महाभारतम्-09-शल्यपर्व-051

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← शल्यपर्व-050 महाभारतम्
नवमपर्व
महाभारतम्-09-शल्यपर्व-051
वेदव्यासः
शल्यपर्व-052 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066


देवलजैगीषव्ययोश्चरित्रकीर्तनम्।। 1 ।। बलभद्रस्यादित्यतीर्थात्सोमतीर्थगमनम्।। 2 ।।

वैशम्पायन उवाच। 9-51-1x
तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः।
गार्हिस्थ्यं धर्ममास्थाय ह्यसितो देवलः पुरा।।
9-51-1a
9-51-1b
धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो यज्ञशीलो महातपाः।
कर्मणा मनसा वाचा समः सर्वेषु जन्तुषु।।
9-51-2a
9-51-2b
अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।
प्रियाप्रिये तुल्यवृत्तिर्यमवत्समदर्शनः।।
9-51-3a
9-51-3b
काञ्चने लोष्ठके चैव समदर्शी महातपाः।
देवानपूजयन्नित्यमतिथींश्च द्विजैः सह।
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपरायणः।।
9-51-4a
9-51-4b
9-51-4c
ततोऽभ्येत्य महाभाग योगमास्थाय भिक्षुकः।
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः।।
9-51-5a
9-51-5b
देवलस्याश्रमे राजन्न्यवसत्स महाद्युतिः।
योगनित्यो महाराज सिद्धिं प्राप्तो महातपाः।।
9-51-6a
9-51-6b
तं तत्र वसमानं तु जैगीषव्यं महामुनिम्।
देवलो दर्शयन्नेव नैवायुञ्जत धर्मतः।।
9-51-7a
9-51-7b
एवं तयोर्महाराज दीर्घकालो व्यतिक्रमत्।। 9-51-8a
जैगीषव्यो मुनिस्तं तु ददर्शाथ स केवलम्।
आहारकाले मतिमान्परिव्राड् जमेजय।।
9-51-9a
9-51-9b
उपातिष्ठत धर्मज्ञो भैक्षकाले स देवलम्।
गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा।।
9-51-10a
9-51-10b
देवलस्तु यथाशक्ति पूजयामास भारत।
ऋषिदृष्टेन विधिना समा बहीः समाहितः।।
9-51-11a
9-51-11b
कदाचित्तस्य नृयते देवलस्य महात्मनः।
चिन्ता सुमहती जाता मुनिं दृष्ट्वा महाद्युतिम्।।
9-51-12a
9-51-12b
समास्तु समतिक्रान्ता बह्व्यः पूजयतो मम।
न चायमलसो भिक्षुरभ्यभाषत किञ्चन।।
9-51-13a
9-51-13b
एवं विगणयन्नेव स जगाम महोदधिम्।
अन्तरिक्षचरः श्रीमान्कलशं गृह्य देवलं।।
9-51-14a
9-51-14b
गच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां परिम्।
जैगीषव्यं ततोऽपश्यद्रतं प्रागेव भारत।।
9-51-15a
9-51-15b
ततः सविस्मयश्चिन्तां जगामाथामितप्रभः।
कथं सिक्षुरचं प्राप्तः समुद्रे स्नात एव च।।
9-51-16a
9-51-16b
इत्येवं चिन्तयामास महर्षिरसितस्तदा।
स्नात्वा सखुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप सः।।
9-51-17a
9-51-17b
कृतजxxxxx श्रीमानाश्रयं च जगाम ह।
xxxxxxxxxx गृहीत्वा जनमेजय।।
9-51-18a
9-51-18b
ततः स प्रविशन्नेव स्वमाश्रमपदं मुनिः।
xxxxxxxxx तत्र जैगीषव्यमपश्यत।।
9-51-19a
9-51-19b
न व्याहरति चैवेनं जैगीषव्यः कथञ्चन।
xxxxxxxx वसति स्म महातपाः।।
9-51-20a
9-51-20b
तं दृष्ट्वा चाप्लुतं तोये सामरे सागरोपमम्।
प्रविष्टxxxxx चापि पूर्वमेव ददर्श सः।।
9-51-21a
9-51-21b
xxxxx देवलो राजंश्चिन्तयामास बुद्धिमान्।
xxxxxxx तपसो जैगीषव्यास्व योगजम्।।
9-51-22a
9-51-22b
चिन्तयामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः।
मया दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथंन्वयम्।।
9-51-23a
9-51-23b
एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः।
उत्पपाताश्रमात्तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते।
जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः।।
9-51-24a
9-51-24b
9-51-24c
सोऽन्तरिक्षचरान्सिद्धान्समपश्यत्समाहितान्।
जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत।।
9-51-25a
9-51-25b
ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः।
अपश्यद्वै दिवं यातं जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-26a
9-51-26b
तस्माच्च पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत।
पितृलोकाच्च तं यातं याम्यं लोकमपश्यत।।
9-51-27a
9-51-27b
`तस्मादादित्यलोकं च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत।'
तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिष्टुतम्।
व्रजन्तमन्वपश्यत्स जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-28a
9-51-28b
9-51-28c
लोकान्समुत्पतन्तं तु शुभानेकान्तयाजिनाम्।
ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्ततश्चाप्युत्पपात ह।।
9-51-29a
9-51-29b
दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः।
तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुयाजिनाम्।
व्रजन्तं लोकममलमपश्यद्देवपूजितम्।।
9-51-30a
9-51-30b
9-51-30c
चातुर्मास्यैर्बहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः।
तेषां स्थानं ततो यतां तथाऽग्निष्टोमयाजिनाम्।।
9-51-31a
9-51-31b
अग्निष्टुतेन च तथा ये यजन्ति तपोधनः।
तत्स्थानमनुसम्प्राप्तमन्वपश्यत देवलः।।
9-51-32a
9-51-32b
वाजपेयं क्रतुवरं तथा बहुसुवर्णकम्।
आहरन्ति महाप्राज्ञास्तेषां लोकेष्वपश्यत।।
9-51-33a
9-51-33b
यजन्ते राजसूयेन पुण्डरीकेण चैव ये।
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-34a
9-51-34b
अश्वमेधं क्रतुवरं नरमेधं तथैव च।
आहरन्ति नरश्रेष्ठास्तेषां लोकेष्वपश्यत।।
9-51-35a
9-51-35b
सर्वमेधं च दुष्प्रापं तथा सौत्रामणिं च ये।
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-36a
9-51-36b
द्वादशाहैश्च सत्रैश्च यजन्ते विविधैर्नृप।
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-37a
9-51-37b
मैत्रावरुणयोर्लोकानादित्यानां तथैव च।
सलोकतामनुप्राप्तमपश्यत ततोऽसितः।।
9-51-38a
9-51-38b
रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च बृहस्पतेः।
तानिं सर्वाण्यतीतं च समपश्यत्ततोऽसितः।।
9-51-39a
9-51-39b
आरुह्य च गवां लोकं प्रयान्तं ब्रह्मसत्रिणाम्।
लोकानपश्यद्गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः।।
9-51-40a
9-51-40b
त्रील्लोँकान्प्रवरान्विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा।
पतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत।।
9-51-41a
9-51-41b
ततो मुनिवरं भूयो जैगीषव्यमथासितः।
नान्वपश्यत लोकस्थमन्तर्हितमरिन्दम।।
9-51-42a
9-51-42b
सोऽचिन्तयन्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः।
प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम्।।
9-51-43a
9-51-43b
असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान्।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान्ब्रह्मचारिणः।।
9-51-44a
9-51-44b
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसन्तु तपोधनाः।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे।।
9-51-45a
9-51-45b
सिद्धा ऊचुः। 9-51-46x
शृणु देवल भूतार्थं शंसतां नो दृढव्रत।
जैगीषव्यो गतो लोकं शाश्वतं ब्रह्मणोक्षयम्।।
9-51-46a
9-51-46b
वैशम्पायन उवाच। 9-51-47x
स श्रुत्वा वचनं तेषां सिद्धानां ब्रह्मचारिणाम्।
असिता देवलस्तूर्णमुत्पपात पपात च।।
9-51-47a
9-51-47b
ततः सिद्धास्त ऊचुर्हि देवलं पुनरेव ह।
न देवलगतिस्तत्र तव गन्तुं तपोधन।
ब्रह्मणः सदने विप्र जैगीषव्यो यदाप्तवान्।।
9-51-48a
9-51-48b
9-51-48c
वैशम्पायन उवाच। 9-51-49x
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सिद्धानां देवलः पुनः।
आनुपूर्व्येण लोकांस्तान्सर्वानवततार ह।।
9-51-49a
9-51-49b
स्वमाश्रमपदं पुण्यमाजगाम पतङ्गवत्।
प्रविशन्नेव चापश्यज्जैगीषव्यं स देवलः।।
9-51-50a
9-51-50b
ततो बुद्ध्या व्यगणयद्देवलो धर्मयुक्तया।
दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम्।।
9-51-51a
9-51-51b
ततोऽब्रविन्महात्मानं जैगीषव्यं स देवलः।
विनयावनतो राजन्नुपसर्प्य महामुनिम्।
मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम्।।
9-51-52a
9-51-52b
9-51-52c
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः।
विधिं योगस्य परमं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः।।
9-51-53a
9-51-53b
सन्नाये कृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः।
सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा।।
9-51-54a
9-51-54b
सन्न्यासे कृतबुद्धिं तं भूतानि पितृभिः सह।
ततो दृष्ट्वा प्ररुरुदुः कोऽस्मान्संविभजिष्यति।।
9-51-55a
9-51-55b
देवलस्तु वचः श्रुत्वा भूतानां करुणं तथा।
दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे।।
9-51-56a
9-51-56b
ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत।
पुष्पाण्योषधयश्चैव रोरूयन्ते सहस्रशः।।
9-51-57a
9-51-57b
पुनर्नो देवलः क्षुद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मतिः।
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा नावबुध्यते।।
9-51-58a
9-51-58b
ततो भूयो व्यगणयत्स्वबुद्ध्या मुनिसत्तमः।
मोक्षे गार्हस्थ्यधर्मे वा किन्नु श्रेयस्करं भवेत्।।
9-51-59a
9-51-59b
इति निश्चित्य मनसा देवलो राजसत्तम।
त्यक्त्वा गार्हस्थ्यधर्मं स मोक्षधर्ममरोचयत्।।
9-51-60a
9-51-60b
एवमादीनि सञ्चिन्त्य देवलो निश्चयान्वितः।
प्राप्तवान्परमां सिद्धिं परं योगं च भारत।।
9-51-61a
9-51-61b
ततो देवाः समागम्य बृहस्पतिपुरोगमाः।
जैगीषव्यं तपश्चास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः।।
9-51-62a
9-51-62b
अथाब्रवीदृषिवरो देवान्वै नारदस्तथा।
जैगीषव्ये तपो नास्ति विस्मापयति योऽसितम्।।
9-51-63a
9-51-63b
तमेवंवादिनं धीरं प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः।
नैवमित्येव शंसन्तो जैगीषव्यं महामुनिम्।।
9-51-64a
9-51-64b
नातः परतरं किञ्चित्तुल्यमस्ति प्रभावतः।
तेजसस्तपसश्चास्य योगस्य च महात्मनः।।
9-51-65a
9-51-65b
एवं प्रभावो धर्मात्मा जैगीषव्यस्तथाऽसितः।
तयोरिदं स्थानवरं तीर्थं चैव महात्मनोः।।
9-51-66a
9-51-66b
तत्राप्युपस्पृश्य ततो महात्मा
दत्त्वा च वित्तं हलभृद्द्विजेभ्यः।
अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा
जगाम सोमस्य महाxxxxxxर्थम्।
9-51-67a
9-51-67b
9-51-67c
9-51-67d
।। इति श्रीमन्महाभारते शल्यपर्वणि
ह्रदप्रवेशपर्वणि एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।। 51 ।।

[सम्पाद्यताम्]

9-51-7 नैवापुञ्चत धर्मतः इति छ.पाठः।। 9-51-8 न्यतिक्रमत् व्यत्यक्रामत्।। 9-51-16 असितप्रभ इति छ.पाठः।। 9-51-46 भूतार्थं यथाभूतार्थम्।। 9-51-47 उत्पपात ब्रह्मलोकं गन्तुमिति शेषः। पपात च गगनात्।। 9-51-54 सर्वाः क्रिया उत्सर्गेष्ठ्यादयः।। 9-51-56 मोक्षं सन्न्यासं त्यक्तुं मनो दधे। उत्सृष्टा नामग्नीनां पुनराधानं कर्तुमैच्छत्।। 9-51-66 असितो देवल।। 9-51-51 एकपञ्चाशत्ततोऽध्यायः।।

शल्यपर्व-050 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शल्यपर्व-052