहत्स्वनः।
क्रोधाद्विस्फुरमाणौष्ठो विनिष्पिष्य करे करम्।।
2-90-54a
2-90-54b
भीम उवाच।। 2-90-55x
इदं मे वाक्यमादध्वं क्षत्रिया लोकवासिनः।
नोक्तपूर्वं नरैरन्यैर्न चान्यो यद्वदिष्यति।।
2-90-55a
2-90-55b
यद्येतदेवमुक्त्वाऽहं न कुर्यां पृथिवीश्वराः।
पितामहानां पूर्वेषां नाहं गतिमवाप्नुयाम्।।
2-90-56a
2-90-56b
अस्य पापस्य दुर्बुद्धेर्भारतापसदस्य च।
न पिबेयं बलाद्वक्षो भित्त्वा चेद्रुधिरं युधि।।
2-90-57a
2-90-57b
वैशम्पायन उवाच।। 2-90-58x
तस्य ते तद्वचः श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम्।।
प्रचक्रुर्बहुलां पूजां कुसन्तो धृतराष्ट्रजम्।।
2-90-58a
2-90-58b
न विब्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह।
सुजनः क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्रं विगर्हयन्।।
2-90-59a
2-90-59b
ततो बाहू समुक्षिप्य निवार्य च सभासदः।
विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत्।
2-90-60a
2-90-60b
विदुर उवाच। 2-90-61x
द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति त्वनाथवत्।
न च विब्रूत तं प्रश्नं सभ्या धर्मोऽत्र पीड्यते।।
2-90-61a
2-90-61b
सभां प्रपद्यते प्रश्नः प्रज्वलन्निव हव्यवाद्।
तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमयन्त्युत।।
2-90-62a
2-90-62b
धर्म्यं प्रश्नमतो ब्रूयादार्यः सत्येन मानवः।
विब्रूयुस्तत्र तं प्रश्नं कामक्रोधबलातिगाः।।
2-90-63a
2-90-63b
विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः।
भवन्तोऽपि हि तं प्रश्नं विब्रुवन्तु यथामति।।
2-90-64a
2-90-64b
यो हि प्रश्नं न विब्रूयाद्धर्मदर्शी सभां गतः।
अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते।।
2-90-65a
2-90-65b
यः पुनर्वितथं ब्रूयाद्धर्मदशीं सभां गतः।
अनृतस्य फलं कृत्स्नं स प्राप्नोतीति निश्चयः।।
2-90-66a
2-90-66b
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च।।
2-90-67a
2-90-67b
प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः।
कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत्।।
2-90-68a
2-90-68b
अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा।
तयोर्देवनमत्रासीत्प्राणयोरिति नः श्रुतम्।।
2-90-69a
2-90-69b
तयोः प्रश्नविवादोऽभूत्प्रह्लादं तावपृच्छताम्।
ज्यायान्क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृषा।।
2-90-70a
2-90-70b
स वै विवदनाद्भीतः सुधन्वानं विलोकयन्।
तं सुधन्वाब्रवीत्क्रुद्धो ब्रह्मदम्ड इव ज्वलन्।।
2-90-71a
2-90-71b
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि।।
शतघा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति।।
2-90-72a
2-90-72b
सुधन्वना तथोक्तः सन्व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत्।
जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम्।।
2-90-73a
2-90-73b
प्रह्लाद उवाच।। 2-90-74x
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च।
ब्राह्मणस्य महाभाग धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु।।
2-90-74a
2-90-74b
यो वै प्रश्नं न विब्रूयाद्वितथं चैव निर्दिशेत्।
के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः।।
2-90-75a
2-90-75b
कश्यप उवाच।। 2-90-76x
जानन्नविब्रुवन्प्रश्नान्कामात्क्रोधाद्भयात्तथा।
सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति।।
2-90-76a
2-90-76b
साक्षी वा विब्रुवन्साक्ष्यं गोकर्णशिथिलश्वरन्।
सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्जति।।
2-90-77a
2-90-77b
तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते।
तस्मात्सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमुञ्जसा।।
2-90-78a
2-90-78b
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते।
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः।।
2-90-79a
2-90-79b
अर्धं हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृषु।
पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम्।।
2-90-80a
2-90-80b
अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते।।
2-90-81a
2-90-81b
वितथं तु वदेयुर्ये धर्मं प्रह्लाद पृच्छते।
इष्टापूर्तं च ते घ्न्ति सप्तसप्त परावरान्।।
2-90-82a
2-90-82b
हृतस्वस्य हि यद्दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत्।
ऋणिनः प्रति यच्चैव स्वार्थाद्धष्टस्य चैव यत्।।
2-90-83a
2-90-83b
स्त्रियाः पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत्।
अपुत्रायाश्च यद्दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत्।।
2-90-84a
2-90-84b
अध्यूढायाश्च यद्दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत्।।
एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदिवेश्वराः।।
2-90-85a
2-90-85b
तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन्।
समक्षदर्शनात्साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात्।।
2-90-86a
2-90-86b
तस्मात्सत्यं ब्रुवत्साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते।
कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमब्रवीत्।।
2-90-87a
2-90-87b
श्रेयान्सुधन्वा त्वत्तो वै मत्तः श्रेयांस्तथाङ्गिराः।
माता सुधन्वाऽयं प्राणानामीश्वरस्तव।।
विरोचन सुधन्वाऽयं प्राणानामीश्वरस्तव।।
2-90-88a
2-90-88b
2-90-88c
सुधन्वोवाच। 2-90-89x
पुत्रस्नेहं पिरत्यज्य यस्त्वं धर्मे व्यवस्थितः।
अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेव शतं समाः।।
2-90-89a
2-90-89b
विदुर उवाच। 2-90-90x
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः।
यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम्।।
2-90-90a
2-90-90b
वैशम्पायन उवाच।। 2-90-91x
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किञ्चन पार्थिवाः।
कर्णो दुःशासनं त्वाह कृष्णं दासीं गृहान्नय।।
2-90-91a
2-90-91b
तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान्।
दुःशासनः सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम्।।
2-90-92a
2-90-92b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
द्यूतपर्वणि नवतितमोऽध्यायः।। 90।।

2-90-20 ग्राम्ये स्त्रीभोगी।।

2-90-41 आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्या चिन्तितो हरिः। गोविन्द द्वारकान्वासिन्कृष्ण गो पीजनप्रिय। कौरवैः परिभूतां मां किं ज जानासि केशव। इति झ.पाठः।। 2-90-77 गोकर्णशिथिल उभयक्षस्पर्शी।।

सभापर्व-089 पुटाग्रे अल्लिखितम्। सभापर्व-091
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