लिङ्गपुराणम् - पूर्वभागः/अध्यायः १०१

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ऋषय ऊचुः।।
कथं हिमवतः पुत्री बभूवांबा सती शुभा।।
कथं वा देवदेवेशमवाप पतिमीश्वरम्।। १०१.१ ।।

सूत उवाच।।
सा मेनानुमाश्रित्य स्वेच्छयैव वरांगना।।
तदा हैमवती जज्ञे तपसा च द्विजोत्तमाः।। १०१.२ ।।

जातकर्मादिकाः सर्वाश्चकार च गिरिश्वरः।।
द्वादशे च तदा वर्षे पूर्णे हैमवती शुभा।। १०१.३ ।।

तपस्तेपे तया सार्धमनुजा च शुभानना।।
अन्या च देवी ह्यनुजा सर्वलोके नमस्कृता।। १०१.४ ।।

ऋषयश्च तदा सर्वे सर्वलोकमहेश्वरीम्।।
तुष्टुस्तपसा देवीं समावृत्य समंततः।। १०१.५ ।।

ज्येष्ठा ह्यपर्णा ह्यनुजा चैकपर्णा शभानना।।
तृतीया च वारारोहा तथा चैवैकपाटला।। १०१.६ ।।

तपसा च महादेव्याः पर्वात्याः परमेश्वरः।।
वशीकृतो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।। १०१.७ ।।

एतस्मिन्नेव काले तु तारको नाम दानवः।।
तारात्मजो महातेजा बभूव दितिनंदनः।। १०१.८ ।।

तस्य पुत्रास्त्रयश्चापि तारकाक्षो महासुरः।।
विद्युन्माली च भगवान् कमलाक्षश्च वीर्यवान्।। १०१.९ ।।

पितामहस्तथा चैषां तारो नाम महाबलः।।
तपसा लब्धवीर्यश्च प्रसादाद्ब्रह्मणः प्रभोः।। १०१.१० ।।

सोपि तारो महातेजास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।।
विजित्य समरे पूर्वं विष्णुं च जितवानसौ।। १०१.११ ।।

तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु दिवारात्रमविश्रमम्।। १०१.१२ ।।

सरथं विष्णुमादाय चिक्षेप शतयोजनम्।।
तारेण विजितः संख्ये दुद्राव गरुडध्वजः।। १०१.१३ ।।

तारो वराञ्छतगुणं लब्ध्वा शतगुणं बलम्।।
पितामहाज्जगत्सर्वमवाप दितिनंदनः।। १०१.१४ ।।

देवेंद्रप्रमुखाञ्जित्वा देवान्देवेश्वरेश्वरः।।
वारयामास तैर्देवान्सर्वलोकेषु मायया।। १०१.१५ ।।

देवताश्च सहेंद्रेण तारकाद्भयपीडिताः।।
न शांतिं लेभिरे शूराः शरणं वा भयार्दिताः।। १०१.१६ ।।

तदामरपतिः श्रीमान् सन्निपत्यमरप्रभुः।।
उवाचांगिरसं देवो देवानामपि सन्निधौ।। १०१.१७ ।।

भगवंस्तारको नाम तारजो दानवोत्तमः।।
तेन सन्निहता युद्धे वत्सा गोपतिना यता।। १०१.१८ ।।

भयात्तस्मान्महाभाग बृहद्युद्धे बृहस्पते।।
अनिकेता भ्रमंत्येते शकुंता इव पंजरे।। १०१.१९ ।।

अस्माकं यान्यमोघानि आयुधान्यंगिरोवर।।
तानि मोघानि जायंते प्रभावादमरद्विषः।। १०१.२० ।।

दशवर्षसहस्राणि द्विगुणानि बृहस्पते।।
विष्णुना योधितो युद्धे तेनापि न च सूदितः।। १०१.२१ ।।

यस्तेनानिर्जितो युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना।।
कथमस्मद्विधस्तस्य स्थास्यते समरेऽग्रतः।। १०१.२२ ।।

एवमुक्त्स्तु शक्रेण जीवः सार्धं सुराधिपैः।।
सहस्राक्षेण च विभुं संप्राप्याह कुशध्वजम्।। १०१.२३ ।।

सोपि तस्य मुखाच्छ्रुत्वा प्रणयात्प्रणतार्तिहा।।
देवैरशेषैः सेंद्रैस्तु जीवमाह पितामहः।। १०१.२४ ।।

जाने वोर्तिं सुरेंद्राणां तथापि श्रृणु सांप्रतम्।।
विनिंद्यदक्ष या देवी सती रुद्रांगसंभवा।। १०१.२५ ।।

उमा हैमवती जज्ञे सर्वलोकनमस्कृता।।
तस्याश्चैवेह रूपेण यूयं देवाः सुरोत्तमाः।। १०१.२६ ।।

विभोर्यतध्वमाक्रष्टुं रुद्रस्यास्य मनो महत्।।
तयोर्योगेन संभूतः स्कंदः शक्तिधरः प्रभुः।। १०१.२७ ।।

षडास्यो द्वादशभुजः सेनानीः पावकिः प्रभुः।।
स्वाहेयः कार्तिकेयश्च गांगेयः शरधामजः।। १०१.२८ ।।

देवः शाखो विशाखश्च नैगमेशश्च वीर्यवान्।।
सेनापतिः कुमाराख्यः सर्वलोकनमस्कृतः।। १०१.२९ ।।

लीलयैव महासेनः प्रबलं तारकासुरम्।।
बालोपि विनहत्यैको देवान् संतारयिष्यति।। १०१.३० ।।

एवमुक्तास्तदातेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना।।
बृहस्पतिस्तथा सेंद्रैर्देवैर्देवं प्रणम्य तम्।। १०१.३१ ।।

मेरो शिखरमासाद्य स्मरं सस्मार सुव्रतः।।
स्मरणाद्देवदेवस्य स्मरोपि सह भार्यया।। १०१.३२ ।।

रत्या समं समागम्य नमस्कृत्य कृतांजलिः।।
सशक्रमाह तं जीवं जगज्जीवो द्विजोत्तमाः।। १०१.३३ ।।

स्मृतो यद्भवता जीव संप्राप्तोहं तवांतिकम्।।
ब्रूहि यन्मे विधातव्यं तमाह सुरपुजितः।। १०१.३४ ।।

तमाह भगवाञ्छक्रः संभाव्य मकरध्वजम्।।
शंकरेणांबिकामद्य संयोजय यथासुखम्।। १०१.३५ ।।

तया स रमते येन भगवान् वृषभध्वजः।।
तेन मार्गेण मार्गस्व पत्न्या रत्याऽनया सह।। १०१.३६ ।।

सोपि तुष्टो महादेवः प्रदास्यति शुभां गतिम्।।
विप्रयुक्तस्तया पूर्वं लब्द्वा तां गिरिजामुमाम्।। १०१.३७ ।।

एवमुक्तो नमस्कृत्य देवदेवं शचीपतिम्।।
देवदेवाश्रमं गंतुं मतिं चक्रे तया सह।। १०१.३८ ।।

गत्वा तदश्रये शंभोः सह रत्या महाबलः।।
वसंतेन सहायेन देवं योक्तुमनाभवत्।। १०१.३९ ।।

ततः संप्रेक्ष्य मदनं हसन् देवस्त्रियंवकः।।
नयनेन तृतीयेन सावज्ञं तमेवैक्षत।। १०१.४० ।।

ततोस्य नेत्रजो वह्निर्मदनं पार्श्वतः स्थितम्।।
अदहत्तत्क्षणादेव ललाप करुणं रतिः।। १०१.४१ ।।

रत्याः प्रलापमाकर्ण्य देवदेवो वृपध्वजः।।
कृपया परया प्राह कामपत्नीं निरीभ्य च।। १०१.४२ ।।

अमूर्त्तोपि ध्रुपं भद्र कार्यं सर्वं पतिस्तव।।
रतिकाले ध्रुवे भद्रे करिष्यति न संशयः।। १०१.४३ ।।

यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशाः।।
शापाद्भृगोर्महातेजाः सर्वलोकहितायवै।। १०१.४४ ।।

तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति।।
सा प्रणम्य तदा रुद्रं कामपत्नी शुचिस्मिता।। १०१.४५ ।।

जगाम भवनं लब्ध्वा वसंतेन समन्विता।। १०१.४६ ।।

इति श्रीलिंगमहापुराणे पूर्वभागे मदनदाहोनामैकाधिकशततमोध्यायः।। १०१ ।।