महाभारतम्-09-शल्यपर्व-029

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महाभारतम्-09-शल्यपर्व-029
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पाण्डवैर्निहतसहायस्य दुर्योधनस्य गदामादाय हदं प्रति प्रस्थानम्।। 1 ।।
सञ्जयसंहारायासिमुद्यच्छता सात्यकिना व्यासवचनात्तद्विमोचनम्।। 2 ।।
हास्तिनपुरं गच्छतः सञ्जयस्य मध्येमार्गं दुर्योधनदर्शनम्।। 3 ।।
तेन तस्मिन्धृतराष्ट्राय स्ववृत्तान्तनिवेदनचोदनपूर्वकं हदं प्रविश्य मायया जलस्तम्भनम्।। 4 ।।
तत्रागतैर्द्रौणिकृपकृतवर्मभिः सञ्जयाद्दुर्योधनस्य हदप्रवेशं विज्ञाय विलप्य पुनः शिबिरगमनम्।। 5 ।।
ततो वृद्धपरिजनैर्युयुत्सुना च राजदाराणां नगरप्रापणम्।। 6 ।।

धृतराष्ट्र उवाच। 9-29-1x
निहते मामके सैन्ये निःशेषे शिबिरे कृते।
पाण्डवानां बले सूत किन्नु शेषमभूत्तदा।।
9-29-1a
9-29-1b
एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि कुशलो ह्यसि सञ्जय।
यच्च दुर्योधनो मानी कृतवांस्तनयो मम।
वलक्षयं तथा दृष्ट्वा स एकः पृथिवीपतिः।।
9-29-2a
9-29-2b
9-29-2c
सञ्जय उवाच। 9-29-3x
रथानां द्वे सहस्रे तु सप्त नागशतानि च।
पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनामयुतानि च।।
9-29-3a
9-29-3b
एतच्छेषमभूद्राजन्पाण्डवानां महद्बलम्।
परिगृह्य हि यद्युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः।।
9-29-4a
9-29-4b
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः।
नापश्यत्समरे कञ्चित्सहायं रथिनां वरः।।
9-29-5a
9-29-5b
नर्दमानान्परान्दृष्ट्वा स्वबलस्य च सङ्क्षयम्।
दृष्ट्वा भरतशार्दूलः कश्मलेनाभिसंवृतः।
हतं स्वहयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रावद्भयात्।।
9-29-6a
9-29-6b
9-29-6c
एकादशचमूभर्ता पुत्रो दुर्योधनस्तव।
गदामादाय तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो हदम्।।
9-29-7a
9-29-7b
नातिदूरं ततो गत्वा पद्भ्यामेव नराधिपः।
सस्मार वचनं क्षत्रुर्धर्मशीलस्य धीमतः।।
9-29-8a
9-29-8b
इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्ट्वान्पुरा।
महद्व्सनमस्माकं क्षत्रियाणां च सर्वशः।।
9-29-9a
9-29-9b
एवं विचिन्तयानस्तु प्रविविक्षुर्हदं नृपः।
दुःखसन्तप्तहृदयो दृष्ट्वा राजन्बलक्षयम्।।
9-29-10a
9-29-10b
`दशैकाक्षौहिणीभर्ता तदा दुर्योधनोऽपि सन्।
प्राप्तवान्व्यसनं तीव्रं दैवं हि बलवत्तरम्'।।
9-29-11a
9-29-11b
पाण्डवास्तु महाराज धृष्टद्युम्नपुरोगमाः।
अभ्यद्रवन्त सङ्क्रुद्धास्तव राजन्बलं प्रति।।
9-29-12a
9-29-12b
शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां बलानामभिगर्जताम्।
सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जयः।।
9-29-13a
9-29-13b
तान्हत्वा निशितैर्वाणैः सामात्यान्सह बन्धुभिः।
रथे श्वेतहये तिष्ठन्नर्जुनो बह्वशोभत।।
9-29-14a
9-29-14b
सुबलस्य हते पुत्रे सवाजिरथकुञ्जरे।
महावनमिव च्छिन्नमभवत्तावकं बलम्।।
9-29-15a
9-29-15b
अनेकशतसाहस्रे बले दुर्योधनस्य ह।
नान्यो महारथो राजञ्जीवमानो व्यदृश्यत।।
9-29-16a
9-29-16b
द्रोणपुत्रादृते वीरात्तथैव कृतवर्मणः।
कृपाच्च गौतमाद्राजन्पार्थिवाच्च तवात्मजात्।।
9-29-17a
9-29-17b
धृष्टद्युम्नस्तु मां दृष्ट्वा हसन्सात्यकिमब्रवीत्।
किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता।।
9-29-18a
9-29-18b
धृष्टद्युम्नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता महारथः।
उद्यम्य निशितं खङ्गं हन्तुं मामुद्यतस्तदा।।
9-29-19a
9-29-19b
तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्।
मुच्यतां सञ्जयो जीवन्न हन्तव्यः कथञ्चन।।
9-29-20a
9-29-20b
द्वैपायनवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः।
ततो मामब्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति सञ्जय साधय।।
9-29-21a
9-29-21b
अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निरायुधः।
प्रातिष्ठं येन नगरं सायाह्ने रुधिरोक्षितः।।
9-29-22a
9-29-22b
क्रोशमात्रमपक्रान्तं गदापाणिमवस्थितम्।
एकं दुर्योधनं राजन्नपश्यं भृशविक्षतम्।।
9-29-23a
9-29-23b
स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम्।
उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तथा दीनमवस्थितम्।।
9-29-24a
9-29-24b
तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे।
मुहूर्तं नाशकं वक्तुमतिदुःखपरिप्लुतः।।
9-29-25a
9-29-25b
`यस्य मूर्धाभिषिक्तानां सहस्रमणिमौलिनाम्।
आहृत्य च करं सर्वं स्वस्य वेश्म समागतम्।।
9-29-26a
9-29-26b
चतुःसागरपर्यन्ता पृथिवी रत्नभूषिता।
कर्णेनैकेन यस्यार्थे करमाहारिता पुरा।।
9-29-27a
9-29-27b
यस्याज्ञा परराष्ट्रेषु कर्णेनैव प्रसारिता।
नाभवद्यस्य शस्त्रेषु खेदो राज्ञः प्रशासतः।।
9-29-28a
9-29-28b
आसीनो हास्तिनपुरे क्षेमं राज्यमकण्टकम्।
अन्वपालयदैश्वर्यात्कुबेरमपि नास्मरत्।।
9-29-29a
9-29-29b
भवनाद्भवनं राजन्प्रयातुं पृथिवीपते।
देवालयप्रदेशे च पन्था यस्य हिरण्मयः।।
9-29-30a
9-29-30b
पताकावृतसूर्यांशुतोरणोच्छ्रितशोभिताः।
प्रयाणे पृथिवीभर्तुर्धन्यानामभवन्गृहाः।।
9-29-31a
9-29-31b
आरुह्यैरावतप्रख्यं नागमिन्द्रसमो बली।
विभूत्या सुमहत्या यः प्रयाति पृथिवीपते।।
9-29-32a
9-29-32b
तं भृशक्षतसर्वाङ्गं पद्ध्यामेव धरातले।
तिष्ठन्तमेकं दृष्ट्वा तु ममाभूत्क्लेश उत्तमः।।
9-29-33a
9-29-33b
तस्य चैवंविधस्याद्य जगन्नाथस्य भूपते।
आपदप्रतिमैवाभूद्बलीयान्विधिरेव हि'।।
9-29-34a
9-29-34b
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान्ग्रहणं तदा।
द्वैपायनप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे।।
9-29-35a
9-29-35b
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम्।
भ्रातॄंश्च सर्वसैन्यानि पर्यपृच्छत मां ततः।।
9-29-36a
9-29-36b
तस्मै तदहमाचक्षे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान्।
भ्रातॄश्च निहतान्सर्वान्सैन्यं च विनिपातितम्।।
9-29-37a
9-29-37b
त्रयः किल रथाः शिष्टास्तावकानां नराधिप।
इति प्रस्थानकाले मां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्।।
9-29-38a
9-29-38b
स दीर्घमिव निःश्वस्य प्रत्यवेक्ष्य पुनः पुनः।
असौ मां पाणिना स्पृष्ट्वा पुत्रस्ते पर्यभाषत।।
9-29-39a
9-29-39b
त्वदन्यो नेह सङ्ग्रामे कश्चिज्जीवति सञ्जय।
द्वितीयं नेह पश्यामि ससहायाश्च पाण्‍डवाः।।
9-29-40a
9-29-40b
ब्रूयाः सञ्जय राजानं पज्ञाचक्षुषमीश्वरम्।
दुर्योधनस्तव सुतः प्रविष्टो हदमित्युत।।
9-29-41a
9-29-41b
सुहृद्भिस्तादृशैर्हीनः पुत्रैर्भ्रातृभिरेव च।
पाण्डवैश्च हृते राज्ये को नु जीवेत मादृशः।।
9-29-42a
9-29-42b
आचक्षीथाः सर्वमिदं मां च मुक्तं महाहवात्।
आस्मिंस्तोयहदे गुप्तं जीवन्तं भृशविक्षतम्।।
9-29-43a
9-29-43b
एवमुक्त्वा महाराज प्राविशत्तं महाहदम्।
अस्तम्भयत तोयं च मायया मनुजाधिपः।।
9-29-44a
9-29-44b
तस्मिन्हदं प्रविष्टे तु त्रीन्रथाञ्श्रान्तवाहनान्।
अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेयुषः।।
9-29-45a
9-29-45b
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम्।
भोजं च कृतवर्माणं सहिताञ्शरविक्षतान्।।
9-29-46a
9-29-46b
ते सर्वं मामभिप्रेक्ष्य तूर्णमश्वाननोदयन्।
उपयाय तु मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि सञ्जय।।
9-29-47a
9-29-47b
अपृच्छंश्चैव मां सर्वे पुत्रं तव जनाधिपम्।
कच्चिद्दुर्योधनो राजा स नो जीवति सञ्जय।।
9-29-48a
9-29-48b
आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम्।
तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽब्रवीत्।।
9-29-49a
9-29-49b
हदं चैवाहमाचक्षं यं प्रविष्टो नराधिपः।
अश्वत्थामा तु तद्राजन्निशम्य वचनं मम।।
9-29-50a
9-29-50b
तं हदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवयत्।
अहो धिक्स न जानाति जीवतोऽस्मान्नराधिप।
पर्याप्ता हि वयं तेन सह योधयितुं परान्।।
9-29-51a
9-29-51b
9-29-51c
ते तु तत्र चिरं कालं विलप्य च महारथाः।
प्राद्रवन्रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान्रणे।।
9-29-52a
9-29-52b
ते तु मां रथमारोप्य कृपस्य सुपरिष्कृतम्।
सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रयो रथाः।।
9-29-53a
9-29-53b
तत्र गुल्माः परिक्षिप्ताः सूर्ये चास्तमिते सति।
सर्वे विचुक्रुशुः श्रुत्वा पुत्राणां तव संक्षयम्।।
9-29-54a
9-29-54b
ततो वृद्धा महाराज योषितां रक्षिणो नराः।
राजदारानुपादाय पययुर्नगरं प्रति।।
9-29-55a
9-29-55b
तत्र विक्रोशमानानां रुदतीनां च सर्वशः।
प्रादुरासीन्महाञ्शब्दः श्रुत्वा तद्बलसङ्क्षयम्।।
9-29-56a
9-29-56b
ततस्ता योषितो राजन्रुदन्त्यो वै मुहुर्मुहुः।
कुरर्य इव शब्देन नादयन्त्यो महीतलम्।।
9-29-57a
9-29-57b
आजघ्नुः करजैश्चापि पाणिभिश्च शिरांस्युत।
लुलुचुश्च तदा केशान्क्रोशन्त्यस्तत्रतत्र ह।।
9-29-58a
9-29-58b
हाहाकारविनादिन्यो विनिघ्नन्त्य उरांसि च।
शोचन्त्यस्तत्र रुरुदुः क्रन्दमाना विशाम्पते।।
9-29-59a
9-29-59b
ततो दुर्योधनामात्याः साश्रुकण्ठा भृशातुराः।
राजदारानुपामन्त्र्य प्रययुर्नगरं प्रति।।
9-29-60a
9-29-60b
वेत्रव्यासक्तहस्ताश्च द्वाराध्यक्षा विशाम्पते।
शयनीयानि शुभ्राणि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च।
समादाय ययुस्तूर्णं नगरं दाररक्षिणः।।
9-29-61a
9-29-61b
9-29-61c
आस्थायाश्वतरीयुक्तान्स्यन्दनानपरे पुनः।
स्वान्स्वान्दारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति।।
9-29-62a
9-29-62b
अदृष्टपूर्वा या नार्यो भास्करेणापि वेश्मसु।
ददृशुस्ता महाराज जना याताः पुरं प्रति।।
9-29-63a
9-29-63b
ताः स्त्रियो भरतश्रेष्ठ सौकुमार्यसमन्विताः।
प्रययुर्नगरं तूर्णं हतस्वपतिबान्धवाः।।
9-29-64a
9-29-64b
आगोपालाविपालेभ्यो द्रवन्तो नगरं प्रति।
ययुर्मनुष्याः सम्भ्रान्ता भीमसेनभयार्दिताः।।
9-29-65a
9-29-65b
अपिचैषां भयं तीव्रं पार्थेभ्योऽभूत्सुदारुणम्।
प्रेक्षमाणास्तदाऽन्योन्यमाधावन्नगरं प्रति।।
9-29-66a
9-29-66b
तस्मिंस्तथा वर्तमाने विद्रवे भृशदारुणे।
युयुत्सुः शोकसम्मूढः प्राप्तकालमचिन्तयत्।।
9-29-67a
9-29-67b
जितो दुर्योधनः सङ्ख्ये पाण्डवैर्भीमविक्रमैः।
एकादशचमूभर्ता भ्रातरश्चास्य सूदिताः।।
9-29-68a
9-29-68b
हताश्च कुरवः सर्वे भीष्मद्रोणपुरः सराः।
अहमेको विमुक्तस्तु भाग्ययोगाद्यदृच्छया।।
9-29-69a
9-29-69b
विद्रुतानि च सर्वाणि शिबिराद्वै समन्ततः।
[इतस्ततः पलायन्ते हतनाथा हतौजसः।।
9-29-70a
9-29-70b
अदृष्टपूर्वा दुःखार्ता भयव्याकुललोचनाः।
हरिणा इव वित्रस्ता वीक्षमाणा दिशो दश]।।
9-29-71a
9-29-71b
दुर्योधनस्य सचिवा ये केचिदवशेषिताः।
राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति।
प्राप्तकालमहं मन्ये प्रवेशं तैः सह प्रभो।।
9-29-72a
9-29-72b
9-29-72c
युधिष्ठिरमनुज्ञाय वासूदेवं तथैव च।
एतमर्थं महाबाहुरुभयोः सन्न्यवेदयत्।।
9-29-73a
9-29-73b
तस्य प्रीतोऽभवद्राजा नित्यं करुणवेदिता।
परिष्वज्य महाबाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जयत्।।
9-29-74a
9-29-74b
ततः स रथमास्थाय द्रुतमश्वानचोदयत्।
संवाहयितवांश्चापि राजदारान्पुरं प्रति।।
9-29-75a
9-29-75b
तैश्चैव सहितः क्षिप्रमस्तं गच्छति भास्करे।
प्रविष्टो हास्तिनपुरं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः।।
9-29-76a
9-29-76b
अपश्यत महाप्राज्ञं विदुरं साश्रुलोचनम्।
राज्ञः समीपान्निष्क्रान्तं शोकोपहतचेतसम्।।
9-29-77a
9-29-77b
तमब्रवीत्सत्यधृतिः प्रणतं त्वग्रतः स्थितम्।। 9-29-78a
विदुर उवाच। 9-29-79x
दिष्ट्या कुरुक्षये वृत्ते अस्मिंस्त्वं पुत्र जीवसि।
विना राज्ञः पर्वेशार्द्वै किमसि त्वमिहागतः।
एतद्वै कारणं सर्वं विस्तरेण निवेदय।।
9-29-79a
9-29-79b
9-29-79c
युयुत्सुरुवाच। 9-29-80x
निहते शकुनौ तत्र सज्ञातिसुतबान्धवे।
हतशेषपरीवारो राजा दुर्योधनस्ततः।
स्वकं स हयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद्भयात्।।
9-29-80a
9-29-80b
9-29-80c
अपक्रान्ते तु नृपतौ स्कन्धावारनिवेशनात्।
भयव्याकुलितं सर्वं प्राद्रावन्नगरं प्रति।।
9-29-81a
9-29-81b
ततो राज्ञः कलत्राणि भ्रातॄणां चास्य सर्वतः।
वाहनेषु समारोप्य अध्यक्षाः प्राद्रावन्भयात्।।
9-29-82a
9-29-82b
ततोऽहं समनुज्ञाप्य राजानं सहकेशवम्।
प्रविष्टो हास्तिनपुरं रक्षन्लोकस्य वाच्यताम्।।
9-29-83a
9-29-83b
सञ्जय उवाच। 9-29-84x
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वैश्यापुत्रेण भाषितम्।
प्राप्तकालमिति ज्ञात्वा विदुरः सर्वधर्मवित्।
अपूजयदमेयात्मा युयुत्सुं वाक्यमब्रवीत्।।
9-29-84a
9-29-84b
9-29-84c
प्राप्तकालमिदं सर्वं ब्रुवता भरतक्षये।
[रक्षितः कुलधर्मश्च सानुक्रोशतया त्वया।।
9-29-85a
9-29-85b
दिष्ठ्या त्वामिह सङ्ग्राम दस्माद्वीरक्षयात्पुरम्।
समागतमपश्याम ह्यंशुमन्तमिव प्रजाः।।
9-29-86a
9-29-86b
अन्धस्यं नृपतेर्यष्टिर्लुब्धस्यादीर्घदर्शिनः।
बहुशो याच्यमानस्य दैवोपहतचेतसः।
त्वमेको व्यसनार्तस्य ध्रियसे पुत्र सर्वथा]।।
9-29-87a
9-29-87b
9-29-87c
अद्य त्वमिह विश्रान्तः श्वोऽभिगन्ता युधिष्ठिरम्।
एतावदुक्त्वा वचनं विदुरः साश्रुलोचनः।
युयुत्सुं समनुज्ञाप्य प्रविवेश नृपक्षयम्।।
9-29-88a
9-29-88b
9-29-88c
[पौरजानपदैर्दुःखाद्धाहेति भृशनादितम्।
निरानन्दं गतश्रीकं हृताराममिवाशयम्।
शून्यरूपमपध्वस्तं दुःखाद्दुःखतरोऽभवत्।।
9-29-89a
9-29-89b
9-29-89c
विदुरः सर्वधर्मज्ञो विक्लवेनान्तरात्मना।
विवेश नगरे राजन्निशश्वास शनैः शनैः।।
9-29-90a
9-29-90b
युयुत्सुरपि तां रात्रिं स्वगृहे न्यवसत्तदा।
वन्द्यमानः स्वकैश्चापि नाभ्यनन्दत्सुदुःखितः।
चिन्तयानः क्षयं तीव्रं भरतानां परस्परम्।।
9-29-91a
9-29-91b
9-29-91c
।। इति श्रीमन्महाभारते शल्यपर्वणि
ह्रदप्रवेशपर्वणि अष्टादशदिवसयुद्धे
एकोनत्रिंशोऽध्यायः।। 29 ।।

[सम्पाद्यताम्]

9-29-38 हतो दुर्योधन इति क.पाठः।। 9-29-39 अहमेकोऽवशिष्टस्तु इति क.पाठः।। 9-29-29 एकोनत्रिंशोऽध्यायः।।

शल्यपर्व-028 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शल्यपर्व-030