महाभारतम्-02-सभापर्व-039

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  103. 103

अभिषेचनदिने ब्राह्मणादीनामन्तर्वेदिप्रवेशः।। 1।।
भूभारक्षपणे नारदचिन्तनम्।। 2।।
पूर्वं सङ्क्षिप्योक्तायाः कृष्णागमनकथायाः किञ्चिद्विस्तरेण कथनम्।। 3।।
सहदेवेन श्रीकृष्णस्याग्रपूजाकरणम्।। 4।।
शिशुपालेन श्रीकृष्णस्याग्रपूजाऽसहनम्।। 5।।

वैशम्पायन उवाच।। 2-39-1x
ततोऽभिषेचनीयेऽह्नि ब्राह्मणा राजभिः सह।
अन्तर्वेदीं प्रविविशुः सत्कारार्हा महर्षयः।।
2-39-1a
2-39-1b
नारदप्रमुखास्तस्यामन्तर्वेद्यां महात्मनः।
समासीनाः शुशुभिरे सहराजर्षिभिस्तदा।।
2-39-2a
2-39-2b
समेता ब्रह्मभवने देवा देवर्षयस्तथा।
कर्मान्तरमुपासन्तो जजल्पुरमितौजसः।।
2-39-3a
2-39-3b
एवमेतन्न चाप्येवमेवं चैतन्न चान्यथा।
इत्यूचुर्बहवस्तत्र वितण्डां वै परस्परम्।।
2-39-4a
2-39-4b
कृशानर्थांस्ततः केचिदकृशांस्तत्र कुर्वते।
अकृशांश्च कृशांश्चक्रुर्हेतुभिः शास्त्रनिश्चयैः।।
2-39-5a
2-39-5b
तत्र मेधाविनः केचिदर्थमन्यैरुदीरितम्।
विचिक्षिपुर्यथा श्येना नभोगतमिवामिषम्।।
2-39-6a
2-39-6b
केचिद्धर्मार्थकुशलाः केचित्तत्र महाव्रताः।
रेमिरे कथयन्तश्च सर्वभाष्यविदां वराः।।
2-39-7a
2-39-7b
सा वेदिर्वेदसम्पन्नैर्देवद्विजमहर्षिभिः।
आबभासे समाकीर्णा नक्षत्रैर्द्यौरिवायता।।
2-39-8a
2-39-8b
न तस्यां सन्निधौ शूद्रः कश्चिदासीन्न चाव्रती।
अन्तर्वेद्यां तदा राजन्युधिष्ठिरनिवेशने।।
2-39-9a
2-39-9b
तां तु लक्ष्मीवतो लक्ष्मीं तदा यज्ञविधानजाम्।
तुतोष नारदः पश्यन्धर्मराजस्य धीमतः।।
2-39-10a
2-39-10b
अथ चिन्तां समापेदे स मुनिर्मनुजाधिप।
नारदस्तु तदा पश्यन्सर्वक्षत्रसमागमम्।।
2-39-11a
2-39-11b
सस्मार च पुरावृत्तां कथां तां पुरुषर्षभ।
अंशावतरणे याऽसौ ब्रह्मणो भवनेऽभवत्।।
2-39-12a
2-39-12b
देवानां सङ्गमं तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन।
नारदः पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम्।।
2-39-13a
2-39-13b
साक्षात्स विबुधारिघ्नः क्षत्रे नारायणो विभुः।
प्रतिज्ञां पालयंश्चेमां जातः परपुरञ्जयः।।
2-39-14a
2-39-14b
न्दिदेश पुरा योऽसौ विबुधान्भूतकृत्स्वयम्।
न्योन्यमभिनिघ्नन्तः पुनर्लोकानवाप्स्यथ।।
2-39-15a
2-39-15b
इति नारायणः शम्भुर्भगवान्भूतभावनः।
आदिश्य विबुधान्सर्वानजायत यदुक्षये।।
2-39-16a
2-39-16b
क्षितावन्धकवृष्णीनां वंशे वंशभृतां वरः।
परया शुशुभे लक्ष्म्या नक्षत्राणामिवोडुराट्।।
2-39-17a
2-39-17b
यस्य बाहुबलं सेन्द्राः सुराः सर्व उपासते।
सोयं मानुषवन्नाम हरिरास्तेऽरिमर्दनः।।
2-39-18a
2-39-18b
अहो बत महद्भूतं स्वयम्भूर्यदिदं स्वयम्।
आदास्यति पुनः क्षत्रमेवं बलसमन्वितम्।।
2-39-19a
2-39-19b
इत्येतां नारदश्चिन्तां चिन्तयामास सर्ववित्।
हरिं नारायणं ज्ञात्वा यज्ञैरीज्यं तमीश्वरम्।।
2-39-20a
2-39-20b
तस्मिन्धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः।
महाध्वरे महाबुद्धिस्तस्थौ स बहुमानतः।।
2-39-21a
2-39-21b
`ततः समुदिता मुख्यैर्गुणैर्गुणवतां वराः।
बहवो भावितात्मानः पृथक्पृथगरिन्दमाः।।
2-39-22a
2-39-22b
आत्मकृत्यमिति ज्ञात्वा पाञ्चालास्तत्र सर्वशः।
समीयुर्वृष्णयश्चैव तदाऽनीकाग्रहारिणः।।
2-39-23a
2-39-23b
दाराः सजनामात्या वहन्तो रत्नसञ्चयान्।
विकृष्टत्वाच्च देशस्य गुरुभारतया च ते।।
2-39-24a
2-39-24b
ययुः प्रमुदिताः पश्चाद्भगवन्तं समन्वयुः।
बलशेषं समुदितं परिगृह्य समन्ततः।।
2-39-25a
2-39-25b
अजश्चक्रायुधः शौरिरमित्रगणमर्दनः।
बलाधिकारे निक्षिप्य संमान्यानकदुन्दुभिम्।।
2-39-26a
2-39-26b
सम्प्रायाद्यादवश्रेष्ठो जयमाने युधिष्ठिरे।
उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः।।
2-39-27a
2-39-27b
धनौघं पुरतः कृत्वा खाण्डवप्रस्थमाययौ।
तत्र यज्ञगतान्पश्यंश्चैद्यवर्गसमागतान्।।
2-39-28a
2-39-28b
भूमिपालगणान्सर्वान्सप्रभानिव तोयदान्।
घकायान्निवसतो यूथपानिव यूथपः।।
2-39-29a
2-39-29b
बलिनः सिंहसङ्काशान्महीमावृत्य तिष्ठतः।
ततो जनौघसम्बाधं राजसागरमव्ययम्।।
2-39-30a
2-39-30b
नादयन्रथघोषेण ह्युपायान्मधुसूदनः।
असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना।।
2-39-31a
2-39-31b
कृष्णेन समुपेतेन जहर्षे भारतं पुरम्।
ब्राह्मणक्षत्रियाणां तु पूजार्थं ह्यर्थधर्मवित्।।
2-39-32a
2-39-32b
सहदेवो विशेषज्ञो माद्रीपुत्रः कृतोऽभवत्।
भगवन्तं तु भूतानां भास्वन्तमिव तेजसा।।
2-39-33a
2-39-33b
विशन्तं यज्ञभूमिं तां सितस्यावरजं प्रभुम्।
तेजोराशिमृषिं विप्रमदृश्यं वै विजानताम्।।
2-39-34a
2-39-34b
वयोधिकानां वृद्धानां मार्गमात्मनि तिष्ठताम्।
जगतस्तस्थुषश्चैव प्रभवाप्ययमच्युतम्।।
2-39-35a
2-39-35b
अनन्तमन्तं शत्रूणाममित्रगणमर्दनम्।
प्रभवं सर्वभूतानामापत्स्वभयमच्युतम्।।
2-39-36a
2-39-36b
भविष्यं भावनं भूतं द्वारवत्यामरिन्दमम्।
स दृष्ट्वा कृष्णमायान्तं प्रतिपूज्यामितौजसम्।।
2-39-37a
2-39-37b
यथार्हं केशवे वृत्तिं प्रत्यपद्यत पाण्डवः।
ज्यैष्ठ्यकानिष्ठ्यसंयोगं सम्प्रधार्य गुणागुणैः।।
2-39-38a
2-39-38b
आरिराधयिषुर्धर्मः पूजयित्वा द्विजोत्तमान्।
महदादित्यसङ्काशमासनं च जगत्पतेः।
ददौ नासादितं कैश्चित्तस्मिन्नुपविवेश सः'।।
2-39-39a
2-39-39b
2-39-40c
ततो भीष्मोऽब्रवीद्राजन्धर्मराजं युधिष्ठिरम्।
क्रियतामर्हणं राज्ञां यथार्हमिति भारत।।
2-39-40a
2-39-40b
आचार्यमृत्विजं चैव संयुजं च युधिष्ठिर।
स्नातकं च प्रियं प्राहुः षडर्घार्हान्नृपं तथा।।
2-39-41a
2-39-41b
एतानर्घ्यानभिगतानाहुः संवत्सरोषितान्।
त इमे कालपूगस्य महतोऽस्मानुपागताः।।
2-39-42a
2-39-42b
एषामेकैकशो राजन्नर्घ आनीयतामिति।
अथ तैषां वरिष्ठाय समर्थायोपनीयताम्।।
2-39-43a
2-39-43b
युधिष्ठिर उवाच।। 2-39-44x
कस्मै भवान्मन्यतेऽर्घमेकस्मै कुरुनन्दन।
उपनीयमानं युक्तं च तन्मे ब्रूहि पितामह।।
2-39-44a
2-39-44b
वैशम्पायन उवाच।। 2-39-45x
ततो भीष्मः शान्तनवो बुद्ध्या निश्चित्य वीर्यवान्।
वार्ष्णेयं मन्यते कृष्णमर्हणीयतमं भुवि।।
2-39-45a
2-39-45b
भीष्ण उवाच।। 2-39-46x
एष ह्येषां समस्तानां तेजोबलपराक्रमैः।
मध्ये तपन्निवाभाति ज्योतिषामिव भास्करः।।
2-39-46a
2-39-46b
असूर्यमिव सूर्येण निर्वातमिव वायुना।
भासितं ह्लादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि नः।।
2-39-47a
2-39-47b
तस्मै भीष्माभ्यनुज्ञातः सहदेवः प्रतापवान्।
उपजह्रेऽथ विधिवद्वार्ष्णेयायार्घ्यमुत्तमम्।।
2-39-48a
2-39-48b
`गामर्घ्यं मधुपर्कं च ह्यानीयोपाहरत्तदा।
एतस्मिन्नन्तरे राजन्निदमासीत्तदाऽद्भुतम्।।
2-39-49a
2-39-49b
तां दृष्ट्वा क्षत्रियाः सर्वे पूजां कृष्णस्य भूयसीम्।
सम्प्रेक्ष्यान्योन्यमासीना हृदयैस्तामधारयन्'।।
2-39-50a
2-39-50b
प्रतिजग्राह तां कृष्णः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।
शिशुपालस्तु तां पूजां वासुदेवे न चक्षमे।।
2-39-51a
2-39-51b
उपालभ्य स भीष्मं च धर्मराजं च संसदि।
अवाक्षिपद्वासुदेवं चेदिराजो महाबलः।।
2-39-52a
2-39-52b
`तेषामाकारभावज्ञः सहदेवो न चक्षमे।
मानिनां बलिनां राज्ञां पुरुः सन्दर्शिते पदे।।
2-39-53a
2-39-53b
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीत्सहदेवस्य मूर्धनि।
जन्मप्रभृति वृष्णीना सुनीथः शत्रुरब्रवीत्।।
2-39-54a
2-39-54b
प्रष्टा वियोनिजो राजा प्रतिवक्ता नदीसुतः।
प्रतिग्रहीता गोपालः प्रदाता च वियोनिजः।।
2-39-55a
2-39-55b
सदस्या मूकवत्सर्वे आसतेऽत्र किमुच्यते।
इत्युक्त्वा स विहस्याशु पाण्डुं पुनरब्रवीत्।।
2-39-56a
2-39-56b
अतिपश्यसि वा सर्वान्न वा पश्यसि पाण्डव।
तिष्ठत्स्वन्येषु पूज्येषु गोपमर्चितवानसि।।
2-39-57a
2-39-57b
एते चैवोभये तात कार्यस्य तु विनाशके।
अतिदृष्टिरदृष्टिर्वा तयोः किं त्वं समास्थितः'।।
2-39-58a
2-39-58b
।। इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि
दिग्विजयपर्वणि एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः।।39।।

टिप्पणी[सम्पाद्यताम्]

2-39-41 संयुजं सम्बन्धिनं श्वशुरादिम्। प्रियं मित्रम्।। 2-39-52 अवाक्षिपद्दूषितवान्।।

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