महाभारतम्-09-शल्यपर्व-031

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
← शल्यपर्व-030 महाभारतम्
नवमपर्व
महाभारतम्-09-शल्यपर्व-031
वेदव्यासः
शल्यपर्व-032 →
  1. 001
  2. 002
  3. 003
  4. 004
  5. 005
  6. 005ब
  7. 006
  8. 007
  9. 008
  10. 009
  11. 010
  12. 011
  13. 012
  14. 013
  15. 014
  16. 015
  17. 016
  18. 017
  19. 018
  20. 019
  21. 020
  22. 021
  23. 022
  24. 023
  25. 024
  26. 025
  27. 026
  28. 027
  29. 028
  30. 029
  31. 030
  32. 031
  33. 032
  34. 033
  35. 034
  36. 035
  37. 036
  38. 037
  39. 038
  40. 039
  41. 040
  42. 041
  43. 042
  44. 043
  45. 044
  46. 045
  47. 046
  48. 047
  49. 048
  50. 049
  51. 050
  52. 051
  53. 052
  54. 053
  55. 054
  56. 055
  57. 056
  58. 057
  59. 058
  60. 059
  61. 060
  62. 061
  63. 062
  64. 063
  65. 064
  66. 065
  67. 066


युधिष्ठिरेण हदस्थं दुर्योधनं प्रति निष्ठुरोक्तिभिः सन्तर्जनम्।। 1 ।।
युधिष्ठिरदुर्योधनयोः संवादः।। 2 ।।

सञ्जय उवाच। 9-31-1x
ततस्तेष्वपयातेषु रथेषु त्रिषु पाण्डवाः।
तं हदं प्रत्यपद्यन्त यत्र दुर्योधनोऽभवत्।।
9-31-1a
9-31-1b
आसाद्य च कुरुश्रेष्ठ तदा द्वैपायनं हदम्।
स्तम्भितं धार्तराष्ट्रेण दृष्ट्वा तं सलिलाशयम्।।
9-31-2a
9-31-2b
वासुदेवमिदं वाक्यमब्रवीत्कुरुनन्दनः।
पश्येमां धार्तराष्ट्रेण मायामप्सु प्रयोजिताम्।।
9-31-3a
9-31-3b
विष्टभ्य सलिलं शेते नास्य मानुषतो भयम्।
दैवीं मायामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम्।।
9-31-4a
9-31-4b
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन्विमोक्ष्यते।
यद्यस्य समरे साह्यं कुरुते वज्रभृत्स्वयम्।
तथाप्येनं हतं युद्धे लोका द्रक्ष्यन्ति माधव।।
9-31-5a
9-31-5b
9-31-5c
वासुदेव उवाच। 9-31-6x
मायाविन इमां मायां मायया जहि भारत।
मायावी मायया वध्यः सत्यमेतद्युधिष्ठिर।।
9-31-6a
9-31-6b
क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्भायामप्सु प्रयोज्य च।
जहि त्वं भरतश्रेष्ठ मायात्मानं सुयोधनम्।।
9-31-7a
9-31-7b
क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः।
क्रियाभ्युपायैर्बलिभिर्बलिर्बद्धो महात्मना।।
9-31-8a
9-31-8b
क्रियाभ्युपायपूर्वं वै हिरण्याक्षो महासुरः।
हिरण्यकशिपुश्चैव क्रिययैव निषूदितौ।।
9-31-9a
9-31-9b
वृत्रश्च निहतो राजन्क्रिययैव महाबलः।
तथा पौलस्त्यतनयो रावणो नाम राक्षसः।
रामेण निहतो राजन्सानुबन्धः सहानुगः।।
9-31-10a
9-31-10b
9-31-10c
क्रियया योगमास्थाय तथा त्वमपि विक्रम।। 9-31-11a
क्रियाभ्युपायैर्निहतौ मया राजन्पुरातनौ।
तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्।।
9-31-12a
9-31-12b
वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो।
सुन्दोपसुन्दावसुरौ क्रिययैव निषूदितौ।।
9-31-13a
9-31-13b
क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो।
क्रिया बलवती राजन्नान्यत्किंचिद्युधिष्ठिर।।
9-31-14a
9-31-14b
दैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा।
क्रियाभ्युपायैर्निहताः क्रियां तस्मात्समाचर।।
9-31-15a
9-31-15b
सञ्जय उवाच। 9-31-16x
इत्युक्तो वासुदेवेन पाण्डवः संशितव्रतः।
जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महाबलम्।
अभ्यभाषत कौन्तेयः प्रहसन्निव भारत।।
9-31-16a
9-31-16b
9-31-16c
सुयोधन किमर्थोऽयमारम्भोऽप्सु कृतस्त्वया।
सर्वं क्षत्रं घातयित्वा स्वकुलं च विशाम्पते।।
9-31-17a
9-31-17b
जलाशयं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः।
उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व सहास्माभिः सुयोधन।।
9-31-18a
9-31-18b
स ते दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः।
यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन्व्यवस्थितः।।
9-31-19a
9-31-19b
सर्वे त्वां शूर इत्येवं जना जल्पन्ति संसदि।
व्यर्थं तद्भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशायिनः।।
9-31-20a
9-31-20b
उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व क्षत्रियोऽसि कुलोद्भवः।
कौरवेयो विशेषेण कुलं जन्म च संस्मर।।
9-31-21a
9-31-21b
स कथं कौरवे वंशे प्रशंसञ्जन्म चात्मनः।
युद्वात्त्रस्ततरस्तोयं प्रविश्य प्रतितिष्ठसि।।
9-31-22a
9-31-22b
अयुद्धेन व्यवस्थानं नैष धर्मः सनातनः।। 9-31-23a
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं रणे राजन्पलायनम्।
कथं पारमगत्वा हि युद्धे त्वं वै जिजीविषुः।।
9-31-24a
9-31-24b
इमान्निपतितान्दृष्ट्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄंस्तथा।
सम्बन्धिनो वयस्यांश्च मातुलान्बान्धवांस्तथा।
घातयित्वा कथं तात हदे तिष्ठति साम्प्रतम्।।
9-31-25a
9-31-25b
9-31-25c
शूरमानी न शूरस्त्वं मृषा वदसि भारत।
शूरोऽहमिति दुर्बुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वतः।।
9-31-26a
9-31-26b
न हि शूराः पलायन्ते शत्रून्दृष्ट्वा कथञ्चन।
ब्रूहि वा त्वं यया वृत्त्या शूर त्यजसि सङ्गरम्।।
9-31-27a
9-31-27b
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व विहाय भयमात्मनः।
घातयित्वा सर्वसैन्यं भ्रातॄंश्चैव सुयोधन।।
9-31-28a
9-31-28b
नेदानीं जीविते बुद्धिः कार्या धर्मचिकीर्षया।
क्षत्रधर्ममुपाश्रित्य त्वद्विधेन सुयोधन।।
9-31-29a
9-31-29b
यत्तु कर्णमुपाश्रित्य शकुनिं चापि सौबलम्।
दुःशासनं च मोहात्त्वमात्मानं नावबुद्धवान्।।
9-31-30a
9-31-30b
तत्पापं सुमहत्कृत्वा प्रतियुध्यस्व भारत।
कथं हि त्वद्विधो मोहाद्रोचयेत पलायनम्।।
9-31-31a
9-31-31b
क्व ते तत्पौरुषं यातं क्व च मानः सुयोधन।
क्व च विक्रान्तता याता क्व च विस्फूर्जितं महत्।।
9-31-32a
9-31-32b
क्व ते कृतास्त्रता याता किं नु शेषे जलाशये।
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व क्षत्रधर्मेण भारत।।
9-31-33a
9-31-33b
अस्मांस्तु वा पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम्।
अथवा निहतोस्माभिर्भूमौ स्वप्स्यसि भारत।।
9-31-34a
9-31-34b
एष ते परमो धर्मः सृष्टो धात्रा महात्मना।
तं कुरुष्व यथातथ्यं पौरुषे स्व व्यवस्थितः।।
9-31-35a
9-31-35b
सञ्जय उवाच। 9-31-36x
एवमुक्तो महाराज धर्मपुत्रेण धीमता।
सलिलस्थस्तव सुत इदं वचनमब्रवीत्।।
9-31-36a
9-31-36b
नैतच्चित्रं महाराज यद्भीः प्राणिनमाविशेत्।
न च प्राणभयाद्भीतो व्यपयातोऽस्मि भारत।।
9-31-37a
9-31-37b
अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पार्ष्णिसारथिः।
एकश्चाप्यगणः सङ्ख्ये प्रत्याश्वासमरोचयम्।।
9-31-38a
9-31-38b
न प्राणहेतोर्न भयाश्च विषादाद्विशाम्पते।
इदमम्भः प्रविष्टोऽस्मि श्रमात्त्विदमनुष्ठितम्।।
9-31-39a
9-31-39b
त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तव।
अहमुत्थाय वः सर्वान्प्रतियोत्स्यामि संयुगे।।
9-31-40a
9-31-40b
युधिष्ठिर उवाच। 9-31-41x
आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगयामहे।
तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुयोधन।।
9-31-41a
9-31-41b
हत्वा वा समरे पार्थान्स्फीतं राज्यमवाप्नुहि।
निहतो वा रणेऽस्माभिर्वीरलोकमवाप्स्यसि।।
9-31-42a
9-31-42b
दुर्योधन उवाच। 9-31-43x
यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन।
त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर।।
9-31-43a
9-31-43b
क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रियपुङ्गवाम्।
न ह्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम्।।
9-31-44a
9-31-44b
अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर।
भङ्‌क्त्वा पाञ्चालपाण्डूनामुत्साहं भरतर्षभ।।
9-31-45a
9-31-45b
न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित्।
द्रोणे कर्णे च संशान्ते निहते च पितामहे।।
9-31-46a
9-31-46b
अस्त्विदानीमियं राजन्केवला पृथिवी तव।
असहायो हि को राजा राज्यमिच्छेत्प्रशासितुम्।।
9-31-47a
9-31-47b
सुहृदस्तादृशान्हत्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄनपि।
भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेत मादृशः।।
9-31-48a
9-31-48b
अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः।
रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत।।
9-31-49a
9-31-49b
हतबान्धवभूयिष्ठा हताश्वा हतकुञ्जरा।
एषा ते पृथिवी राजन्भुङ्क्षैनां विगतज्वरः।।
9-31-50a
9-31-50b
वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी।
न हि मे निर्जनस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो।।
9-31-51a
9-31-51b
गच्छ त्वं भुङ्क्ष राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम्।
हतयोधां नष्टरत्नां शीर्णक्षत्रां यथासुखम्।।
9-31-52a
9-31-52b
[सञ्जय उवाच। 9-31-53x
दुर्योधनं तव सुतं सलिलस्थं महायशाः।
श्रुत्वा तु करुणं वाक्यमभाषत युधिष्ठिरः।।]
9-31-53a
9-31-53b
युधिष्ठिर उवाच। 9-31-54x
आर्तप्रलापान्मा तात सलिलस्थः प्रभाषथाः।
नैतन्मनसि मे राजन्वाशितं शकुनेरिव।।
9-31-54a
9-31-54b
यदि वापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय सुयोधन।
नाहमिच्छेयमवनिं त्वया दत्तां प्रशासितुम्।।
9-31-55a
9-31-55b
अधर्मेण न गृह्णीयां त्वया दत्तां महीमिमाम्।
न हि धर्मः स्मृतो राजन्क्षत्रियस्य प्रतिग्रहः।।
9-31-56a
9-31-56b
त्वया दत्तां न चेच्छेयं पृथिवीमखिलामहम्।
त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्ताऽस्मि वसुधामिमाम्।।
9-31-57a
9-31-57b
अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि।
त्वयेयं पृथिवी राजन्किं न दत्ता तदैव हि।।
9-31-58a
9-31-58b
धर्मतो याचमानानां प्रशमार्थं कुलस्य नः।
वार्ष्णेयं प्रथमं राजन्प्रत्याख्याय महाबालम्।।
9-31-59a
9-31-59b
किमिदानीं ददासि त्वं को हि ते जित्तविभ्रमः।
अभियुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छेद्धि मेदिनीं।।
9-31-60a
9-31-60b
न त्वमद्य महीं दातुमीशः कौरवनन्दन।
आच्छेत्तुं वा बलाद्राजन्स कथं दातुमिच्छसि।।
9-31-61a
9-31-61b
मां तु निर्जित्य सङ्ग्रामे पालयेमां वसुन्धराम्।
सूच्यग्रेणापि यद्भूमेरपि भिद्येत भारत।।
9-31-62a
9-31-62b
तन्मात्रमपि तन्मह्यं न ददाति पुरा भवान्।
स कथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशाम्पते।।
9-31-63a
9-31-63b
सूच्यग्रं नात्यजः पूर्वं स कथं त्यजसि क्षितिम्।। 9-31-64a
एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवीमिमाम्।
को हि मूढो व्यवस्येत शत्रोर्दातुं वसुन्धराम्।।
9-31-65a
9-31-65b
त्वं तु केवलमौर्ख्येण विमूढो नावबुध्यसे।
पृथिवीं दातुकामोऽपि जीवंस्त्वं नैव मोक्ष्यसे।।
9-31-66a
9-31-66b
अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम्।
अथवा निहतोऽस्माभिर्व्रज लोकाननुत्तमान्।।
9-31-67a
9-31-67b
आवयोर्जीवतो राजन्मयि च त्वयि च ध्रुवम्।
संशयः सर्वभूतानां विजये नौ भविष्यति।।
9-31-68a
9-31-68b
जीवितं त्वयि दुष्प्रापं मयि यत्परिवर्तते।
जीवयेयमहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः।।
9-31-69a
9-31-69b
दहने हि कृतो यत्नस्त्वयाऽस्मासु विशेषतः।
आशीविषैर्विषैश्चापि जले जापि प्रवेशनैः।
त्वया विनिकृता राजन्राज्यस्य हरणेन च।।
9-31-70a
9-31-70b
9-31-70c
अप्रियाणां च वचनैर्द्रौपद्याः कर्षणेन च।
एतस्मात्कारणात्पाप जीवितं न विद्यते।।
9-31-71a
9-31-71b
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व युद्धे श्रेयो भविष्यति।। 9-31-72a
एवं तु विविधा वाचो जययुक्ताः पुनःपुनः।
कीर्तयन्ति स्म ते वीरास्तत्रतत्र जनाधिप।।
9-31-73a
9-31-73b
।। इति श्रीमन्महाभारते
शल्यपर्वणि ह्रदप्रवेशपर्वणि
अष्टादशदिवसयुद्धे एकत्रिंशोऽध्यायः।। 31 ।।

[सम्पाद्यताम्]

9-31-7 कियाभ्युपायैः शत्रुकियानुरूपैः प्रतीकारैर्घर्म्यैरधर्म्यैर्वेत्यर्थः। एतेतु च्छलकारिणश्छलैरेव हन्तव्या इति भावः। माययैव सुयोधनं इति क.पाठः।। 9-31-11 विक्रम विक्रमं कुरुष्व क्रियया योगमास्थाय हतस्त्वाष्ट्रोऽपि विक्रमात् इति क.पाठः।। 9-31-12 क्रियाभ्युपायैर्निहतो मयो नाम महासरः। इति क.पाठः।। 9-31-27 हे शूरेति साधिक्षेपसम्बोधनम्। यया वृत्त्या निमित्तभूतया। वानप्रस्थत्वेन वा न्यस्तशस्त्रत्वेन वा क्लीबत्वेन वा त्वं सङ्गरं त्यजसि तां वृत्तिं ब्रूहि। न त्वं वानप्रस्थोऽसि राज्यार्थिवात्। नापि न्यस्तशस्त्रो गदाधारित्वात्। परिशेषात क्लीबोऽस्मीति मा भाषस्व। युद्धं कुर्विति भावः।। 9-31-32 पौरुषं यत्नः। विक्रान्तता शौर्यम्। विस्फूर्जितं गर्जनम्।। 9-31-49 हतापत्यस्य भारत इति क.पाठः।। 9-31-52 निहतत्विषमिति क.ङ.पाठः।। 9-31-31 एकत्रिंशोऽध्यायः।।

शल्यपर्व-030 पुटाग्रे अल्लिखितम्। शल्यपर्व-032