महाभारतम्-09-शल्यपर्व-042

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← शल्यपर्व-041 महाभारतम्
नवमपर्व
महाभारतम्-09-शल्यपर्व-042
वेदव्यासः
शल्यपर्व-043 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 006
  7. 007
  8. 008
  9. 009
  10. 010
  11. 011
  12. 012
  13. 013
  14. 014
  15. 015
  16. 016
  17. 017
  18. 018
  19. 019
  20. 020
  21. 021
  22. 022
  23. 023
  24. 024
  25. 025
  26. 026
  27. 027
  28. 028
  29. 029
  30. 030
  31. 031
  32. 032
  33. 033
  34. 034
  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041
  42. 042
  43. 043
  44. 044
  45. 045
  46. 046
  47. 047
  48. 048
  49. 049
  50. 050
  51. 051
  52. 052
  53. 053
  54. 054
  55. 055
  56. 056
  57. 057
  58. 058
  59. 059
  60. 060
  61. 061
  62. 062
  63. 063
  64. 064
  65. 065
  66. 066


बलदेवस्यावाकीर्णतीर्थगमनम्।। 1 ।। बकमुनिचरित्रकथनम्।। 2 ।। बलदेवस्य ततो वसिष्ठापवाहतीर्थगमनम्।। 3 ।।

वैशम्पायन उवाच। 9-42-1x
ब्रह्मयोनिभिराकीर्णं जगाम यद्वुनन्दनः।
यत्र दाल्भ्यो बको राजन्पश्वर्थ सुमहातपाः।
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं कोपसमन्वितः।।
9-42-1a
9-42-1b
9-42-1c
तपसा घोररूपेण कर्शयन्देहमात्मनः।
क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान्।।
9-42-2a
9-42-2b
पुरा हि नैमिशीयानां सत्रे द्वादशवार्षिके।
वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पाञ्चालानृषयोऽगमन्।।
9-42-3a
9-42-3b
तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थं मनस्विनः।
`तत्र ते लेभिरे राजन्पाञ्चालेभ्यो महर्षयः।'
बलान्वितान्वत्सतरान्निर्व्याधीन्सप्तविंशतिम्।।
9-42-4a
9-42-4b
9-42-4c
तानब्रवीद्बलो दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति।
पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम्।।
9-42-5a
9-42-5b
एवमुक्त्वा वको राजन्नृषीन्सर्वांन्प्रतापवान्।
जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं ब्राह्मणोत्तमः।।
0
अयाचत पशून्दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत्।।
9-42-6a
9-42-6b
9-42-7a स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्।
9-42-7b
यदृच्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः।
एतान्पशून्नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदीच्छसि।।
9-42-8a
9-42-8b
ऋषिस्त्वथ बकः क्रुद्धश्चिन्तयामास धर्मवित्।
अहो वत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि।।
9-42-9a
9-42-9b
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तमः।
मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपतेः।।
9-42-10a
9-42-10b
स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः।
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा।।
9-42-11a
9-42-11b
अवाकर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम्।
xxxx दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः।।
9-42-12a
9-42-12b
स तैरेव जुहावाग्नौ राष्ट्रं मांसैर्महातपः।। 9-42-13a
तस्मिंस्तु विधिवत्सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे।
अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव।।
9-42-14a
9-42-14b
छिxxxमानं xxxxxx परशुना विभो
xxxxxxxxxxxx व्यवकीर्थमचेतनम्।।
9-42-15a
9-42-15b
दृष्ट्वा तथाऽवकीर्णं तु राष्ट्रं च मनुजाधिपः।
बभूव दुर्मना राजा चिन्तयामास च प्रभुः।।
9-42-16a
9-42-16b
xxxxxxxxxरद्यत्रं ब्राह्मणैः सहितः पुरा।
xxxxxगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च।।
9-42-17a
9-42-17b
यदा स पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदाऽनघ।। 9-42-18a
यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोक्षयितुं नृपः।
अथ विप्रादिकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय।।
9-42-19a
9-42-19b
ततो विप्रादिकाः प्राहुः पशुविप्रकृतस्त्वया।
मांसैरभिजुहोतीदं तव राष्ट्रं मुनिर्बकः।।
9-42-20a
9-42-20b
तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान्।
तस्यैतत्तपसः कर्म येन तेऽद्य लयो महान्।।
9-42-21a
9-42-21b
`यदीच्छसि महाबाहो शान्तिं राष्ट्रस्य भूमिप।'
अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव।।
9-42-22a
9-42-22b
वैशम्पायन उवाच। 9-42-23x
सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत्।
निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ।।
9-42-23a
9-42-23b
प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे।
मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्ख्येण हतचेतसः।
त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि।।
9-42-24a
9-42-24b
9-42-24c
तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम्।
दृष्ट्वा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्रं तस्य व्यमोचयत्।।
9-42-25a
9-42-25b
ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत्संरम्भं च विहाय सः।
मोक्षार्थं तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम्।।
9-42-26a
9-42-26b
मोक्षयित्वा ततो र्ष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून्बहून्।
हृष्टात्मा नैमिशारण्यं जगाम पुनरेव सः।।
9-42-27a
9-42-27b
धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः।
स्वमेव नगरं राजन्प्रतिपेदे महर्द्धिमत्।।
9-42-28a
9-42-28b
तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधीः।
असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम्।।
9-42-29a
9-42-29b
मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुराः।
दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे।।
9-42-30a
9-42-30b
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः।
वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चश्वतरीयुतान्।।
9-42-31a
9-42-31b
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम्।
ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते।।
9-42-32a
9-42-32b
तत्र यज्ञे ययातेश्च महाराज सरस्वती।
सर्पिः पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः।।
9-42-33a
9-42-33b
तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो ययातिः पृथिवीपतिः।
आक्रामदूर्ध्वं पुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान्।।
9-42-34a
9-42-34b
पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजतः प्रभोः।
औदार्यं परमं कृत्वा भक्तिं चात्मनि शाश्वतीम्।
ददौ कामान्ब्राह्मणेभ्यो वान्यान्यो मनसेच्छति।।
9-42-35a
9-42-35b
9-42-35c
यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे।
तस्यतस्य सरिच्छ्रेष्ठा गृहादि शयनादिकम्।
षड्रसं भोजनं चैव दानं नानाविधं तथा।।
9-42-36a
9-42-36b
9-42-36c
ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम्।
राजानं तुष्टुवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिषः शुभाः।।
9-42-37a
9-42-37b
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा।
विस्मिता मानुषाश्चासन्दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम्।।
9-42-38a
9-42-38b
ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतु--
र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः।
वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं
धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम।।
9-42-39a
9-42-39b
9-42-39c
9-42-39d
।। इति श्रीमन्महाभारते शल्यपर्वणि
ह्रदप्रवेशपर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्यायः।। 42 ।।

[सम्पाद्यताम्]

9-42-1 ब्रह्मयोनेरवाकीर्णमिति झ.पाठः। तत्र ब्रह्मयोनेः ब्राह्मण्योत्पादकात्तीर्थादवाकीर्णं नाम द्वाल्भ्यसेवितं तीर्थं जगामेत्यर्थः ।। 9-42-3 पाञ्चलान्विश्वजितो महत्मान्ते अगमन्।। 9-42-4 ईश्वरं पाश्चालसजम्।। 9-42-5 xxxxxxxxxxx खयं तत्र भागं न गृहीतवानित्यर्थः।। 9-42-19 अथ वै प्राश्निकांस्तत्रेति झ पाठः।। 9-42-42 द्विचत्वारिंशोऽध्यायः।।

शल्यपर्व-041 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शल्यपर्व-043