महाभारतम्-02-सभापर्व-011

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  102. 102
  103. 103

ब्रह्मसभावर्णनम्।।1।।

नारद उवाच।। 2-11-1x
पितामहसभां तात कथ्यमानां निबोध मे।
शक्यते या न निर्देष्टुमेवंरूपेति भारत।।
2-11-1a
2-11-1b
पुरा देवयुगे राजन्नादित्यो भगवान्दिवः।
आगच्छन्मानुषं लोकं दिदृक्षुर्विगतक्लमः।।
2-11-2a
2-11-2b
चरन्मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वयम्भुवः।
स तामकथयन्मह्यं दृष्ट्वा तत्त्वेन पाण्डव।।
2-11-3a
2-11-3b
अप्रमेयां सभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ।
अनिर्देश्यां प्रभावेण सर्वभूतमनोरमाम्।।
2-11-4a
2-11-4b
श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभायाः पाण्डवर्षभ।
दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमिदमब्रुवम्।
2-11-5a
2-11-5b
भगवन्द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभां शुभाम्।
येन वा तपसा शक्या कर्मणा वाऽपि गोपते।।
2-11-6a
2-11-6b
औषधैर्या तथा युक्तैरुत्तमा पापनाशिनी।
तन्ममाचक्ष्व भगवन्पश्येयं तां सभां यथा।।
2-11-7a
2-11-7b
स तन्मम वचः श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकरः।
प्रोवाच भारतश्रेष्ठ व्रतं वर्षसहस्रकम्।।
2-11-8a
2-11-8b
ब्रह्मव्रतमुपास्स्व त्वं प्रयतेनान्तरात्मना।
ततोऽहं हिमवत्पृष्ठे समारब्दो महाव्रतम्।।
2-11-9a
2-11-9b
ततः स भगवान्सूर्यो मामुपादाय वीर्यवान्।
आगच्छत्तां सभां ब्राह्मीं विपाप्मा विगतक्लमः ?
2-11-10a
2-11-10b
एवंरूपेति सा शक्या न निर्देष्टुं नराधिप।
क्षणेन हि बिभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा।।
2-11-11a
2-11-11b
न वेद परिमाणं वा संस्थानं चापि भारत।
न च रूपं मया तादृक् दृष्टपूर्वं कदाचन।।
2-11-12a
2-11-12b
सुसुखा सा सदा राजन्न शीता न च घर्मदा।
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्यतां प्राप्तुवन्त्युत ।।
2-11-13a
2-11-13b
नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सुभास्वरैः।
स्तम्भैर्न च धृता सा तु शाश्वती न च सा क्षरा ।।
2-11-14a
2-11-14b
दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभैः।। 2-11-15a
अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा।
दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्वीव भास्करम्।।
2-11-16a
2-11-16b
तस्यां स भगवानास्ते विदधद्देवमायया।
स्वयमेकोऽनिशं राजन्सर्वलोकपितामहः।।
2-11-17a
2-11-17b
उपतिष्ठन्ति चाप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम्।
दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः।।
2-11-18a
2-11-18b
भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथाङ्गिराः।
पुलस्त्यश्च कतुश्चैव प्रह्लादः कर्दमस्तथा।
2-11-19a
2-11-19b
अथर्वाङ्गिरसश्चैव वालखिल्या सरीचिपाः।
मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वायुस्तेजो जलं मही।।
2-11-20a
2-11-20b
शब्दस्पर्शौ तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत।
प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत्कारणं भुवः।।
2-11-21a
2-11-21b
अगस्त्यश्च महातेजा मार्कण्डेयश्च वीर्यवान्।
जमदग्निर्भरद्वाजः संवर्तश्च्यवनस्तथा।।
2-11-22a
2-11-22b
दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्णशृङ्गश्च धार्मिकः।
सनत्कुमारो भगवान्योगाचार्यो महातपाः।।
2-11-23a
2-11-23b
असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्त्ववित्।
ऋषभो जितशत्रुश्च महावीर्यस्तथा मणिः।।
2-11-24a
2-11-24b
आयुर्वेदस्तथाऽष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत।
चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान्।।
2-11-25a
2-11-25b
वायवः क्रतवश्चैव सङ्कल्पः प्राण एव च।
मूर्तिमन्तो महात्मानो महाव्रतपरायणाः।।
2-11-26a
2-11-26b
एते चान्ये च बहवो ब्रह्माणं समुपस्थिताः।
अर्थो धर्मश्च कामश्च हर्षो द्वेषस्तपो दमः।।
2-11-27a
2-11-27b
आयान्ति तस्यां सहिता गन्धर्वाप्सरसां गणाः।
विंशतिः सप्त चैवान्ये लोकपालाश्च सर्वशः।।
2-11-28a
2-11-28b
शुक्रो बृहस्पतिश्चैव बुधोऽङ्कारक एव च।
शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च।।
2-11-29a
2-11-29b
मन्त्रो रथन्तरं चैव हरिमान्वसुमानपि।
आदित्याः साधिराजानो नामद्वन्द्वैरुदाहृताः।।
2-11-30a
2-11-30b
मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्चैव भारत।
तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींष्यथ।।
2-11-31a
2-11-31b
ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदश्च पाण्डव।
अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव ह।।
2-11-32a
2-11-32b
इतिहासोपवेदाश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः।
ग्रहा यज्ञाश्च सोमश्च देवताश्चापि सर्वशः।।
2-11-33a
2-11-33b
सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा।
मेधा धृतिः श्रुतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः क्षमा।।
2-11-34a
2-11-34b
सामानि स्तुतिशस्त्राणि गाथाश्च विविधास्तथा।
भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशाम्पते।।
2-11-35a
2-11-35b
नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिकारिकाः ।
तत्रतिष्ठन्ति ते पुण्या ये चान्ये गुरुपूजकाः।।
2-11-36a
2-11-36b
क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथैव च।
अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च भारत।।
2-11-37a
2-11-37b
संवत्सराः पञ्ययुगमहोरात्रश्चतुर्विधः।
कालचक्रं च तद्दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम्।।
2-11-38a
2-11-38b
धर्मचक्रं तथा चापि नित्यमास्ते युधिष्ठिर।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सुरसा विनता इरा।।
2-11-39a
2-11-39b
कालिका सुरभी देवी सरमा चाथ गौतमी।। 2-11-40a
प्रभा कद्रूश्च वै देव्यौ देवतानां च मातरः।
रुद्राणी श्रीश्च लक्ष्मीश्च भद्रा षष्ठी तथाऽपरा।।
2-11-41a
2-11-41b
पृथिवी गां गता देवी ह्रीः स्वाहा कीर्तिरेव च।
सुरा देवी शची चैव तथा पुष्टिररुन्धती।।
2-11-42a
2-11-42b
संवृत्तिराशा नियतिः सृष्टिर्देवी रतिस्तथा।
एताश्चान्याश्चवै देव्य उपतस्थुः प्रजापतिम्।।
2-11-43a
2-11-43b
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चास्विनावपि।
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः।।
2-11-44a
2-11-44b
पितृणां च गणान्विद्धि सप्तैव पुरुषर्षभ।
मूर्तिमन्तो वै चत्वारस्त्रयश्चापि शरीरिणः।।
2-11-45a
2-11-45b
वैराजश्च महाभागा अग्निष्वात्ताश्च भारत।
गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः।।
2-11-46a
2-11-46b
सोमपा एकशृङ्गाश्च चतुर्वेदाः कलास्तथा।
एते चतुर्षु वर्णेषु पूज्यन्ते पितरो नृप।।
2-11-47a
2-11-47b
एतैराप्यायितैः पुर्वं सोमश्चाप्याय्यते पुनः।
त एते पितरः सर्वे प्रजापतिमुपस्थिताः।।
2-11-48a
2-11-48b
उपासते च संहृष्टा ब्रह्माणममितौजसम्।
राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा।।
2-11-49a
2-11-49b
नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते।
स्थावरा जङ्गमाश्चैव महाभूतास्तथाऽपरे।।
2-11-50a
2-11-50b
पुरन्दरश्च देवेन्द्रो वरुणो धनदो यमः।
महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वशः।।
2-11-51a
2-11-51b
महासेनश्च राजेन्द्र सदोपास्ते पितामहम्।
देवो नारायणस्तस्यां तथा देवर्षयश्च ये।।
2-11-52a
2-11-52b
ऋषयो वालखिल्याश्च योनिजायोनिजास्तथा।
यच्च किञ्चित्रिलोकेऽस्मिन्दृश्यते स्थाणु जङ्गमम्।
सर्वं तस्यां मया दृष्टमिति विद्धि नराधिप।।
2-11-53a
2-11-53b
2-11-53c
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम्।
प्रजावतां च पञ्चाशदृषीणामपि पाण्डव।।
2-11-54a
2-11-54b
ते स्म तत्र यथाकामं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः।
प्रणम्य शिरसा तस्मै सर्वे यान्ति यथागमम्।।
2-11-55a
2-11-55b
अतिथीनागतान्देवान्दैत्यान्नागांस्तथा द्विजान्।
यक्षान्मुपर्णान्कालेयान्गन्धर्वाप्सरसस्तथा।।
2-11-56a
2-11-56b
महाभागानमितधीर्ब्रह्मा लोकपितामहः।
दयावान्सर्वभूतेषु यथार्हं प्रतिपद्यते।।
2-11-57a
2-11-57b
प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयं स्वयम्भूरमितद्युतिः।
सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप।।
2-11-58a
2-11-58b
तथा तैरुपयातैश्च प्रतियद्भिश्च भारत।
आकुला सा सभातात भवति स्म सुखप्रदा।।
2-11-59a
2-11-59b
सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्षिगणसेविता।
ब्राहया श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा।।
2-11-60a
2-11-60b
सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा।
सभेयं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव।।
2-11-61a
2-11-61b
एता मया दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु भारत।
सभेयं मानुषे लोके सर्वश्रेष्ठतमा तव।।
2-11-62a
2-11-62b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
मन्त्रपर्वणि एकादशोऽध्यायः।। 11।।

2-11-2 देवयुगे कृतयुगे।।

2-11-30 मामद्वन्द्वैरग्नीषोमेन्द्राभ्यादिभिः।। 2-11-38 संवत्सराः षष्टिः प्रभवादयः। तेच पञ्चपञ्च एकैकं युगम्। चतुर्विधो मानुषोऽ होरात्रः षष्टिघटिकाभिः। पैत्रो मासेन। दैवो वत्सरेण। ब्राह्मः कल्पेनेति। कालचक्रं द्वादशराश्यात्मकम्।।

सभापर्व-010 पुटाग्रे अल्लिखितम्। सभापर्व-012