महाभारतम्-02-सभापर्व-014

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← सभापर्व-013 महाभारतम्
द्वितीयपर्व
महाभारतम्-02-सभापर्व-014
वेदव्यासः
सभापर्व-015 →


  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103

जरासन्धशौर्यकथनादिरूपं श्रीकृष्णवाक्यम्।।

कृष्ण उवाच।। 2-14-1x
सर्वैर्गुणैर्महाराज राजसूयं त्वमर्हसि।
जानतस्त्वेव ते सर्वं किञ्चिद्वक्ष्यामि भारत।।
2-14-1a
2-14-1b
जामदग्न्येन रामेण क्षत्रं यदवशेषितम्।
तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसंज्ञितम्।।
2-14-2a
2-14-2b
कृतोऽयं कलुसङ्कल्पः क्षत्रियैर्वसुधाधिप।
निदेशवाग्भिस्तत्तेह विदितं भरतर्षभ।।
2-14-3a
2-14-3b
ऐलस्येक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृतिं परिचक्षते।
राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथाऽन्ये क्षत्रिया भुवि।।
2-14-4a
2-14-4b
ऐलवंश्याश्च ये राजंस्तथैवेक्ष्वाकवो नृपाः।
तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ।।
2-14-5a
2-14-5b
ययातेस्त्वेव भोजानां विस्तरो गुणतो महान्।
भजतेऽद्य महाराज विस्तरं सचतुर्दिशम्।।
2-14-6a
2-14-6b
तेषां तथैव तां लक्ष्मीं सर्वक्षत्रमुपासते।
इदानीमेव वै राजञ्जरासन्धो महीपतिः।।
2-14-7a
2-14-7b
अभिभूय श्रियं तेषां कुलानामभिषेचितः।
स्थितो मूर्ध्नि नरेन्द्राणामोजसाऽऽक्रम्य सर्वशः।।
2-14-8a
2-14-8b
सोऽवनीं मध्यमां भुक्त्वा मिथो भेदममन्यत।
प्रभुर्यस्तु परो राजा यस्मिन्नेकवशे जगत्।।
2-14-9a
2-14-9b
स साम्राज्यं महाराज प्राप्तो भवति योगतः।
तं स राजा जरासन्धं संश्रित्य किल सर्वशः।।
2-14-10a
2-14-10b
राजन्सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान्।
तमेव च महाराज शिष्यवत्समुपस्थितः।।
2-14-11a
2-14-11b
वक्रः करूषाधिपतिर्मायायोधी महाबलः।।
अपरौ च महावीर्यौ महात्मानौ समाश्रितौ।।
2-14-12a
2-14-12b
जरासन्धं महावीर्यं तौ हिंसडिम्बिकावुभौ।
वक्रदन्तः करूषस्य करभो मेघवाहनः।
मूर्ध्ना दिव्यं मणिं बिभ्रद्यमद्भुतमणिं विदुः।।
2-14-13a
2-14-13b
2-14-13c
मरुं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः।
अपर्यन्तबलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा।।
2-14-14a
2-14-14b
भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा।
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः।।
2-14-15a
2-14-15b
स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद्भक्तिमांस्त्वयि।
प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः प्रति यो नृपः।।
2-14-16a
2-14-16b
मातुलो भवतः शूरः पुरुजित्कुन्तिवर्धनः।
स ते सन्नितिमानेकः स्नेहतः शत्रुसूदनः।।
2-14-17a
2-14-17b
जरासन्धं गतस्त्वेव पुरा यो न मया हतः।
पुरुषोत्तमविज्ञातो योसौ चेदिषु दुर्मतिः।।
2-14-18a
2-14-18b
आत्मानं प्रतिजानाति लोकेऽस्मिन्पुरुषोत्तमम्।
आदत्ते सततं मोहाद्यः स चिह्नं च मामकम्।।
2-14-19a
2-14-19b
वङ्गपुण्ड्रकिरातेषु राजा बलसमन्वितः।
पौण्ड्रको वासुदेवेति योसौ लोकेऽभिविश्रुतः।।
2-14-20a
2-14-20b
चतुर्थभाङ्महाराज भोज इन्द्रसखो बली।
विद्याबलाद्यो व्यजयत्स पाण्ड्यक्रथकैशिकान्।।
2-14-21a
2-14-21b
भ्राता तस्याकृतिः शूरो जामदग्न्यसमोऽभवत्।
स भक्तो मागधं राजा भीष्मकः परवीरहा।।
2-14-22a
2-14-22b
प्रियाण्याचरतः प्रह्वान्सदा सम्बन्धिनस्ततः।
भजतो न भजत्यस्मानप्रियेषु व्यवस्थितः।।
2-14-23a
2-14-23b
न कुलं सबलं राजन्नभ्यजानात्तथाऽऽत्मनः।
पश्यमानो यशो दीप्तं जरासन्धमुपस्थितः।।
2-14-24a
2-14-24b
उदीच्याश्च तथा भोजाः कुलान्यष्टादश प्रभो।
जरासन्धभयादेव प्रतीचीं दिशमास्थिताः।।
2-14-25a
2-14-25b
शूरसेना भद्रकारा बोधाः शाल्वाः पटच्चराः।
सुस्थलाश्च सुकुट्टाश्च कुलिन्दाः कुन्तिभिः सह।।
2-14-26a
2-14-26b
शाल्वायनाश्च राजानः सोदर्यानुचरैः सह।
दक्षिणा ये च पञ्चालाः पूर्वाः कुन्तिषु कोसलाः।।
2-14-27a
2-14-27b
तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भयार्दिताः।
मत्स्याः सन्न्यस्तपादाश्च दक्षिणां दिशमाश्रिताः।।
2-14-28a
2-14-28b
तथैव सर्वपञ्चाला जरासन्धभायर्दिताः।
स्वराज्यं सम्परित्यज्य विद्रुताः सर्वतोदिशम्।।
2-14-29a
2-14-29b
`अग्रतो ह्यस्य पाञ्चालास्तत्रानीके महात्मनः।
अनिर्गते सारबले मागधेभ्यो गिरिव्रजात्।।
2-14-30a
2-14-30b
उग्रसेनसुतः कंसः पुरा निर्जित्य बान्धवान्'।
बार्हद्रथसुते देव्यावुपागच्छद्वृथामतिः।।
2-14-31a
2-14-31b
अस्तिः प्रास्तिश्च नाम्ना ते सहदेवानुजेऽबले।
बलेन तेन स्वज्ञातीनभिभूय वृथामतिः।।
2-14-32a
2-14-32b
श्रैष्ठ्यं प्राप्तः स तस्यासीदतीवापनयो महान्।
भोजराजन्यवृद्धैश्च पीड्यमानैर्दुरात्मना।।
2-14-33a
2-14-33b
ज्ञातित्राणमभीप्सद्भिरस्मत्सम्भावना कृता।
दत्वाऽऽक्रूराय सुतनुं तामाहुकसुतां तदा।।
2-14-34a
2-14-34b
सङ्कर्षणद्वितीयेन ज्ञातिकार्यं मया कृतम्।
हतौ कंससुनामानौ मया रामेण चाप्युत।।
2-14-35a
2-14-35b
`हत्वा कंसं तथैवादौ जरासन्धस्य बिभ्यतः।
मया रामेण चान्यत्र ज्ञातयः परिपालितः'।।
2-14-36a
2-14-36b
भये तु समतिक्रान्ते जरासन्धे समुद्यते।
मन्त्रोऽयं मन्त्रितो राजन्कुलैरष्टादशावरैः।।
2-14-37a
2-14-37b
अनारमन्तो निघ्नन्तो महास्त्रैः शत्रुघातिभिः।
न हन्यामो वयं तस्य त्रिभिर्वर्षशतैर्बलम्।।
2-14-38a
2-14-38b
तस्य ह्यमरसङ्काशौ बलेन बलिनां वरौ।
नामभ्यां हंसडिबिकावशस्त्रनिधनावुभौ।।
2-14-39a
2-14-39b
तावुभौ सहितौ वीरौ जरासन्धश्च वीर्यवान्।
त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः।।
2-14-40a
2-14-40b
न हि केवलमस्माकं यावन्तोऽन्ये च पार्थिवाः।
तथैव तेषामासीच्च बुद्धिर्बुद्धिमतां वर।।
2-14-41a
2-14-41b
`अष्टादश मया तस्य सङ्ग्रामा रोमहर्षणाः।
दत्ता न च हतो राजञ्जरासन्धो महाबलः'।।
2-14-42a
2-14-42b
अथ हंस इति ख्यातः कश्चिदासीन्महान्नृपः।
रामेण स हतस्तत्र सङ्ग्रामेऽष्टादशावरे।।
2-14-43a
2-14-43b
हतो हंस इति प्रोक्तस्य केनापि भारत।
तच्छ्रुत्वा डिबिको राजन्यमुनाम्भस्यमज्जत ।।
2-14-44a
2-14-44b
विना हसेन लोकेऽस्मिन्नाहं जीवितुमुत्सहे।
इत्येतां मतिमास्थाय डिबिको निधनं गतः।।
2-14-45a
2-14-45b
तथा तु डिबिकं श्रुत्वा हंसः परुपुरञ्जयः।
प्रपेदे यमुनामेव सोपि तस्यां न्यमज्जत।।
2-14-46a
2-14-46b
तौ स राजा जराजन्धः श्रुत्वा च निधनं गतौ।
पुरं शून्येन मनसा प्रययौ भरतर्षभ।।
2-14-47a
2-14-47b
ततो वयमित्रघ्न तस्मिन्प्रतिगते नृपे।
पुनरान्दिनः सर्वे मधुरायां वसामहे।।
2-14-48a
2-14-48b
यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना।
कंसभार्या जरासन्धं दुहिता मागधं नृपम्।
चोदयत्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता।।
2-14-49a
2-14-49b
2-14-49c
पतिघ्नं मे जहीत्येवं पुनः पुनररिन्दम।
ततो वयं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम्।।
2-14-50a
2-14-50b
संस्मरन्तो विमनसो व्यपयाता नराधिप।
पृथक्त्वेन महाराज सङ्क्षिप्य महतीं श्रियम्।।
2-14-51a
2-14-51b
पलायामो भयात्तस्य ससुतज्ञातिबान्धवाः।
इति सञ्चिन्त्य सर्वे स्म प्रतीचीं दिशमाश्रिताः।।
2-14-52a
2-14-52b
कुशस्थलीं पुरीं रम्यां रैवतेनोपशोभिताम्।
ततो निवेशं तस्यां च कृतवन्तो वयं नृप।।
2-14-53a
2-14-53b
तथैव दुर्गसंस्कारं देवैरपि दुरासदम्।
स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येयुः किमु वृष्णिमहारथाः।।
2-14-54a
2-14-54b
तस्यां वयममित्रघ्न निवसामोऽकुतोभयाः।
आलोच्य गिरिमुख्यं तं मागधं तीर्णमेव च।।
2-14-55a
2-14-55b
माधवाः कुरुशार्दूल परां मुदमवाप्नुवन्।
एवं वयं जरासन्धादभितः कृतकिल्बिषाः।।
2-14-56a
2-14-56b
सामर्थ्यवन्तः सम्बन्धाद्गोमन्तं समुपाश्रिताः।
त्रियोजनायतं सद्म त्रिस्कन्धं योजनावधि।।
2-14-57a
2-14-57b
योजनान्ते शतद्वारं वीरविक्रमतोरणम्।
अष्टादशावरैर्नद्धं क्षत्रियैर्युद्धदुर्मदैः।।
2-14-58a
2-14-58b
अष्टादश सहस्राणि भ्रातृणां सन्ति नः कले।
आहुकस्य शतं पुत्रा एकैकस्त्रिदशावरः।।
2-14-59a
2-14-59b
चारुदेष्णः सह भ्रात्रा चक्रदेवोऽथ सात्यकिः।
अहं च रोहिणेयश्च साम्बः प्रद्युम्न एव च।।
2-14-60a
2-14-60b
एवमेते रथाः सप्त राजन्नन्यान्निबोध मे।
कृतवर्मा ह्यनाधृष्टिः समीकः समिर्तिजयः।।
2-14-61a
2-14-61b
कङ्कः शङ्कुश्च कुन्तिश्च सप्तैते वै महारथाः।
`प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भानुरक्रूरसारणौ।।
2-14-62a
2-14-62b
निशठश्च गदश्चैव सप्त चैते महारथाः।
विकमो झिल्लिबभ्रू च उद्धवोऽथ विदूरथः।।
2-14-63a
2-14-63b
वसुदेवोग्रसेनौ च सप्तैते मन्त्रिपुङ्गवाः।
प्रसेनजिच्च यमलो राजराजगुणान्वितः।।
2-14-64a
2-14-64b
स्यमन्तको मणिर्यस्य रुक्मं निस्रुवते बहु।
पुत्रौ चान्धकभोजस्य वृद्धो राजा च ते दश।।
2-14-65a
2-14-65b
वज्रसंहनना वीरी वीर्यवन्तो महाबलाः।
स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिवीरा गतज्वराः।।
2-14-66a
2-14-66b
पाण्डवैश्चापि सततं नाथवन्तो वयं नृप।
सर्वसम्पद्गुणैः सिद्धे तस्मिन्नेवं व्यवस्थिते।।
2-14-67a
2-14-67b
क्षत्रे सम्राजमात्मानं कर्तुमर्हसि भारत।
दुर्योधनं शान्तनवं द्रोणं द्रौणायनिं कृपम्।।
2-14-68a
2-14-68b
कर्णं च शिशुपालं च रुक्मिणं च धनुर्धरम्।
एकलव्यं द्रुमं श्वेतं शैब्यं शकुनिमेव च।।
2-14-69a
2-14-69b
एतानजित्वा सङ्ग्रामे कथं शक्नोषि तं क्रतुम्।
तथैते गौरवेणैव न योत्स्यन्ति नराधिपाः।।
2-14-70a
2-14-70b
एकस्तत्र बलोन्मत्तः कर्णो वैकर्तनो वृषा।
योत्स्यते स परामर्षी दिव्यास्रबलगर्वितः'।।
2-14-71a
2-14-71b
न तु शक्यं जरासन्धे जीवमाने महाबल
राजसूयस्त्वयाऽवाप्तुमेषा राजन्मतिर्मम।।
2-14-72a
2-14-72b
तेन रुद्धा हि राजानः सर्वे जित्वा गिरिव्रजे।
कन्दरे पर्वतेन्द्रस्य सिंहेनेव महाद्विपाः।।
2-14-73a
2-14-73b
स हि राजा जरासन्धो यियक्षुर्वसुधाधिपैः।
`अभिषिक्तः स राजन्यैः सहस्रैरुत चाष्टभिः'।
महादेवं महात्मानमुमापतिमरिन्दम।।
2-14-74a
2-14-74b
2-14-74c
आराध्य तपसोग्रेण निर्जितास्तेन पार्थिवाः।
प्रतिज्ञायाश्च पारं स गतः पार्थिवसत्तम।।
2-14-75a
2-14-75b
स हि निर्जित्य निर्जित्य पार्थिवान्पृतनागतान्।
पुरमानीय बद्ध्वा च चकार पुरुषव्रजम्।।
2-14-76a
2-14-76b
वयं चैव महाराज जरासन्धभयात्तदा।
मधुरा सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम्।।
2-14-77a
2-14-77b
यदि त्वेनं महाराज यज्ञं प्राप्तुमभीप्ससि।
यतस्व तेषां मोक्षाय जरासन्धवधाय च।।
2-14-78a
2-14-78b
समारम्भो न शक्योऽयमन्यथा कुरुनन्दन।
राजसूयस्य कार्त्स्न्येन कर्तुं मतिमतां वर।।
2-14-79a
2-14-79b
इत्येषा मे मती राजन्यथा वा मन्यसेऽनघ।
एवं गते ममाचक्ष्व स्वयं निश्चित्य हेतुभिः।।
2-14-80a
2-14-80b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
मन्त्रपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः।। 14।।

2-14-4 भुवि ये श्रेणिबद्धा राजानः येचान्ये क्षत्रियाः तान् इक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृ ति प्रजां परिचक्षते।।

2-14-56 माधवाः मधुवश्याः ।।

सभापर्व-013 पुटाग्रे अल्लिखितम्। सभापर्व-015
"https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=महाभारतम्-02-सभापर्व-014&oldid=50291" इत्यस्माद् प्रतिप्राप्तम्