महाभारतम्-09-शल्यपर्व-016

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युधिष्ठिरेण शल्यशल्यानुजयोर्वधः।। 1 ।।

सञ्जय उवाच। 9-16-1x
तं भीमसेनश्च शिनेश्च नप्ता
माद्याश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ।
समागतं भीमबलेन राज्ञा
पर्यापुरन्योन्यमथाह्वयन्त।।
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ततस्तु शूराः समरे नरेन्द्र
नरेश्वरं प्राप्य युधां वरिष्ठम्।
आवार्य चैनं समरे नृवीरा
जघ्नुः शितैः पत्रिभिरुग्रवेगैः।।
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संरक्षितो भीमसेनेन राजा
माद्रीसुताभ्यामथ माधवेन।
मद्राधिपं पत्रिभिरुग्रवेगैः
स्तनान्तरे धर्मसुतो निजघ्ने।।
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ततो रणे तावकानां रथौघाः
समीक्ष्य मद्राधिपतिं शरार्तम्।
पर्यावव्रुः प्रवराः सर्वयोधा
दुर्योधनस्यानुमते पुरस्तात्।।
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ततो द्रुतं मद्रजनाधिपो रणे
युधिष्ठिरं सप्तभिरभ्यविद्व्यत्।
तं चापि पार्थौ नवभिः पृषत्कै--
र्विव्याध राजंस्तुमुले महात्मा।।
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आकर्णपूर्णायतसम्प्रयुक्तैः
शरैस्तदा संयति तैलधौतैः।
अन्योन्यमाच्छादयतां महारथौ
मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्च।।
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ततस्तु तूर्णं समरे महारथौ
परस्परस्यान्तरमीक्षमाणौ।
शरैर्भृशं विव्यधतुर्नृपोत्तमौ
महबलौ शत्रुभिरप्रधृष्यौ।।
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तयोर्धनुर्ज्यातलनिःस्वनो महा--
न्महेन्द्रवज्राशनितुल्यनिः स्वनः।
परस्परं बाणगणैर्महात्मनोः
प्रवर्षतोर्मद्रपपाण्डुवीरयोः।।
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तौ चेरतुर्व्याघ्रशिशुप्रकाशौ
महावनेष्वामिषगृद्विनाविव।
विषाणिनौ नागवराविवोभौ
ततक्षतुः संयति जातदर्पौ।।
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ततस्तु मद्राधिपतिर्महात्मा
युधिष्ठिरं भीमबलं प्रसह्य।
विव्याध वीरं हृदयेऽतिवेगं
शरेण सूर्याग्निसमप्रभेण।।
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ततोऽतिविद्धोऽथ युधिष्ठिरोऽपि
सुसम्प्रयुक्तेन शरेण राजन्।
जघान मद्राधिपतिं महात्मा
मुदं च लेभे वृषभः कुरूणाम्।।
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ततो मुहूर्तादिव पार्थिवेन्द्रो
लब्ध्वा संज्ञां क्रोधसंरक्तनेत्रः।
शरेण पार्थं त्वरितो जघान
सहस्रनेत्रप्रतिमप्रभावः।।
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त्वरंस्ततो धर्मसुतो महात्मा
शल्यस्य कोपान्नवभिः पृषत्कैः।
भित्त्वा ह्युरस्तपनीयं च वर्म
जघान षड्भिस्त्वपरैः पृषत्कैः।।
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ततस्तु मद्राधिपतिः प्रकृष्टं
धनुर्विकृष्य व्यसृजत्पृषत्कान्।
द्वाभ्यां शराभ्यां च तथैव राज्ञ--
श्चिच्छेद चापं कुरुपुङ्गवस्य।।
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नवं ततोऽन्यत्समरे प्रगृह्य
राजा धनुर्धोरतरं महात्मा।
शल्यं तु विव्याध शरैः समन्ता--
द्यथा महेन्द्रो नमुचिं शिताग्रैः।।
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ततस्तु शल्यो नवभिः पृषत्कै--
र्भीमस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य।
निकृत्य रौक्मे पटुवर्मणी तयो--
र्विदास्यामास भुजौ महात्मा।।
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ततोऽपरेण ज्वलनार्कतेजसा
क्षुरेण राज्ञो धनुरुन्ममाथ।
कृपश्च तस्यैव जघान सूतं
षड्भिः शरैः सोऽभिमुखः पपात।।
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मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरस्य
शरैश्चतुर्भिर्निजघान वाहान्।
वाहांश्च हत्वा व्यकरोन्महात्मा
योधक्षयं धर्मसुतस्य राज्ञः।।
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`यदद्भुतं कर्म न शक्यमन्यैः
सुदुःसहं तत्कृतवन्तमेकम्।
शल्यो नरेन्द्रः सविषण्णभावा--
द्विचिन्तयामास मृदङ्गकेतुः।।
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किमेतदिन्द्रावरजस्य वाक्यं
मोघं भवत्यद्य विधेर्बलेन।
जहीति शल्यं ह्यवदत्तदाऽऽजौ
न लोकनाथस्य वचोऽन्यथा स्यात्।।'
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तथा कृते राजनि भीमसेनो
मद्राधिपस्याथ ततो महात्मा।
छित्त्वा धनुर्वेगवता शरेण
द्वाभ्यामविध्यत्सुभृशं नरेन्द्रम्।।
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तथापरेणास्य जहार यन्तुः
कायाच्छिरः संहननीयमध्यात्।
जघान चाश्वांश्चतुरः सुशीघ्रं
तथा भृशं कुपितो भीमसेनः।।
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तमग्रणीः सर्वधनुर्धराणा--
मेकं चरन्तं समरेऽतिवेगम्।
भीमः शतेन व्यकिरच्छराणां
माद्रीपुत्रः सहदेवस्तथैव।।
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तैः सायकैर्मोहितं वीक्ष्य शल्यं
भीमः शरैरस्य चकर्त वर्म।
स भीमसेनेन निकृत्तवर्मा
मद्राधिपश्चर्म सहस्रतारम्।।
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प्रगृह्य खङ्गं च रथान्महात्मा
प्रस्कन्द्य कुन्तीसुतमभ्यधावत्।
छित्त्वा रथेषां नकुलस्य सोऽथ
युधिष्ठिरं भीमबलोऽभ्यधावत्।।
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तं चापि राजानमथोत्पतन्तं
क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम्।
धृष्टद्युम्नो द्रौपदेयाः शिखण्डी
शिनेश्च नप्ता सहसा परीयुः।।
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अथास्य चर्माप्रतिमं न्यकृन्त--
द्भीमो महात्मा नवभिः पृषत्कैः।
खङ्गं च भल्लैर्निचकर्त मुष्टौ
नदन्प्रहृष्टस्तव सैन्यमध्ये।।
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तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य हृष्टा--
स्ते पाण्डवानां प्रवरा रथौघाः।
नादं च चक्रुर्भृशमुत्स्मयन्तः
शङ्खांश्च दध्मुः शशिसन्निकाशान्।।
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तेनाथ शब्देन विभीषणेन
तथाऽभितप्तं बलमप्रधृष्यम्।
स्वेदाभिभूतं रुधिरोक्षिताङ्गं
विसञ्ज्ञकल्पं च तदा विषण्णम्।।
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स मद्रराजः सहसा विकीर्णो
भीमाग्रगैः पाण्डवयोधमुख्यैः।
युधिष्ठिरस्याभिमुखं जवेन
सिंहो यथा मृगहेतोः प्रयातः।।
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स धर्मराजो निहताश्वसूतः
क्रोधेन दीप्तो ज्वलनप्रकाशः।
दृष्ट्वा च मद्राधिपतिं स्म तूर्णं
समभ्यधावत्तमरिं बलेन।।
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गोविन्दवाक्यं त्वरितं विचिन्त्य
दध्रे मतिं शल्यविनाशनाय।
स धर्मराजो निहताश्वसूतो
रथे तिष्ठञ्शक्तिमथान्वकर्षत्।।
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तच्चxx शल्यस्य निशाम्य कर्म
तमात्मनो भागमथावशिष्टम्।
कृत्वा मनः शल्यवधे महात्मा
यथोक्तमिन्द्रावरजस्य चक्रे।।
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स धर्मराजो मणिहेमदण्डां
जग्राह शक्तिं कनकप्रकाशाम्।
नेत्रे च दीप्ते सहसा विवृत्य
मद्राधिपं क्रुद्धमना निरैक्षत्।।
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निरीक्षितो धर्मसुतेन राज्ञा
षूतात्मना निर्हृतकल्मषेण।
आसीन्न यद्भस्मसान्मद्रराज--
स्तदद्भुतं मे प्रतिभाति राजन्।।
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ततस्तु शक्तिं रचिरोग्रदण्डां
मणिप्रवेकोज्ज्वलितां प्रदीप्ताम्।
चिक्षेप वेगात्सुभृशं महात्मा
मद्राधिपाय प्रवरः कुरूणाम्।।
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दीप्तामथैनां प्रहितां बलेन
सविस्फुलिङ्गां सहसापतन्तीम्।
प्रैक्षन्त सर्वे कुरवः समेता
दिवो युगान्ते महतीमिवोल्काम्।।
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तां कालरात्रीमिव पाशहस्तां
यमस्य धात्रीमिव चोग्ररूपाम्।
स ब्रह्मदण्डप्रतिमाममोधां
ससर्ज यत्तो युधि धर्मराजः।।
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गन्धस्रगग्र्यासनपानभोजनै--
रभ्यर्चितां पाण्डुसुतैः प्रयत्नात्।
सांवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं
कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्राम्।।
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ईशानहेतोः प्रतिनिर्मितां तां
त्वष्ट्रा रिपूणामसुदेहभक्ष्याम्।
भूम्यन्तरिक्षद्युजलाश्रयाणि
प्रसह्य भूतानि निहन्तुमीशाम्।।
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घण्‍टापताकां मणिवज्रभूषां
वैदूर्यचित्रां तपनीयदण्डाम्।
त्वष्ट्रा प्रयत्नान्नियमेन क्लृप्तां
ब्रह्मद्विषामन्तकरीममाघाम्।।
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बलप्रयत्नादनिरोधवेगां
मन्त्रैश्च घोरैरपि पूरयित्वा।
ससर्ज मार्गेण च तां खगानां
वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम्।।
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हतो ह्यसावित्यभिगर्जमानो
रुद्रोऽन्धकायान्तकरं यथेषुम्।
प्रसार्य बाहुं सुदृढं सुपाणिं
क्रोधेन नृत्यन्निव धर्मराजः।।
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`स्फुरत्प्रभामण्डलिनोंशुजालै--
र्धर्मात्मनो मद्रविनाशकाले।
पुरत्रयप्रोत्सरणे पुरस्ता--
न्माहेश्वरं रूपमभूत्तदानीम्।।
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आवर्तनाकुञ्चितबाहुदण्डः
सन्ध्याविहारी तनुवृत्तमध्यः।
विशालवक्षा भगवान्हरो यथा
सुदुर्निरीक्ष्योऽभवदर्जुनाग्रजः'।।
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तां सर्वशक्त्या प्रहितां सुशक्तिं
युधिष्ठिरेणाप्रतिवार्यवीर्याम्।
प्रतिग्रहायाभिननन्द शल्यः
सम्यग्घुतामग्निरिवाज्यधाराम्।।
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सा तस्य वर्माभिविदार्य शुभ्र--
मुरो विशालं च तथैव भित्त्वा।
विवेश गां तोयमिवाप्रसक्ता
यशो विशालं नृपतेर्हरन्ती।।
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नासाक्षिकर्णास्यविनिः सृतेन
प्रस्यन्दता च व्रणसम्भवेन।
संसिक्तगात्रो रुधिरेण सोऽभू--
त्क्रौञ्चो यथा स्कन्दहतो महाद्रिः।।
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प्रसार्य बाहू च रथाद्गतो गां
सञ्छिन्नवर्मा कुरुनन्दनेन।
महेन्द्रवाहप्रतिमो महात्मा
वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य।।
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ततो निपतितः सोऽभूदिन्द्रध्वज इवोच्छ्रितः।
बाहू प्रसार्याभिमुखो धर्मराजस्य मद्रराट्।
स तथा भिन्नसर्वाङ्गो रुधिरेण समुक्षितः।।
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प्रत्युद्गत इव प्रेम्णा भूम्या स नरपुङ्गवः।
प्रियया कान्तया कान्तः पतमान इवोरसि।।
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चिरं भुक्त्वा वसुमतीं प्रियां कान्तामिव प्रभुः।
सर्वैरङ्गैः समाश्लिष्य प्रसुप्त इव चाभवत्।।
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धर्म्ये धर्मात्मना युद्वे निहतो धर्मसूनुना।
सम्यक्स्फीत इवोत्सृष्टः प्रशान्तोऽग्निरिवाध्वरे।।
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शक्त्या विभिन्नहृदयं विप्रविद्धायुधध्वजम्।
संशान्तमपि मद्रेशं लक्ष्मीर्नैव विमुञ्चति।।
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ततो युधिष्ठिरश्चापमादायेन्द्रधनुष्प्रभम्।
व्यधमद्द्विषतः सङ्ख्ये खगराडिव पन्नगान्।
देहान्सुनिशितैर्भल्लै रिपूणां नाशयन्क्षणात्।।
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9-16-55c
ततः पार्थस्य बाणौघैरावृताः सैनिकास्तव।
निमीलिताक्षाः क्षिण्वन्ति भृशमन्योन्यकर्शिताः।
क्षरन्तो रुधिरं देहैर्विशस्त्रायुधजीविताः।।
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ततः शल्ये निपतिते मद्रराजानुजो युवा।
भ्रातुस्तुल्यो गुणैः सर्वै रथी पाण्डवमभ्ययात्।।
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विव्याध च नरश्रेष्ठो नाराचैर्बहुभिस्त्वरन्।
हतस्यापचितिं भ्रातुश्चिकीषुर्युद्धदुर्मदः।।
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तं विव्याधाशुगैः ष़ड्‌भिर्धर्मराजस्त्वरन्निव।
कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च।।
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ततोऽस्य दीप्यमानेन सुदृढेन शितेन च।
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरच्छिरः।।
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9-16-60b
सकुण्डलं तद्ददृशे पतमानं शिरो रथात्।
पुण्यक्षयमनुप्राप्य पतन्स्वर्गादिव च्युतः।।
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तस्यापकृत्तशीर्षं तु शरीरं पतितं रथात्।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं दृष्ट्वा सैन्यमभज्यत।।
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विचित्रकवचे तस्मिन्हते मद्रनृपानुजे।
हाहाकारं प्रकुर्वाणाः कुरवोऽभिप्रदुद्रुवुः।।
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शल्यानुजं हतं दृष्ट्वा तावकास्त्यक्तजीविताः।
वित्रेसुः पाण्डवभयात्प्रविध्वस्तास्तदा भृशम्।।
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तांस्तथा भज्यमानांस्तु कौरवान्भरतर्षभ।
शिनेर्नप्ताऽकिरन्बाणैरभ्यवर्तत सात्यकिः।।
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9-16-65b
तमायान्तं महेष्वासं दुष्प्रसह्यं दुरासदम्।
हार्दिक्यस्त्वरितो राजन्प्रत्यगृह्णादभीतवत्।।
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9-16-66b
तौ समेतौ महात्मानौ वार्ष्णेयौ वरवाजिनौ।
हार्दिक्यः सात्यकिश्चैव सिंहाविव बलोत्कटौ।।
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इषुभिर्विमलाभासैश्छादयन्तौ परस्परम्।
अर्चिर्भिरिव सूर्यस्य दिवाकरसमप्रभौ।।
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चापमार्गबलोद्वूतान्मार्गणान्वृष्णिसिंहयोः।
आकाशगानपश्याम पतङ्गानिव शीघ्रगान्।।
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सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः।
चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा।।
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तन्निकृत्तं धनुःश्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः।
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्जलदनिःस्वनम्।।
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तदादाय धनुःश्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम्।
हार्दिक्यं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे।।
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9-16-72b
ततो युगं रथेषां च च्छित्त्वा भल्लैः सुसंयतैः।
अश्वांस्तस्यावधीत्तूर्णमुभौ च पार्ष्णिसारथी।।
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9-16-73b
हार्दिक्यं विरथं दृष्ट्वा कृपः शारद्वतः प्रभो।
अपोवाह ततः क्षिप्रं रथमारोप्य वीर्यवान्।।
9-16-74a
9-16-74b
मद्रराजे हते राजन्विरथे कृतवर्मणि।
दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत्पराङ्मुखम्।।
9-16-75a
9-16-75b
स्व परे नान्वबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृते।
बलं तु हतभूयिष्ठं त्रस्तमासीत्पराङ्मुखम्।।
9-16-76a
9-16-76b
ततो मुहूर्तात्तेऽपश्यन्रजो भौमं समुत्थितम्।
विविधैः शोणितस्रावैः प्रशान्तं पुरुषर्षभ।।
9-16-77a
9-16-77b
ततो दुर्योधनो दृष्ट्वा भग्नं स्वबलमन्तिकात्।
जवेनापततः पार्थानेकः सर्वानवारयत्।।
9-16-78a
9-16-78b
पाण्डवान्सरथान्दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नं च पार्षतम्।
आनर्त्तं च दुराधर्षं शितैर्बाणैरवारयत्।।
9-16-79a
9-16-79b
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम्।
अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्योऽपि न्यवर्तत।।
9-16-80a
9-16-80b
ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः।
चतुर्भिर्निजघानाश्वान्पत्रिभिः कृतवर्मणः।
विव्याध गौतमं चापि ष़ड्‌भिर्भल्लैः सुतेजनैः।।
9-16-81a
9-16-81b
9-16-81c
अश्वत्थामाः ततो राज्ञा हताश्वं विरथीकृतम्।
तमपोवाह हार्दिक्यं स्वरथेन युधिष्ठिरात्।।
9-16-82a
9-16-82b
ततः शारद्वतः षड्भिः प्रत्यविध्यद्युधिष्ठिरम्।
विव्याध चाश्वान्निशितैस्तस्याष्टाभिः शिलीमुखैः।।
9-16-83a
9-16-83b
एवमेतन्महाराज युद्धशेषमवर्तत।
तव दुर्मन्त्रिते राजन्सहपुत्रस्य भारत।।
9-16-84a
9-16-84b
तस्मिन्महेष्वासधरे विशस्ते
सङ्ग्राममध्ये कुरुपुङ्गवेन।
पार्थाः समेताः परमप्रहृष्टाः
शङ्खान्प्रदध्मुर्हतमीक्ष्य शल्यम्।।
9-16-85a
9-16-85b
9-16-85c
9-16-85d
युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ
पुरा सुरा वृत्रवधे यथेन्द्रम्।
चक्रुश्च नानाविधवाद्यशब्दा--
न्निनादयन्तो वसुधां समन्तात्।।
9-16-86a
9-16-86b
9-16-86c
9-16-86d
।। इति श्रीमन्महाभारते
शल्यपर्वणि शल्यवधपर्वणि
अष्टादशदिवसयुद्धे षोडशोऽध्यायः।। 16 ।।

[सम्पाद्यताम्]

9-16-22 संहननीयो दृढसन्धिको मध्यो यस्य तस्मात्कायात्।। 9-16-47 तोयमिव सुप्रवेशाङ्गाम्। अप्रसक्तः अप्रतिहता। नृपतेः शल्यस्य।। 9-16-16 षोडशोऽध्यायः।।

शल्यपर्व-015 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शल्यपर्व-017