लिङ्गपुराणम् - पूर्वभागः/अध्यायः ५६

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
  11. अध्यायः ११
  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
  15. अध्यायः १५
  16. अध्यायः १६
  17. अध्यायः १७
  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
  20. अध्यायः २०
  21. अध्यायः २१
  22. अध्यायः २२
  23. अध्यायः २३
  24. अध्यायः २४
  25. अध्यायः २५
  26. अध्यायः २६
  27. अध्यायः २७
  28. अध्यायः २८
  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
  31. अध्यायः ३१
  32. अध्यायः ३२
  33. अध्यायः ३३
  34. अध्यायः ३४
  35. अध्यायः ३५
  36. अध्यायः ३६
  37. अध्यायः ३७
  38. अध्यायः ३८
  39. अध्यायः ३९
  40. अध्यायः ४०
  41. अध्यायः ४१
  42. अध्यायः ४२
  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
  45. अध्यायः ४५
  46. अध्यायः ४६
  47. अध्यायः ४७
  48. अध्यायः ४८
  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५
  56. अध्यायः ५६
  57. अध्यायः ५७
  58. अध्यायः ५८
  59. अध्यायः ५९
  60. अध्यायः ६०
  61. अध्यायः ६१
  62. अध्यायः ६२
  63. अध्यायः ६३
  64. अध्यायः ६४
  65. अध्यायः ६५
  66. अध्यायः ६६
  67. अध्यायः ६७
  68. अध्यायः ६८
  69. अध्यायः ६९
  70. अध्यायः ७०
  71. अध्यायः ७१
  72. अध्यायः ७२
  73. अध्यायः ७३
  74. अध्यायः ७४
  75. अध्यायः ७५
  76. अध्यायः ७६
  77. अध्यायः ७७
  78. अध्यायः ७८
  79. अध्यायः ७९
  80. अध्यायः ८०
  81. अध्यायः ८१
  82. अध्यायः ८२
  83. अध्यायः ८३
  84. अध्यायः ८४
  85. अध्यायः ८५
  86. अध्यायः ८६
  87. अध्यायः ८७
  88. अध्यायः ८८
  89. अध्यायः ८९
  90. अध्यायः ९०
  91. अध्यायः ९१
  92. अध्यायः ९२
  93. अध्यायः ९३
  94. अध्यायः ९४
  95. अध्यायः ९५
  96. अध्यायः ९६
  97. अध्यायः ९७
  98. अध्यायः ९८
  99. अध्यायः ९९
  100. अध्यायः १००
  101. अध्यायः १०१
  102. अध्यायः १०२
  103. अध्यायः १०३
  104. अध्यायः १०४
  105. अध्यायः १०५
  106. अध्यायः १०६
  107. अध्यायः १०७
  108. अध्यायः १०८

सूत उवाच।।
वीथ्याश्रयाणि चरति नक्षत्राणि निशाकरः।।
त्रिचक्रोभयतोश्वश्च विज्ञेयस्तस्य वै रथः।। ५६.१ ।।

शतारैश्च त्रिभिश्चक्रैर्युक्तः शुक्लैर्हयोत्तमैः।।
दशभिस्त्वकृशैर्दिवव्यैरसंगैस्तैर्मनोजवैः।। ५६.२ ।।

रथेनानेन देवैस्च पितृभिश्चैव गच्छति।।
सोमो ह्यम्बुमयै र्गौभिः शुक्लैः शुक्लगभस्तिमान्।। ५६.३ ।।

क्रमते शुक्लपक्षादौ भास्करात्परमास्थितः।।
आपूर्यते परस्यांतः सततं दिवसक्रमात्।। ५६.४ ।।

देवैः पीतं क्षये सोममाप्याययति नित्यशः।।
पीतं पञ्चदशाहं तु रश्मिनैकेन भास्करः।। ५६.५ ।।

आपूरयन् सुषुम्नेन भागंभागमनुक्रमात्।।
इत्येषा सूर्यवीर्येण चंद्रस्याप्यायिता तनुः।। ५६.६ ।।

स पौर्ममास्यां दृश्येत शुक्लः संपूर्णमंडलः।।
एवमाप्यायितं सोमं शुक्लपक्षे दिनक्रमात्।। ५६.७ ।।

ततो द्वितीयाप्रभृति बहुलस्य चतुर्दशीम्।।
पिबंत्यम्बुमयं देवा मधु सौम्यं सुधामृतम्।। ५६.८ ।।

संभृतं त्वर्धमासेन ह्यमृतं सूर्यतेजसा।।
पानार्थममृतं सोमं पौर्णमास्यामुपासते।। ५६.९ ।।

एकरात्रिं सुराः सर्वे पितृभिस्त्वृषिभिः सह।।
सोमस्य कृष्णपक्षादौ भास्कराभिमुखस्य च।। ५६.१೦ ।।

प्रक्षीयंते परस्यांतः पीयमानाः कलाः क्रमात्।।
त्रयस्त्रिंशच्छताश्चैव त्रयस्त्रिंशत्तथैव च।। ५६.११ ।।

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि देवाः सोमं पिबंति वै।।
एवं दिनक्रमात्पीते विबुधैस्तु निशाकरे।। ५६.१२ ।।

पीत्वार्धमासं गच्छन्ति अमावास्यां सुरोत्तमाः।।
पितरश्चोपतिष्ठंति अमावास्यां निशाकरम्।। ५६.१३ ।।

ततः पंचदशे भागे किंचिच्चिष्टे कलात्मके।।
अपराह्णे पितृगणा जघन्यं पर्युपासते।। ५६.१४ ।।

पिबंति द्विकलं कालं शिष्टा तस्य कला तु या।।
निस्सृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्।। ५६.१५ ।।

मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पीत्वा गच्छंति तेऽमृतम्।।
पितृभिः पीयमानस्य पंचदश्यां कला तु या।। ५६.१६ ।।

यावत्तु क्षीयते तस्य भागः पंचदशस्तु सः।।
अमावास्यां ततस्तस्या अंतरा पूर्यते पुनः।। ५६.१७ ।।

वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ।।
एवं सूर्यनिमित्तैषा पक्षवृद्धिर्निशाकरे।। ५६.१८ ।।

इति श्रीलिंगमहापुराणे पूर्वभागे सोमवर्णनं नाम षट्पंचाशत्तमोऽध्यायः।। ५६