लिङ्गपुराणम् - पूर्वभागः/अध्यायः १८

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विष्णुरुवाच।।
एकाक्षराय रुद्राय अकारायात्मरूपिणे।।
उकारायादिदेवाय विद्यादेहाय वै नमः।। १८.१ ।।

तृतीयाय मकाराय शिवाय परमात्मने।।
सूर्याग्निसोमवर्णाय यजमानाय वै नमः।। १८.२ ।।

अग्नये रुद्ररूपाय रुद्राणां पतये नमः।।
शिवाय शिवमंत्राय सद्योजाताय वेधसे।। १८.३ ।।

वामाय वामदेवाय वरदायामृताय ते।।
अघोरायातिघोराय सद्योजाताय रंहसे।। १८.४ ।।

ईशानाय श्मशानाय अतिवेगाय वेगिने।।
नमोस्तु श्रुतिपादाय ऊर्ध्वलिंगाय लिंगिने।। १८.५ ।।

हेमलिंगाय हेमाय वारिलिंगाय चांभसे।।
शिवाय शिव लिंगाय व्यापिने व्योमव्यापिने।। १८.६ ।।

वायवे वायुवेगाय नमस्ते वायुव्यापिने।।
तेजसे तेजसां भर्त्रे नमस्तेजोधिव्यापिने।। १८.७ ।।

जलाय जलभूताय नमस्ते जलव्यापिने।।
पृथिव्यै चांतरिक्षाय पृथिवीव्यापिने नमः।। १८.८ ।।

शब्दस्पर्शस्वरूपाय रसगंधाय गंधिने।।
गणाधिपतये तुभ्यं गुह्यद्गुह्यतमाय ते।। १८.९ ।।

अनंताय विरुपाय अनंतानामयाय च।।
शाश्वताय वरिष्ठाय वारिगर्भाय योगिने।। १८.१೦ ।।

संस्थिता याम्भसां मध्ये आवयोर्मध्यवर्चसे।।
गोप्त्रे हर्त्रे सदा कर्त्रे निधनायेश्वराय च।। १८.११ ।।

अचेतनाय चिंत्याय चेतनायासहारिणे।।
अरूपाय सुरूपाय अनंगायाङ्गहारिणे।। १८.१२ ।।

भस्मदिग्धशरीराय भानुसोमाग्निहेतवे।।
श्वेताय श्वेतवर्णाय तुहिनाद्रिचराय च।। १८.१३ ।।

सुश्वेताय सुवक्त्राय नमः श्वेतशिखाय च।।
श्वेतास्याय महास्याय नमस्ते श्वेतलोहित।। १८.१४ ।।

सुताराय विशिष्टाय नमो दुंदुभिने हर।।
शतरूप विरुपाय नमः केतुमते सदा।। १८.१५ ।।

ऋद्धिशोकविशोकाय पिनाकाय कपर्दिने।।
विपाशाय सुपाशाय नमस्ते पाशनाशिने।। १८.१६ ।।

सुहोत्राय हविष्याय सुब्रह्मण्याय सूरिणे।।
सुमुखाय सुवक्त्राय दुर्दमाय दमाय च।। १८.१७ ।।

कंकाय कंकरूपाय कंकणीकृतपन्नग।।
सनकाय नमस्तुभ्यं सनातन सनंदन।। १८.१८ ।।

सनत्कुमार सारंगमारणाय महात्मने।।
लोकाक्षिणे त्रिधामाय नमो विरजसे सदा।। १८.१९ ।।

शंखपालाय शंखाय रजसे तमसे नमः।।
सारस्वताय मेघाय मेघवाहन ते नमः।। १८.२೦ ।।

सुवाहाय विवाहाय विवादवरदाय च।।
नमः शिवाय रुद्राय प्रधानाय नमोनमः।। १८.२१ ।।

त्रिगुणाय नमस्तुभ्यं चतुर्व्यूहात्मने नमः।।
संसाराय नमस्तुभ्यं नमः संसारहेतवे।। १८.२२ ।।

मोक्षाय मोक्षरूपाय मोक्षकर्त्रे नमोनमः।।
आत्मने ऋषये तुभ्यं स्वामिने विष्णवे नमः।। १८.२३ ।।

नमो भगवते तुभ्यं नागानां पतये नमः।।
ओंकाराय नमस्तुभ्यं सर्वज्ञाय नमो नमः।। १८.२४ ।।

सर्वाय च नमस्तुभ्यं नमो नारायणाय च।।
नमो हिरण्यगर्भाय आदिदेवाय ते नमः।। १८.२५ ।।

नमोस्त्वजाय पतये प्रजानां व्यूहहेतवे।।
महादेवाय देवानामीश्वराय नमो नमः।। १८.२६ ।।

शर्वाय च नमस्तुभ्यं सत्याय शमनाय च।।
ब्रह्मणे चैव भूतानां सर्वज्ञाय नमो नमः।। १८.२७ ।।

महात्मने नमस्तुभ्यं प्रज्ञारूपाय वै नमः।।
चितये चितिरूपाय स्मृतिरूपाय वै नमः।। १८.२८ ।।

ज्ञानाय ज्ञानगम्याय नमस्ते संविदे सदा।।
शिखराय नमस्तुभ्यं नीलकंठाय वै नमः।। १८.२९ ।।

अर्धनारीशरीराय अव्यक्ताय नमोनमः।।
एकादशविभेदाय स्थाणवे ते नमः सदा।। १८.३೦ ।।

नमः सोमाय सूर्याय भवाय भवहारिणे।।
यशस्कराय देवाय शंकरायेश्वराय च।। १८.३१ ।।

नमोंबिकाधिपतये उमायाः पतये नमः।।
हिरण्यबाहवे तुभ्यं नमस्ते हेमरेतसे।। १८.३२ ।।

नीलकेशाय वित्ताय शितिकंठाय वै नमः।।
कपर्दिने नमस्तुभ्यं नागांगाभरणाय च।। १८.३३ ।।

वृषारूढाय सर्वस्य हर्त्रे कर्त्रे नमोनमः।।
वीररामातिरामाय रामनाथाय ते विभो।। १८.३४ ।।

नमो राजाधिराजाय राज्ञामधिगताय ते।।
नमः पालाधिपतये पालाशाकृंतते नमः।। १८.३५ ।।

नमः केयूरभूषाय गोपते ते नमोनमः।।
नमः श्रीकंठनाथाय नमो लिकुचपाणये।। १८.३६ ।।

भुवनेशाय देवाय वेदशास्त्र नमोस्तु ते।।
सारंगाय नमस्तुभ्यं राजहंसाय ते नमः।। १८.३७ ।।

कनकांगदहाराय नमः सर्पोपवीतिने।।
सर्पकुंडलमालाय कटिसूत्रीकृताहिने।। १८.३८ ।।

वेदगर्भाय गर्भाय विश्वगर्भाय ते शिव।।
ब्रह्मोवाच।।
विररामेति संस्तुत्वा ब्रह्मणा सहितो हरिः।। १८.३९ ।।

एतत्स्तोत्रवरं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।।
यः पठेच्छ्रावयेद्वापि ब्राह्मणान् वेदपारगान्।। १८.४೦ ।।

स याति ब्रह्मणो लोके पापकर्मरतोपि वै।।
तस्माज्जपेत्पठेन्नित्यं श्रावयेद्ब्राह्मणाञ्छुभान्।। १८.४१ ।।

सर्वपापविशुद्ध्यर्थं विष्णुना परिभाषितम्।। १८.४२ ।।
इति लिंगमहापुराणे पूर्वभागे विष्णुस्तवो नामाष्टादशोऽध्यायः।। १८ ।।