लिङ्गपुराणम् - पूर्वभागः/अध्यायः ४३

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नंदीकेश्वर उवाच।।
मया सह पिता हृष्टः प्रणम्य च महेश्वरम्।।
उटजं स्वं जगामाशु निधिं लब्ध्वेव निर्धनः।। ४३.१ ।।

यदागतोहमुटजं शिलादस्य महामुने।।
तदा वै दैविकं रूपं त्यक्त्वा मानुष्य मास्थितः।। ४३.२ ।।

नष्टा चैव स्मृतिर्दिव्या येन केनापि कारणात्।।
मानुष्यमास्थितं दृष्ट्वा पिता मे लोकपूजितः।। ४३.३ ।।

विललापाति दुःखार्तः स्वजनैश्च समावृतः।।
जातकर्मादिकाश्चैव चकार मम सर्ववित्।। ४३.४ ।।

शालंकायनपुत्रो वै शिलादः पुत्रवत्सलः।।
उपदिष्टा हि तेनैव ऋक्शाखा यजुषस्तथा।। ४३.५ ।।

समाशाखासहस्रं च साङ्गोपाङ्गं महामुने।।
आयुर्वेदं धनुर्वेदं गांधर्वं चाश्वलक्षणम्।। ४३.६ ।।

हरितनां चरितं चैव नराणां चैव लक्षणम्।।
संपूर्णे सप्तमे वर्षे ततोथ मुनिसत्तमौ।। ४३.७ ।।

मित्रावरुणनामानौ तपोयोगबलान्वितौ।।
तस्याश्रमं गतौ दिव्यौ द्रष्टु मां चाज्ञया विभोः।। ४३.८ ।।

ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः।।
तात नंद्ययमल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः।। ४३.९ ।।

न दृष्टमेवमाश्चर्यमायुर्वर्षादतः परम्।।
इत्युक्तवति विप्रेन्द्रः शिलादः पुत्रवत्सलः।। ४३.१೦ ।।

समालिंग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्।।
हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च समंततः।। ४३.११ ।।

अहो बलं दैवविधोर्विधातुश्चोति दुःखितः।।
तस्य चार्तस्वरं श्रुत्वा तदाश्रमनिवासिनः।। ४३.१२ ।।

निपेतुर्विह्वलात्यर्थं रक्षाश्चक्रुश्च मंगलम्।।
तुष्टुवुश्च महादेव त्रियंबकमुमापतिम्।। ४३.१३ ।।

हुत्वा त्रियंबकेनैव मधुनैव च संप्लुताम्।।
दूर्वामयुतसंख्यातां सर्व द्रव्यसमन्विताम्।। ४३.१४ ।।

पिता विगतसंज्ञश्च तथा चैव पितामहः।।
विचेष्टश्च ललापासौ मृतवन्निपपात च।। ४३.१५ ।।

मृत्योर्भीतोहमचिराच्छिरसा चाभिवंद्य तम्।।
मृतवत्पतितं साक्षात्पितरं च पितामहम्।। ४३.१६ ।।

प्रदक्षिणीकृत्य च तं रुद्रजाप्यरतोऽभवम्।।
हृत्पुंडरीके सुषिरे ध्यात्वा देवं त्रियंबकम्।। ४३.१७ ।।

त्र्यक्षं दशभुजं शान्तं पंचवक्त्रं सदाशिवम्।।
सरितश्चांतरे पुण्ये स्थितं मां परमेश्वरः।। ४३.१८ ।।

तुष्टोब्रवीन्महादेवः सोमः सोमार्धभूषणः।।
वत्स नंदीन्महाबाहो मृत्योर्भीतिः कुतस्तव।। ४३.१९ ।।

मयैव प्रेषितौ विप्रौ मत्समस्त्वं न संशयः।।
वत्सैनत्तव देहं च लौकिकं परमार्थतः।। ४३.२೦ ।।

नास्त्येव दैविकं दृष्टं शिलादेन पुरा तव।।
देवैश्च मुनिभिः सिद्धैर्गंधर्वैर्दानवोत्तमैः।। ४३.२१ ।।

पूजितं यत्पुरा वत्स दैविकं नंदिकेश्वर।।
संसारस्य श्वभावोयं सुखं दुःखं पुनः पुनः।। ४३.२२ ।।

नृणां योनिपरित्यागः सर्वथैव विवेकिनः।।
एवमुक्त्वा तु मां साक्षात्सर्वदेवमहेश्वरः।। ४३.२३ ।।

कराभ्यां सुशुभाभ्यां च उभाभ्यां परमेश्वरः।।
पस्पर्श भगवान् रुद्रः परमार्तिहरो हरः।। ४३.२४ ।।

उवाच च महादेवस्तुष्टात्मा वृषभध्वजः।।
निरीक्ष्य गणपांश्चैव देवीं हिमवतः सुताम्।। ४३.२५ ।।

समालोक्य च तुष्टात्मा महादेवः सुरेश्वरः।।
अजरो जरया त्यक्तो नित्यं दुःखविवर्जितः।। ४३.२६ ।।

अक्षयश्चाव्ययश्चैव सपिता ससुहृज्जनः।।
ममेष्टो गणपश्चैव मद्वीर्यो मत्पराक्रमः।। ४३.२७ ।।

इष्टो मम सदा चैव मम पार्श्वगतः सदा।।
मद्ब्रलश्चैव भविता महायोगबलान्वितः ४३.२८ ।।

एवमुक्त्वा च मां देवो भगवान् सगणस्तदा।।
कुशेशयमयीं मालां समुन्मुच्यात्मनस्तदा।। ४३.२९ ।।

आबबंध महातेजा मम देवो वृषध्वजः।।
तयाहं मालया जातः शुभया कण्ठसक्तया।। ४३.३೦ ।।

त्र्यक्षो दशभुजश्चैव द्वितीयं इव शंकरः।।
तत एव समादाय हस्तेन परमेश्वरः।। ४३.३१ ।।

उवाच ब्रूहि किं तेद्य ददामि वरमुत्तमम्।।
ततो जटाश्रितं वारि गृहीत्वा चातिनिर्मलम्।। ४३.३२ ।।

उक्ता नदी भवस्वेति उत्ससर्ज वृषध्वजः।।
ततः सा दिव्यतोया च पूर्णासितजला शुभा।। ४३.३३ ।।

पद्मोत्पलवनोपेता प्रावर्तत महानदी।।
तामाह च महादेवो नदीं परम शोभनाम्।। ४३.३४ ।।

यस्माज्जटोदकादेव प्रवृत्ता त्वं महानदी।।
तस्माज्जटोदका पुण्या भविष्यसि सरिद्वरा।। ४३.३५ ।।

त्वयि स्नात्वा नरः कश्चित्सर्वपापैः प्रमुच्यते।।
ततो देव्या महादेवः शिलादतनयं प्रभुः।। ४३.३६ ।।

पुत्रस्तेऽयमिति प्रोच्य पादयोः संन्यपातयत्।।
सा मामाघ्राय शिरसिपाणिभ्यां परिमार्जती।। ४३.३७ ।।

पुत्रप्रेम्णाभ्यषिञ्चच्च स्रोतोभिस्तनयैस्त्रिभिः।।
पयसा शंखगौरेण देवदेवं निरीक्ष्य सा।। ४३.३८ ।।

तानि स्रोतांसि त्रीण्यस्याः स्रोतस्विन्योभवंस्तदा।।
नदीं त्रिस्रोतसं देवो भगवानवदद्भवः।। ४३.३९ ।।

त्रिस्रोतसं नदीं दृष्ट्वा वृषः परमहर्षितः।।
ननाद नादात्तस्माच्च सरिदन्या ततोऽभवत्।। ४३.४೦ ।।

वृषध्वनिरिति ख्याता देवदेवेन सा नदी।।
जांबूनदमयं चित्रं सर्वरत्नमयं शुभम्।। ४३.४१ ।।

स्वं देवश्चाद्भुतं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा।।
मुकुटं चाबबंधेशो मम मूर्ध्नि वृषध्वजः।। ४३.४२ ।।

कुंडले च शुभे दिव्ये वज्रवैडूर्यभूषिते।।
आबबंध महादेवः स्वयमेव महेश्वरः।। ४३.४३ ।।

मां तथाभ्यर्चितं व्योम्नो दृष्ट्वा मेघैः प्रभाकरः।।
मेघांभसा चाभ्यषिंचच्छिलादनमयो मुने।। ४३.४४ ।।

तस्याभिषिक्तस्य तदा प्रवृत्त स्रोतसा भृशम्।।
यस्मात्सुवर्णान्निःसृत्य नद्येषा संप्रवर्तते।। ४३.४५ ।।

स्वर्णोदकेति तामाह देवदेवस्त्रियंबकः।।
जाम्बूनदमयाद्यस्माद्द्वितीया मुकुटाच्छुभा।। ४३.४६ ।।

प्रावर्तत नदी पुण्या ऊवुर्जंबूनदीति ताम्।।
एतत्पंचनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम्।। ४३.४७ ।।

यः पंचनदमासाद्य स्नात्वा जप्येश्वरेश्वरम्।।
पूजयेच्छिवसायुज्यं नयात्येव न संशयः।। ४३.४८ ।।

अथ देवो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।।
देवीमुवाच शर्वाणीमुमां गिरिसुतामजाम्।। ४३.४९ ।।

देवी नंदीश्वरं देवमभिषिंचामि भूतपम्।।
गणेन्द्रं व्याहरिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये।। ४३.५೦ ।।

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भवानी हर्षितानना।।
स्मयंती वरदं प्राह भवं भूतपतिं पतिम्।। ४३.५१ ।।

सर्वलोकाधिपत्यं च गणेशत्वं तथैव च।।
दातुमर्हसि देवेश शैलादिस्तनयो मम।। ४३.५२ ।।

ततः स भगवाञ्शर्वः सर्वलोकेश्वरेश्वरः।।
सस्मार गणपान् दिव्यान्देवदेवो वृषध्वजः।। ४३.५३ ।।

इति श्रीलिंगमहापुराणे पूर्वभागे नंदिकेश्वरप्रादुर्भावनंदिकेश्वराभिषेकमंत्रो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः।। ४३ ।।