महाभारतम्-02-सभापर्व-034

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← सभापर्व-033 महाभारतम्
द्वितीयपर्व
महाभारतम्-02-सभापर्व-034
वेदव्यासः
सभापर्व-035 →


  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103

स्मृतिमात्रागतघटोत्कचलङ्काप्रेषणवृत्तान्तस्य विस्तरेण कथनम्।।1।।
कृष्णगौरवेण विभीषणेन करदानम्।। 2।।

विभीषणात्करणाहृतवता घटोत्कचेन सह सहदेवस्य प्रतिनिवर्तनम्।। 3।।

वैशम्पायन उवाच।। 2-34-1x
सहदेवस्ततो राजा मन्त्रिभिः सह भारत।
सम्प्रधार्य महाबाहुः सचिवैर्बुद्धिमत्तरैः।।
2-34-1a
2-34-1b
स विचार्य तदा राजन्सहदेवस्त्वरान्वितः।
चिन्तयामास राजेन्द्र भ्रातुः पुत्रं घटोत्कचम्।।
2-34-2a
2-34-2b
ततश्चिन्तितमात्रे तु राक्षसः प्रत्यदृश्यत।
अतिदीर्घो महाबाहु सर्वाभरणभूषितः।।
2-34-3a
2-34-3b
नीलजीमूतसङ्काशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः।
विचित्रहारकेयूरः किङ्किणीमणिभूषितः।।
2-34-4a
2-34-4b
हेममाली महादंष्ट्रः किरीटी कुक्षिबन्धनः।
ताम्रकेशो हरिश्मश्रुर्भीमाङ्गः कटकाङ्गदः।।
2-34-5a
2-34-5b
रक्तचन्दनदिग्धाङ्गः सूक्ष्माम्बरधरो बली।
बलेन स ययौ तत्र चालयन्निव मेदिनीम्।।
2-34-6a
2-34-6b
ततो दृष्ट्वा जना राजन्नायान्तं पर्वतोपमम्।
भयाद्धि दुद्रुवुः सर्वे सिंहात्क्षुद्रमृगा यथा।।
2-34-7a
2-34-7b
आससाद च माद्रेयं पुलस्त्यं रावणो यथा।
अभिवाद्य ततो राजन्सहदेवं घटोत्कचः।।
2-34-8a
2-34-8b
प्रह्वः कृताञ्जलिस्तस्थौ किं कार्यमिति चाब्रवीत्।
तं परिष्वज्य बाहुभ्यां मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवः।।
2-34-9a
2-34-9b
तं मेरुशिखराकारमागतं पाण्डुनन्दनः।
पूजयित्वा सहामात्यः प्रीतो वाक्यमुवाच ह।।
2-34-10a
2-34-10b
गच्छ लङ्कां पुरीं वत्स करार्थं मम शासनात्। ।।
तत्र दृष्ट्वा महात्मानं राक्षसेन्द्रं बिभीषणम्।।
2-34-11a
2-34-11b
रत्नानि राजसूयार्थं विविधानि बहूनि च।
उपादाय च सर्वाणि प्रत्यागच्छ महाबल।।
2-34-12a
2-34-21b
वैशम्पायन उवाच। 2-34-13x
पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः।
तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्ये दक्षिणां दिशम्।।
2-34-13a
2-34-13b
प्रययौ दक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः।
लङ्कामभिमुको राजन्समुद्रं स व्यलोकयत्।।
2-34-14a
2-34-14b
कूर्मग्राहझषाकीर्णं मीननक्रैस्तथाऽऽकुलम्।
शुक्तिव्रातसमाकीर्णं शङ्कानां निचयाकुलम्।।
2-34-15a
2-34-15b
स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन्रामविक्रमम्।।
गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः।।
2-34-16a
2-34-16b
ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम्।
प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम्।।
2-34-17a
2-34-17b
प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च सङ्कुलाम्।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादामुद्यानवनशोभिताम्।।
2-34-18a
2-34-18b
सर्वकालफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम्।
पुष्पगन्धैश्च सङ्कीर्णां रमणीयमहारथाम्।।
2-34-19a
2-34-19b
नानारत्नैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्।
विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम्।।
2-34-20a
2-34-20b
ददर्श स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम्।।
नानावेषधरान्दक्षान्नारीश्च प्रियदर्शनाः।।
2-34-21a
2-34-21b
दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्यभूषणभूषिताः।
मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः।।
2-34-22a
2-34-22b
भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः।
आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम्।।
2-34-23a
2-34-23b
स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह। 2-34-24a
घटोत्कच उवाच।। 2-34-24x
bकुरूणामृष्टबो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः।।
aकनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः।
bतेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च।।
2-34-24
2-34-25
2-34-25
द्रष्टुमिच्छामि राजेनद्रं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय। 2-34-26a
वैशम्पायन उवाच।। 2-34-26x
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते।। 2-34-26b
तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः।
प्राञ्जलिः स्रवमाचष्ट स्रवां दूतगिरं तदा।।
2-34-27a
2-34-27b
द्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपं मे प्रवेश्यताम्।।
2-34-28a
2-34-28b
एवमुक्तस्तु राज्ञा स धर्मज्ञेन महात्मना।
अथनिष्कम्य सम्भ्रान्तो द्वार्स्थोहैडिम्बमब्रवीत्।।
2-34-29a
2-34-29b
एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम्।
द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः।।
2-34-30a
2-34-30b
स प्रविश्य ददर्शाथ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम्।
ततः कैलाससङ्काशं तत्पकाञ्चनतोरणम्।।
2-34-31a
2-34-31b
प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम्।
हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नोपशोभितम्।।
2-34-32a
2-34-32b
काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि।
वज्रवैडूर्यजुष्टैश्च स्तम्भैश्च सुमनोहरैः।।
2-34-33a
2-34-33b
नानाध्वजपताकाभिर्युक्तं मणिविचित्रितम्।
चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम्।।
2-34-34a
2-34-34b
स दृष्ट्वा तत्र सर्वं च भैमसेनिर्मनोहरम्।
प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मधुरस्वरम्।।
2-34-35a
2-34-35b
तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालमिताक्षरम्।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादं वादित्रसततं शुभम्।।
2-34-36a
2-34-36b
स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत्तदा।
ततो विगाह्य हैडिम्बो बहुकक्ष्यां मनोरमाम्।।
2-34-37a
2-34-37b
स ददर्श महात्मानं द्वार्स्थेन सह भारत।
तं विभीषणमासीनं काञ्चने परमासने।।
2-34-38a
2-34-38b
दिवि भास्करसङ्काशं मुक्तामणिविभूषितम्।
दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपधरं विभुम्।।
2-34-39a
2-34-39b
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम्।
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्।।
2-34-40a
2-34-40b
उपोपविष्टं सचिवैर्देवैरिव शतक्रतुम्।
यक्षैर्महात्मभिर्दिव्यनारीभिर्हृद्यकान्तिभिः।।
2-34-41a
2-34-41b
गीतैर्मङ्गलयुक्तैश्च पूज्यमानं यथा दिवि।
चामरे व्यजने चाग्र्ये हेमदण्डे महाधने।।
2-34-42a
2-34-42b
गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि।
अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम्।।
2-34-43a
2-34-43b
धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेस्वरम्।
राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा।।
2-34-44a
2-34-44b
दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन्ववन्दे तं कृताञ्जलिः।
प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा।।
2-34-45a
2-34-45b
तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः।
पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत्।।
2-34-46a
2-34-46b
विभीषण उवाच।। 2-34-47x
कस्य वंशे स सञ्जातः करमिच्छन्महीपतिः।
तस्यानुजान्समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै।।
2-34-47a
2-34-47b
त्वां च कार्यं च तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः।
विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानेतान्पृथक्पृथक्।।
2-34-48a
2-34-48b
वैशम्पायन उवाच। 2-34-49x
एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना।
कृताञ्जलिरुवाचाथ समर्थमिदमुत्तरम्।।
2-34-49a
2-34-49b
घटोत्कच उवाच। 2-34-50x
सोमवंशोद्भवो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः।
पाण्डोश्च पुत्राः पञ्चासञ्छक्रतुल्यपराक्रमाः।।
2-34-50a
2-34-50b
तेषां ज्येष्ठस्तु नाम्ना वै युधिष्ठिर इति श्रुतः।
अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव।।
2-34-51a
2-34-51b
ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत्।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये।।
2-34-52a
2-34-52b
तद्दत्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः।
भ्रातृभिः सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थेऽन्वमोदत।।
2-34-53a
2-34-53b
गङ्गायमुनयोर्मध्ये ते उभे नगरोत्तमे।
नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशास्ति नः।।
2-34-54a
2-34-54b
तस्यानुजो महाबाहुर्भीमसेन इति श्रुतः।
महातेजा महाकीर्तिः शक्रतुल्यपराक्रमः।।
2-34-55a
2-34-55b
दशनागसहस्राणां बले तुल्यः स पाण्डवः।
तस्यानुजोऽर्जुनो नाम महाबलपराक्रमः।।
2-34-56a
2-34-56b
सुकुमारो महासत्वो लोके वीर्येण विश्रुतः।
कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले।।
2-34-57a
2-34-57b
जामदग्न्यसमश्चास्त्रे सङ्ख्ये रामसमोऽर्जुनः।
रूपे शक्रसमः पार्थस्तेजसा भास्करोपमः।।
2-34-58a
2-34-58b
देवदानवगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः।
मानुषैश्च समस्तैस्तु अजेयः फल्गुनो रणे।।
2-34-59a
2-34-59b
तेन तत्खण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे।
विजित्य तरसा शक्रं युधि देवगणैः सह।।
2-34-60a
2-34-60b
लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम्।
तेन लब्धा महाराज दुर्लभा दैवतैरपि।।
2-34-61a
2-34-61b
वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्रुता।
अर्जुनस्यानुजो राजन्नकुलश्चेति विश्रुतः।।
2-34-62a
2-34-62b
दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथः।
तस्यानुजो महातेजाः सहदेव इति श्रुतः।।
2-34-63a
2-34-63b
तेनाहं प्रेषितो राजन्कुमारेण समो रणे।
अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली।।
2-34-64a
2-34-64b
मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी।
पार्थानामुपकारार्थं चरामि पृथिवीमिमाम्।।
2-34-65a
2-34-65b
आसीत्पृथिव्याः सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिरः।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे।।
2-34-66a
2-34-66b
सन्दिदेश च स भ्रातृन्करार्थं सर्वतोदिशम्।
वृष्णिवीरेण सहितः सन्दिदेशानुजान्नृपः।।
2-34-67a
2-34-67b
उदीचीमर्जुनस्तूर्णं गत्वा मेरोरथोत्तमः।
गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः।।
2-34-68a
2-34-68b
त्वा सर्वान्नृपान्युद्धे हत्वा च तरसा वशी।
स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम्।।
2-34-69a
2-34-69b
अश्वांश्च विविधान्दिव्यान्सर्वानादाय फल्गुनः।
धनं बहुविधं राजन्धर्मपुत्राय वै ददौ।।
2-34-70a
2-34-70b
भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात्।
वशे कृत्वा महीपालान्पाण्डवाय धनं ददौ।।
2-34-71a
2-34-71b
दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा।
सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान्महीक्षितः।।
2-34-72a
2-34-72b
मां सन्दिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः।
पार्थानां चरितं तुभ्यं सङ्क्षेपात्समुदाहृतम्।।
2-34-73a
2-34-73b
तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम्।
पावनं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम्।
एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं दातुमिहार्हसि।।
2-34-74a
2-34-74b
2-34-74c
वैशम्पायन उवाच।। 2-34-75x
तेन तद्भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो बिभीषणः।
शासनं प्रतिजग्राह धर्मात्मा राक्षसैः सह।।
2-34-75a
2-34-75b
तच्च कृष्णकृतं धीमानित्यमन्यत स प्रभुः।
ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च।।
2-34-76a
2-34-76b
दान्तकाञ्चनपर्यङ्कान्मणिहेमविचित्रितान्।
भूषणानि महार्हाणि प्रवालानि मणींश्च सः।।
2-34-77a
2-34-77b
काञ्चनानि च भाण्डनि कलशानि घटानि च।
कटाहानि विचित्रानि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः।।
2-34-78a
2-34-78b
राजतानि च भाण्डानि रत्नगर्भांश्च कुण्डलान्।
हेमपुष्पानि चान्यानि रुक्ममुख्यानि चापरान्।
2-34-79a
2-34-79b
शङ्खांश्च चन्द्रसङ्काशांश्चित्रावर्तविचित्रितान्।
यज्ञस्य तोरणे युक्तान्ददौ तालांश्चतुर्दश।।
2-34-80a
2-34-80b
रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः।
मुकुटानि महार्हाणि रत्नगर्भांश्च कङ्कणान्।।
2-34-81a
2-34-81b
चन्दनानि च मुख्यानि वासांसि विविधानि च।
स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणाः।।
2-34-82a
2-34-82b
तानि सर्वाणि रत्नानि आजह्रुस्ते निशाचराः।
अष्टाशीतिसहस्राणि समदा रक्तलोचनाः।।
2-34-83a
2-34-83b
रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः।
विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः।।
2-34-84a
2-34-84b
प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः।
ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह।।
2-34-85a
2-34-85b
जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति।
आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम्।।
2-34-86a
2-34-86b
सहदेवो ददर्शाथ रत्नाहारान्निशाचरान्।
आगतान्भीमसङ्काशान्हैडिम्बं च तथा नृप।।
2-34-87a
2-34-87b
द्रमिला नैऋतान्दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः।
भैमसेनिस्ततो गत्वा मार्देयं प्राञ्जलिः स्थितः।।
2-34-88a
2-34-88b
प्रीतिमानभवद्दृष्ट्वा रत्नौधं तं च पाण्डवः।
तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान्प्रीतिमानभूत्।।
2-34-89a
2-34-89b
विसृज्य द्रविडान्सर्वान्गमनायोपचक्रमे।
न्यवर्तम ततो धीमान्सहदेवो नराधिपः।।
2-34-90a
2-34-90b
एवं विजित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च।
करदान्पार्थिवान्कृत्वा प्रत्यागच्छदरिन्दमः।।
2-34-91a
2-34-91b
रत्नसालमुपादाय ययौ सहनिशाचरः।
इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम्।।
2-34-92a
2-34-92b
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन्सहदेवः कृताञ्जलिः।
प्रह्वोऽभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्चापि तेन वै।।
2-34-93a
2-34-93b
लङ्काप्राप्तान्धनौघांश्च दृष्ट्वा तान्दुर्लभान्बहून्।
प्रीतिमानभवद्राजा विस्मयं परमं ययौ।।
2-34-94a
2-34-94b
धर्मराजाय तत्सर्वं निवेद्य भरतर्षभ।
कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने।।
2-34-95a
2-34-95b
विविधानि च रत्नानि गोजाविमहिषांस्तथा।
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय।।
2-34-96a
2-34-96b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
दिग्विजयपर्वणि चतुस्त्रिंसोऽध्यायः।। 34।। ।।
सभापर्व-033 पुटाग्रे अल्लिखितम्। सभापर्व-035
"https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=महाभारतम्-02-सभापर्व-034&oldid=50404" इत्यस्माद् प्रतिप्राप्तम्