महाभारतम्-02-सभापर्व-076

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← सभापर्व-075 महाभारतम्
द्वितीयपर्व
महाभारतम्-02-सभापर्व-076
वेदव्यासः
सभापर्व-077 →


  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066
  67. 067
  68. 068
  69. 069
  70. 070
  71. 071
  72. 072
  73. 073
  74. 074
  75. 075
  76. 076
  77. 077
  78. 078
  79. 079
  80. 080
  81. 081
  82. 082
  83. 083
  84. 084
  85. 085
  86. 086
  87. 087
  88. 088
  89. 089
  90. 090
  91. 091
  92. 092
  93. 093
  94. 094
  95. 095
  96. 096
  97. 097
  98. 098
  99. 099
  100. 100
  101. 101
  102. 102
  103. 103

शकुनिना दुर्योधनस्य चिन्तया कार्श्यादिकं बोधितेन धृतराष्ट्रेण दुर्योधनम् प्रति चिन्ताकारणप्रश्नः।। 1।। दुर्योधनेन तत्कथनपुर्वकं धृतराष्ट्रं प्रति द्यूताभ्यनुज्ञानप्रार्थनम्।। 2।। धृतराष्ट्रेण द्यूतसभानिर्माणाज्ञापनपूर्वकं पाण्डवानयनाय विदुरं प्रति चोद नम्।। 3।।

वैशम्पायन उवाच।। 2-76-1x
अनुभूय तु राज्ञस्तं राजसूयं सुदुर्मतिः।
`युधिष्ठिरस्य शकुनिर्दुर्योधसुसंयुतः।।
2-76-1a
2-76-1b
विवेश हास्तिनपुरं दुर्योधनमतेन सः।
वाढमित्येव शकुनिर्दृढं हृदि चकार ह।।
2-76-2a
2-76-2b
अस्वस्थतां चतां दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रस्य पापकृत्।
भारतानां च दुष्टात्मा क्षयाय हि नृपक्षयः'।।
2-76-3a
2-76-3b
प्रियकृन्मतमाज्ञाय पूर्वं दुर्योधनस्य तत्।
प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौबलस्तदा।।
2-76-4a
2-76-4b
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम्।
उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमब्रवीत्।।
2-76-5a
2-76-5b
शकुनिरुवाच। 2-76-6x
दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिणः कृशः।
दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप।।
2-76-6a
2-76-6b
न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसंभवम्।
ज्येष्ठपुत्रस्य हृच्छोकं किमर्थं नावबुध्यसे।।
2-76-7a
2-76-7b
`एवमुक्तः शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वरः।
दुर्योधनं समाहूयं इदं वचनमब्रवीत्'।।
2-76-8a
2-76-8b
धृतराष्ट्र उवाच। 2-76-9x
दुर्योधन कृतोमूलं भृशमार्तोऽसि पुत्रक।
श्रोतव्यश्चेन्मया सोऽर्थो ब्रूहि मे कुरुनन्दन।।
2-76-9a
2-76-9b
अयं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिमं कृशम्।
चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम्।।
2-76-10a
2-76-10b
ऐश्वर्यं हि महत्पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम्।।
2-76-11a
2-76-11b
आच्छादयसि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम्।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः।।
2-76-12a
2-76-12b
शयनानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः।
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम्।।
2-76-13a
2-76-13b
देवनामिव ते सर्वं वाचि बद्धं न संशयः।
स दीन इव दुर्धर्ष कस्माच्छोचसि पुत्रक।।
2-76-14a
2-76-14b
`मात्रा पित्रा च पुत्रस्य यद्वै कार्यं परं स्मृतम्।
प्राप्तस्त्वमसि तत्तात निखिलां नः कुलश्रियम्।।
2-76-15a
2-76-15b
उपस्थितः सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा।
विविधैरन्नपानैश्च प्रवरैः किं नु शोचसि।।
2-76-16a
2-76-16b
निरुक्तं निगमं छन्दः षडङ्गान्यस्त्रशास्त्रवान्।
अधीती कृतविद्यस्त्वं दशव्याकरणैः कृपात्।।
2-76-17a
2-76-17b
हलायुधात्कृपाद्द्रोणादस्त्रविद्यामधीतवान्।
भ्राताज्येष्ठः स्थितो राज्ये किमु शोचसि पुत्रक।।
2-76-18a
2-76-18b
पृथग्जनैरलभ्यं यदशनाच्छादनं बहु।
प्रभुः सन्भुञ्जसे पुत्र संस्तुतः सूतमागधैः।।
2-76-19a
2-76-19b
तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम्।
लोकेस्मिञ्ज्येष्ठभागन्यस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः।।
2-76-20a
2-76-20b
वैशम्पायन उवाच।। 2-76-21x
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मन्दः क्रोधवशानुगः।
पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन् '।।
2-76-21a
2-76-21b
दुर्योधन उवाच।। 2-76-22x
अश्नाम्याच्छादये चाहं यथा कुपुरुषस्तथा।
अमर्षं धारये चोग्रं निनीषुः कालपर्ययम्।।
2-76-22a
2-76-22b
अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय परं स्थितः।
क्लेशान्मुमुक्षुः परजान्स वै पुरुष उच्यते।।
2-76-23a
2-76-23b
सन्तोषो वै श्रियं हन्ति ह्यभिमानं च भारत।
अनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत्।।
2-76-24a
2-76-24b
न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठेरे।
अतिज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम।।
2-76-25a
2-76-25b
नृद्व्यतोत्मानं हीयमानं निशाम्य च।
अदृश्यामपि कौन्तेय श्रियं पश्यन्निवोद्यताम्।।
2-76-26a
2-76-26b
तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिमः कृशः।
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः।।
2-76-27a
2-76-27b
त्रिंशद्दासीक एकैको यान्बिभर्ति युधिष्ठिरः।
दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम्।
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने।।
2-76-28a
2-76-28b
2-76-28c
कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च।
काम्भोजः प्राहिणोत्तस्मै परार्ध्यानपि कम्बलान्।
गजयोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः।।
2-76-29a
2-76-29b
2-76-29c
शतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत।
राजन्या बलिमादाय समेता हि नृपक्षये।।
2-76-30a
2-76-30b
पृथग्विधानि रत्नान पार्थिवाः पृथिवीपते।
आहरन्क्रतुमुख्येऽस्मिन्कुन्तीपुत्राय भूरिशः।।
2-76-31a
2-76-31b
न क्वचिद्धि मया तादृग्दृष्टपूर्वो न च श्रुतः।
यादृग्धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः।।
2-76-32a
2-76-32b
`असत्यं चेदिदं सर्वं सञ्जयं प्रष्टुमर्हसि'।
अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप।
शर्म नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते।।
2-76-33a
2-76-33b
2-76-33c
ब्रह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसङ्घशः।
त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः।।
2-76-34a
2-76-34b
कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्शुभान्।
त्रैखर्वाः प्रतिवेद्यास्मै लेभिरेऽथ प्रवेशनम्।।
2-76-35a
2-76-35b
यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रियटः।
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः।।
2-76-36a
2-76-36b
शङ्खप्रवरमादाय वासुदेवोऽभिषिक्तवान्।
शक्यं रुक्मसहस्रस्य बहुरत्नविभूषितम्।।
2-76-37a
2-76-37b
दृष्ट्वा च मम तत्सर्वं ज्वररूपमिवाभवत्।
गृहीत्वा तत्तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ।।
2-76-38a
2-76-38b
तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ।
त्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिणः।
तत्र गत्वाऽर्जुनो दण्डमाजहारामितं धनम्।।
2-76-39a
2-76-39b
2-76-39c
`कृतां बैन्दुसरै रत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम्।
अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत।।
2-76-40a
2-76-40b
उत्कर्षन्तं च वासश्च प्राहसन्मां वृकोदरः।
किङ्कराश्च सभापाला जहसुर्भरतर्षभ।।
2-76-41a
2-76-41b
पित्रोरर्थे विशेषेण प्रावृण्वं तत्र जीवितम्।
तत्र त्म यदि शक्तः स्यां घातयेयं वृकोदरम्।।
2-76-42a
2-76-42b
सपत्नेनापहासो हि स मां दहति भारत।। 2-76-43a
तत्र स्फाटिकतोयां हि स्फाटिकाम्बुजशोभिताम्।
सभां पुष्करिणीं मत्वा पतितोऽस्मि नराधिप।।
2-76-44a
2-76-44b
तत्र मामहसद्भीमः सह पार्थेन सस्वरम्।
द्रौपदी चसह स्त्रीभिः पातयन्ती मनो मम।।
2-76-45a
2-76-45b
क्लिन्नवस्त्रस्य च जले किङ्करा राजचोदिताः।
ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखतरं मम।।
2-76-46a
2-76-46b
अस्तम्भा इव तिष्ठन्ति स्तम्भा इव सहस्रशः।
सोहं तत्राहतो राजन्स्फटिकाभ्यन्तरे विभो।।
2-76-47a
2-76-47b
अद्वारेण विनिर्गच्छन्द्वारसंस्थानरूपिणा।
अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः।।
2-76-48a
2-76-48b
आमृशन्निव तां दृष्ट्वा मार्गान्तरमुपाविशम्।
इदं द्वारमिदं राजन्नद्वारमिति मां प्रति।
अद्भुतं प्रहसन्वाक्यं बभाषे स वृकोदरः।।
2-76-49a
2-76-49b
2-76-49c
स्त्रियश्च तत्र मां दृष्ट्वा जहसुस्तादृशं नृप।
सर्वं हासकरं तेषां सदस्यानां नरर्षभ।।
2-76-50a
2-76-50b
न श्रुतानि न दृष्टानि यानि रत्नान मे क्वचित्।
तानि मे तत्र दृष्टानि तेन तप्तोस्मि दुःखितः।।
2-76-51a
2-76-51b
हुताशनं प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि महोदधिम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते'।।
2-76-52a
2-76-52b
इदं चाद्भुतमत्रासीत्तन्मे निगदतः शृणु।। 2-76-53a
पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुञ्जतां सदा।
स्थापितस्तत्र सञ्ज्ञार्थं शङ्खो ध्मायति नित्यसः।।
2-76-54a
2-76-54b
मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत।
अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन्।।
2-76-55a
2-76-55b
पार्थिवैर्बहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः।
अशोभत महाराज नक्षत्रैर्द्यैरिवामला।।
2-76-56a
2-76-56b
सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर।
ज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः।।
2-76-57a
2-76-57b
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः।
न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च।
गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन्युधिष्ठिरे।।
2-76-58a
2-76-58b
2-76-58c
तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिक्रामहम्।
शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा।।
2-76-59a
2-76-59b
`अप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं शमो मम न विद्यते।
अरीन्बाणैः शाययिष्ये शयिष्ये वा हतः परैः।।
2-76-60a
2-76-60b
एतादृशस्य मे किं तु जीवितेन परन्तप।
वर्धन्ते पाण्डवा राजन्वयं हि स्थितवृद्धयः'।।
2-76-61a
2-76-61b
शकुनिरुवाच।। 2-76-62x
यामेतामतुलां लक्ष्मीं दृष्टवानसि पाण्डवे।
तस्याटः प्राप्तावुपायं मे शृणु सत्यपराक्रम।।
2-76-62a
2-76-62b
अहमक्षेष्वभिज्ञोऽस्मि पृथिव्यामपि भारत।
हृदयज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने।।
2-76-63a
2-76-63b
द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न च जानाति देवितुम्।
आहूतश्चैष्यति व्यक्तं नित्यमेवाह्वयत्स्वयम्।।
2-76-64a
2-76-64b
नियतं तं विजेष्यामि कृत्वा तु कपटं विभो।
आनयामि समृद्धिं तां दिव्यां चोपाह्वयस्व तम्।।
2-76-65a
2-76-65b
वैशम्पायन उवाच।। 2-76-66x
एवमुक्तः शकुनिना राजा दुर्योधनस्ततः।
धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत्।।
2-76-66a
2-76-66b
अयमुत्सहते राजञ्श्रियमाहर्तुमक्षवित्।
द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि।।
2-76-67a
2-76-67b
धृतराष्ट्र उवाच।। 2-76-68x
क्षत्ता मन्त्री महाप्राज्ञः स्थितो यस्यास्मि शासने।
तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम्।।
2-76-68a
2-76-68b
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम्।
उभयोटः पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम्।।
2-76-69a
2-76-69b
दुर्योधन उवाच। 2-76-70x
निवर्तयिष्यति त्वाऽसौ यदि क्षत्ता समेष्यति।
निवृत्ते त्वयि राजेन्द्र मरिष्येऽहमसंशयम्।।
2-76-70a
2-76-70b
स त्वं मयि मृते राजन्विदुरेण सुखी भव।
भोक्ष्यसे पृथिवीं कृत्स्नां किं मया त्वं करिष्यसि।।
शम्पायन उवाच।।
2-76-71a
2-76-71b
2-7-72x
आर्तवाक्यं तु तत्तस्य प्रणयोक्तं निशम्य सः।
धृतराष्ट्रोऽब्रवीत्प्रेष्यन्दुर्योधनमते स्थितः।।
2-76-72a
2-76-72b
स्थूणासहस्रैर्बृहतीं शतद्वारां सभां मम।
मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तुं शिल्पिनः।।
2-76-73a
2-76-73b
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तां तक्ष्ण आनाय्य सर्वशः।
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मेऽशनैः।।
2-76-74a
2-76-74b
दूर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः।
धृतराष्ट्रो महाराज प्राहिणोद्विदुराय वै।।
2-76-75a
2-76-75b
अपृष्ट्वा विदुरं स्वस्यन नासीत्कश्चिद्विनिश्चयः।
द्यूते दोषांश्च जानन्स पुत्रस्नेहादकृष्यत।।
2-76-76a
2-76-76b
तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान्कलिद्वारमुपस्थितम्।
विनाशमुखमुत्पन्नं धृतराष्ट्रमुपाद्रवत्।।
2-76-77a
2-76-77b
सोऽभिगम्य महात्मानं भ्राता भ्रातरमग्रजम्।
मूर्ध्ना प्रणम्य चरणाविदं वचनमब्रवीत्।।
2-76-78a
2-76-78b
विदुर उवाच। 2-76-79x
नाभिनन्दामि ते राजन्व्यवसायमिमं प्रभो।
पुत्रैर्भेदो यथा न स्थाद्‌द्यूतहेतोस्तथा कुरु।।
2-76-79a
2-76-79b
धृतराष्ट्र उवाच। 2-76-80x
क्षत्तः पुत्रेषु पुत्रैर्मे कलहो न भविष्यति।
यदि देवाः प्रसादं नः करिष्यन्ति न संशयः।।
2-76-80a
2-76-80b
अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाऽहितम्। 2-76-81a
मयि सन्निहिते द्रोणे भीष्मे त्वयि च भारत।
अनयो दैवविहितो न कथञ्चिद्भविष्यति।।
2-76-82a
2-76-82b
गच्छ त्वं रथमास्थाय हयैर्वातसमैर्जवे।
खाण्डवप्रस्थमद्यैव समानय युधिष्ठिरम्।।
2-76-83a
2-76-83b
न वाच्यो व्यवसायो मे विदुरैतद्ब्रवीमि ते।
दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते।।
2-76-84a
2-76-84b
इत्युक्तो विदुरो धीमान्नेदमस्तीति चिन्तयन्।
आपगेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत्सुदुः खितः।।
2-76-85a
2-76-85b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
द्यूतपर्वणि षट्‌सप्ततितमोऽध्यायः।। 76 ।।

टिप्पणी[सम्पाद्यताम्]

2-76-9 कुतोमूलं किंमुलम्। कुतइति प्रथमार्थे तसिः।। 2-76-29 कदलीमृगा हरिणविशेषास्तेषां मोकान्यजिनानि तान्येव कृष्णश्यामारुणानि चित्र वर्णानीत्यर्थः।। 2-76-34 वाटाः क्षेत्रादिवृत्तयस्तासां धाना अभिनवोद्भेदो येषां ते सस्यादिसम्पन्नक ्षेत्रादिवृत्तिमन्त इत्यर्थः।। 2-76-37 शैक्यं वरत्रामयं पात्राधारभूतं शिक्यं कावडीति प्रसिद्धं तत्र स्थितं पात् रं शैक्यम्। एतेन सामुद्रय आप उक्ताः।।

सभापर्व-075 पुटाग्रे अल्लिखितम्। सभापर्व-077
"https://sa.wikisource.org/w/index.php?title=महाभारतम्-02-सभापर्व-076&oldid=50520" इत्यस्माद् प्रतिप्राप्तम्