महाभारतम्-02-सभापर्व-069

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  103. 103

शिशुपाले सन्नद्धे सति उत्पातदर्शनेन युधिष्ठिरस्य प्रश्ने नारदेन तत्तदुत ्पातानां विशिष्य फलकथनम्।।

वैशम्पायन उवाच।। 2-69-1x
ततो युद्धाय संनद्धं चेदिराजं युधिष्ठिरः।
दृष्ट्वा मतिमतां श्रेष्ठो नारदं समुवाच ह।।
2-69-1a
2-69-1b
युधिष्ठिर उवाच।। 2-69-2x
अन्तरिक्षे च भूमौ च तेऽस्त्यविदितं क्वचित्।
यानि राजविनाशाय भौमानि च खगानि च।।
2-69-2a
2-69-2b
निमित्तानीह जायन्ते उत्पाताश्च पृथग्विधाः।
एतदित्छामि कार्त्स्न्येन श्रोतुं त्वत्तो महामुने।।
2-69-3a
2-69-3b
वैशम्पायन उवाच। 2-69-4x
इत्येवं मितमान्विप्रः कुरुराजस्य धीमतः।
पृच्छतः सर्वमव्यग्रमाचचक्षे महायशाः।।
2-69-4a
2-69-4b
नारद उवाच।। 2-69-5x
पराक्रमं च मार्गं च संनिपातं समुच्छ्रयम्।
आरोहणं कुरुश्रेष्ठ अन्योन्यं प्रतिसर्पणम्।।
2-69-5a
2-69-5b
पश्मीनां व्यतिसंसर्गं व्यायामं वृत्तिपीडनम्।
दर्शनादर्शनं चैव अदृश्यानां च दर्शनम्।।
2-69-6a
2-69-6b
हानिं वृद्धिं च ह्रासं च वर्णस्थानं बलाबलम्।
सर्वमेतत्परीक्षेत ग्रहाणां ग्रहकोविदः।।
2-69-7a
2-69-7b
भौमाः पूर्वं प्रवर्तन्ते खेचराश्च ततः परम्।
उत्पद्यन्ते च लोकेऽस्मिन्नुत्पाता देवनिर्मिताः।।
2-69-8a
2-69-8b
यदा तु सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते।
अपरेण गते सूर्ये तत्पराभवलक्षणम्।।
2-69-9a
2-69-9b
अच्छाये विमलच्छाया प्रतिच्छायेव दृश्यते।
यत्र चैत्यकवृक्षाणां तत्र विद्यान्महद्भयम्।।
2-69-10a
2-69-10b
शीर्णपर्णप्रवालाश्च शुष्कपर्णाश्च चैत्यकाः।
अपभ्रष्टप्रवालाश्च तत्राभावं विनिर्दिशेत्।।
2-69-11a
2-69-11b
स्निग्धपर्णप्रवालाश्च दृश्यन्ते यत्र चैत्यकाः।
ईहमानाश्च वृक्षाश्च भावस्तत्र न संशयटः।।
2-69-12a
2-69-12b
पुष्पे पुष्पं प्रजायेत फले वा फलमाश्रितम्।
राजा वा राजमात्रो वा मरणायोपपद्यते।।
2-69-13a
2-69-13b
प्रावृट्छरदि हेमन्ते वसन्ते वापि सर्वशः।
आकालिकं पुष्पफलं राष्ट्रक्षोभं विनिर्दिशेत्।।
2-69-14a
2-69-14b
नदीनां स्त्रोतसोऽकाले द्योतयन्ति महाभयम्।
वनस्पतिः पूज्यमानः पूजितोऽपूजितोऽपि वा।।
2-69-15a
2-69-15b
यदा भज्येत वातेन भिद्यते नमितोऽपि वा।
अग्निवायुभयं विद्याच्छ्रेष्ठो वापि विनश्यति।।
2-69-16a
2-69-16b
दिशः सर्वाश्च दीप्यन्ते जायन्ते राजविभ्रमाः।
भिद्यमानो यदा वृक्षो निनदेच्चापि पातितः।
सह राष्ट्रं च पतितं नतं वृक्षं प्रपातयेत्।।
2-69-17a
2-69-17b
2-69-17c
अथैनं छेदयेत्कश्चित्प्रतिक्रुद्धो वनस्पतिः।
छेत्ता भेत्ता पतिश्चैव क्षिप्रमेव नशिष्यति।।
2-69-18a
2-69-18b
देवतानां च पतनं मष्टपानां च पातनम्।
अचलानां प्रकम्पश्च तत्पराभवलक्षणम्।।
2-69-19a
2-69-19b
निशि चेन्द्रधनुर्दृष्टं ततोपि च महद्भयम्।
तद्द्रष्टरेव भीतिः स्यान्नान्येषां भरतर्षभ।।
2-69-20a
2-69-20b
रात्राविन्द्रधनुर्दृष्ट्वा तद्राष्ट्रं परिवर्जयेत्।। 2-69-21a
अर्चा यत्र प्रनृत्यन्त नदन्ति च हसन्ति च।
उन्मीलन्ति निमीलन्ति राष्ट्रक्षोभं विनिर्दिशेत्।।
2-69-22a
2-69-22b
शिला यदि प्रसिञ्चन्ति स्नेहांश्चोदकसम्भवान्।
अन्यद्वा विकृतं किञ्चित्तद्भयस्य निदर्शनम्।।
2-69-23a
2-69-23b
म्रियन्ते वा महामात्रा राजा सपरिवारकः।
पुरस्य या भवेद्व्याधी राष्ट्रे देशे च विभ्रमाः।।
2-69-24a
2-69-24b
देवतानां यदाऽऽवासे राज्ञां वा यत्र वेश्मनि।
भाण्डागारायुधागारे निविशेत यदा मधु।।
2-69-25a
2-69-25b
सर्वं तदा भवेत्स्थानं हन्यमानं बलीयसा।
आगन्तुकं भयं तत्र भवेदित्येव निर्दिशेत्।।
2-69-26a
2-69-26b
पादपश्चैव यो यत्र रक्तं स्रवति शोणितम्।
दन्ताग्रात्कुञ्जरो वापि शृङ्गाद्वा वृषभस्तथा।।
2-69-27a
2-69-27b
पादपाद्राष्ट्रिविभ्रंशः कुञ्जराद्राजविभ्रमः।
गोब्राह्मणविनाशः स्याद्वृवभस्येति निर्दिशेत्।।
2-69-28a
2-69-28b
छत्रं नरपतेर्यत्र निपतेत्पृथिवीतले।
सराष्ट्रो नृपती राजन्क्षिप्रमेव विनश्यति।।
2-69-29a
2-69-29b
देवागारेषु वा यत्र राज्ञो वा यत्र वेश्मनि।
विकृतं यदि दृश्येत नागावासेषु वा पुनः।।
2-69-30a
2-69-30b
तस्य देशस्य पीडा स्याद्राज्ञो जनपदस्य वा।
अनावृष्टिभयं घोरमतिदुर्भिक्षमादिशेत्।।
2-69-31a
2-69-31b
अर्चाया बाहुभङ्गेन गृहस्थानां भयं भवेत्।
भग्ने प्रहरणे विद्यात्सेनापतिविनाशनम्।।
2-69-32a
2-69-32b
आगन्तुका तु प्रतिमा स्थानं यत्र न विन्दति।
जभ्यन्तरेण षण्मासाद्राजा त्यजति तत्पुरम्।।
2-69-33a
2-69-33b
प्रदीर्यते मही यत्र विनदत्यपि पात्यते।
म्रियते तत्र राजा च तत्र राष्ट्रं विनश्यति।।
2-69-34a
2-69-34b
एणीपदान्वा सर्पान्वा डुण्डुभानथ दीप्यकान्।
मण्डूको ग्रसते यत्र तत्र राजा विनश्यति।।
2-69-35a
2-69-35b
अभिन्नं वाप्यपक्वं वा यत्रान्नमुपचीयते।
जीर्यन्ते वा म्रियन्ते वा तदन्नं नोपभुञ्जते।।
2-69-36a
2-69-36b
उदपाने च यत्रापो विवर्धन्ते युधिष्ठिर।
स्थावरेषु प्रवर्तन्ते निर्गच्छेन्न पुनस्ततः।।
2-69-37a
2-69-37b
अपादं वा त्रिपादं वा द्विशीर्षं वा चतुर्भुजम्।
स्त्रियो यत्र प्रसूयन्ते ब्रूयात्तत्र पराभवम्।।
2-69-38a
2-69-38b
अजैडकाः स्त्रियो गावो ये चान्ये च वियोनयः।
विकृतानि प्रजायन्ते तत्र तत्र पराभवः।।
2-69-39a
2-69-39b
नदी यत्र प्रतिस्रोता आवहेत्कलुषोदकम्।
दिशश्च न प्रकाशन्ते तत्पराभवलक्षणम्।।
2-69-40a
2-69-40b
एतानि च निमित्तानि यानि चान्यानि भारत।
केशवादेव जायन्ते भौमानि च खगानि च।।
2-69-41a
2-69-41b
चन्द्रादित्यौ ग्रहाश्चैव नक्षत्राणि च भारत।
वायुरग्निस्तथा चापः पृथिवी च जनार्दनात्।।
2-69-42a
2-69-42b
यस्य देशस्य हानिं वा वृद्धिं वा कर्तुमिच्छति।
तस्मिन्देशे निमित्तानि तानि तानि करोत्ययम्।।
2-69-43a
2-69-43b
सोसौ चेदिपतेस्तात विनाशं समुपस्थितम्।
निवेदयति गोविन्दः स्वैरुपायैर्न संशयः।।
2-69-44a
2-69-44b
इयं प्रचलिता भूमिरशिवा वान्ति मारुताः।
राहुश्चाप्यपतत्सोममपर्वणि विशाम्पते।।
2-69-45a
2-69-45b
सनिर्घाताः पतन्त्युल्कास्तमः सञ्जायते भृशम्।
चेदिराजविनाशाय हरिरेष विजृम्भते।।
2-69-46a
2-69-46b
वैशम्पायन उवाच।। 2-69-47x
एवमुक्त्वा तु देवर्षिर्नारदो विरराम ह।
ताभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां तस्मिन्युद्ध उपस्थिते।
2-69-47a
2-69-47b
ददृशुर्भूमिपालास्ते घोरानौत्पातिकान्बहून्।।
तत्र वै दृश्यमानानां दिक्षु सर्वासु भारत।
2-69-48a
2-69-48b
अश्रूयन्त तदा राजञ्छिवानामशिवा रवाः।।
ररास च मही कृत्स्ना सवृक्षवनपर्वता।
2-69-49a
2-69-49b
अपर्वणि च मध्याह्ने मूर्यं स्वर्भानुरग्रसत्।।
ध्वजाग्रे चेदिराजस्य सर्वरत्नपरिष्कृते।
2-69-50a
2-69-50b
अपतत्खाच्च्युतो गृध्रस्तीक्ष्णतुण्डः परन्तप।।
आरण्यैः सहसा हृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः।
2-69-51a
2-69-51b
चुक्रुशुर्भैरवं तत्र तस्मिन्युद्ध उपस्थिते।।
एवमादिनि घोराणि भौमानि च स्वगानि च।
2-69-52a
2-69-52b
औत्पातिकान्यदृश्यन्त सङ्क्रुद्धे शार्ङ्गधन्वनि।। 2-69-53a
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
शिशुपालवधपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः।। 69 ।।
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