लिङ्गपुराणम् - उत्तरभागः/अध्यायः ४५

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लिङ्गपुराणम् - उत्तरभागः
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  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५

ऋषय ऊचुः।।
एवं षोडश दानानि कथितानि शुभानि च।।
जीवच्छ्रा द्धक्रमोऽस्माकं वक्तुमर्हसि सांप्रतम्।। ४५.१ ।।

सूत उवाच।।
जीवच्छ्राद्धविधिं वक्ष्ये समासात्सर्वसंमतम्।।
मनवे देवदेवेन कथितं ब्रह्मणा पुरा।। ४५.२ ।।

वसिष्ठास च शिष्टाय भृगवे भार्गवाय च।।
श्रृण्वंतु सर्वभावेन सर्वसिद्धिकरं परम्।। ४५.३ ।।

श्राद्धमार्गक्रमं साक्षाच्छ्राद्धार्हाणामपि क्रमम्।।
विशेषमपि वक्ष्यामि जीवच्छ्राद्धस्य सुव्रताः।। ४५.४ ।।

पर्वते वा नदीतीरे वने वायतनेऽपि वा।।
जीवच्छ्राद्धं प्रकर्तव्यं मृतकाले प्रयत्नतः।। ४५.५ ।।

जीवच्छ्राद्धे कृते जीवो जीवन्नेव विमुच्यते।।
कर्म कुर्वन्नकुर्वन्वा ज्ञानी वाज्ञानवानपि।। ४५.६ ।।

श्रोत्रियोऽश्रोत्रियो वापि ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा।।
वैश्यो वा नात्र संदेहो योगमार्गगतो यता।। ४५.७ ।।

परीक्ष्य भूमिं विधिवद्गंधवर्णरसादिभिः।।
शल्यमुद्धृत्य यत्नेन स्थांडिलं सैकतं भुवि।। ४५.८ ।।

मध्यतो हस्तमात्रेण कुंडं चैवायतं शुभम्।।
स्थांडिलं वा प्रकर्तव्यमिषुमात्रं पुनः पुनः।। ४५.९ ।।

उपलिप्य विधानेन चालिप्याग्निं विधाय च।।
अन्वाधाय यथाशास्त्रं परिगृह्य च सर्वतः।। ४५.१० ।।

परिस्तीर्य स्वशाखोक्तं पारंपर्यक्रमागतम्।।
समाप्याग्निमुखं सर्वं मंत्रैरेतैर्यथाक्रमम्।। ४५.११ ।।

संपूज्य स्थंडिले वह्नौ होमयेत्समिदादिभिः।।
आदौ कृत्वा समिद्धोमं चरुणा च पृथक्पृथक्।। ४५.१२ ।।

घृतेन च पृथक्प्रात्रे शोधितेन पृथक्पृथक्।।
जुहुयादात्मनोद्धृत्य तत्त्वभूतानि सर्वतः।। ४५.१३ ।।

ॐ भूः ब्रह्मणे नमः।। ४५.१४ ।।

ॐ भूः ब्रह्मणे स्वाहा।। ४५.१५ ।।

ॐ भुवः विष्णवे नमः।। ४५.१६ ।।

ॐ भुवः विष्णवे स्वाहा।। ४५.१७ ।।

ॐ स्वः रुद्राय नमः।। ४५.१८ ।।

ॐ स्वः रुद्राय स्वाहा।। ४५.१९ ।।

ॐ महः ईश्वराय नमः।। ४५.२० ।।

ॐ महः ईश्वराय स्वाहा।। ४५.२१ ।।

ॐ जनः प्रकृतये नमः।। ४५.२२ ।।

ॐ जनः प्रकृतये स्वाहा।। ४५.२३ ।।

ॐ तपः मुद्गलाय नमः।। ४५.२४ ।।

ॐ तपः मुद्गलाय स्वाहा।। ४५.२५ ।।

ॐ ऋतं पुरुषाय नमः।। ४५.२६ ।।

ॐ ऋतं परुषाय स्वाहा।। ४५.२७ ।।

ॐ सत्यं शिवाय नमः।। ४५.२८ ।।

ॐ सत्यं शिवाय स्वाहा।। ४५.२९ ।।

ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गंधं शर्वाय देवाय भूर्नमः।। ४५.३० ।।

ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गंधं शर्वाय भूः स्वाहा।। ४५.३१ ।।

शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गंधं शर्वस्य देवस्य पत्न्यै भूर्नमः।। ४५.३२ ।।

ॐ शर्व धरां मे गोपाय घ्राणे गंधं सर्वपत्न्यैभूः स्वाहा।। ४५.३३ ।।

ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायं रसं भवाय देवाय भुवो नमः।। ४५.३४ ।।

ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवाय देवाय भुवः स्वाहा।। ४५.३५ ।।

ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य देवस्य पत्न्यै भुवो नमः।। ४५.३६ ।।

ॐ भव जलं मे गोपाय जिह्वायां रसं भवस्य पत्न्यै भुवः स्वाहा।। ४५.३७ ।।

रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वरों नमः।। ४५.३८ ।।

रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्राय देवाय स्वः स्वाहा।। ४५.३९ ।।

रुद्राग्निं मे गापाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य पत्न्यै स्वरों नमः।। ४५.४० ।।

रुद्राग्निं मे गोपाय नेत्रे रूपं रुद्रस्य देवस्य पत्न्यैस्वः स्वाहा।। ४५.४१ ।।

उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शं उग्राय देवाय महर्नमः।। ४५.४२ ।।

उग्र वायूं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्राय देवाय महः स्वाहा।। ४५.४३ ।।

उग्र वायुं मे गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै महरों नमः।। ४५.४४ ।।

ॐ उग्र वायुं मो गोपाय त्वचि स्पर्शमुग्रस्य देवस्य पत्न्यै देवाय जनः स्वाहा।। ४५.४५ ।।

भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनो नमः।। ४५.४६ ।।

भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमाय देवाय जनः स्वाहा।। ४५.४७ ।।

भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य पत्न्यै जनो नमः।। ४५.४८ ।।

भीम सुषिरं मे गोपाय श्रोत्रे शब्दं भीमस्य देवस्य पत्न्यै जनः स्वाहा।। ४५.४९ ।।

ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशाय देवाय तपो नमः।। ४५.५० ।।

ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णमीशाय देवाय तपः स्वाहा।। ४५.५१ ।।

रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णामीशस्य पत्न्यै तपो नमः।। ४५.५२ ।।

ईश रजो मे गोपाय द्रव्ये तृष्णमीशस्य पत्न्यै तपः स्वाहा।। ४५.५३ ।।

महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं नमः।। ४५.५४ ।।

महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय ऋतं स्वाहा।। ४५.५५ ।।

महादेव सत्यं मे गोपाय श्रद्धां धर्मे महादेवाय पत्न्यै ऋतं नमः।। ४५.५६ ।।

महादेव सत्यं म गोपाय श्रद्धां महादेवस्य पत्न्यै ऋतं स्वाहा।। ४५.५७ ।।

पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभोग्यं पशुपतये देवाय सत्यं नमः।। ४५.५८ ।।

पशुपते पाशं मे गोपाय भोक्तृत्वभाग्यं पशुपतये देवस्य सत्यं स्वाहा।। ४५.५९ ।।

ॐ पशुपते पाशं मे गोपाय योक्तृत्वभोग्यं पशुपते र्देवस्य पत्न्यै सत्यं नमः।। ४५.६० ।।

ॐ पशुपते पाशं म गोपाय योक्तृत्वभोग्यं पशुपतेर्देवस्य पत्न्यै सत्यं स्वाहा।। ४५.६१ ।।

ॐ शिवाय नमः।। ४५.६२ ।।

ॐ शिवाय सत्यं स्वाहा।। ४५.६३ ।।

एवं शिवाय होतव्यं विरिंच्याद्यं च पूववत्।।
विरिंचाद्यं च पूर्वोक्तं सृष्टिमार्गेषु सुव्रताः।। ४५.६४ ।।

पुनः पशुपतेः पत्नीं तथा पशुपतीं क्रमात्।।
संपूज्य पूर्ववन्मंत्रैर्होतव्यं च क्रमेण वै।। ४५.६५ ।।

चर्वंतमाज्यपूर्वं च समिदंतं समाहितः।। ४५.६६ ।।

ॐ शर्व धरां मे छिंधि घ्राणे गंधं छिंधि मेघं जहि भूः स्वाहा।। ४५.६७ ।।

भुवः स्वाहा।। ४५.६८ ।।

स्वः स्वाहा।। ४५.६९ ।।

भूर्भुवः स्वः स्वाहा।। ४५.७० ।।

एवं पृथक्पृथग्घुत्वा केवलेन घृतेन वा।।
सहस्रं वा तदर्धं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।। ४५.७१ ।।

विरजा च घृतेनैव शतमष्टोत्तरं पृथक्।।
प्राणादिभिश्च जुहुयाद्धृतेनैव तु केवलम्।। ४५.७२ ।।

ॐ प्राणे निविष्टोऽमृतं जुहोमि शिवो म विशाप्रदाहाय प्राणाय स्वाहा।। ४५.७३ ।।

प्राणाधिपतये रुद्राय वृषांतकाय स्वाहा।। ४५.७४ ।।

ॐ भूः स्वाहा।। ४५.७५ ।।

ॐ भुवः स्वाहा।। ४५.७६ ।।

ॐ स्वः स्वाहा।। ४५.७७ ।।

भूर्भूवः स्वः स्वाहा।। ४५.७८ ।।

एवं क्रमेण जुहुयाच्छ्राद्धोक्तं च यताक्रमम्।।
सप्तमेऽनि योगींद्राञ्छ्राद्धार्हानपि भोजयेत्।। ४५.७९ ।।

शर्वादीनां च विप्राणां वस्त्राभरणकंबलान्।।
वाहनं शयनं यानं कांस्यताम्रादिभाजनम्।। ४५.८० ।।

हैमं च राजतं धेनुं तिलान् क्षेत्रं च वैभवम्।।
दासीदासगणश्चैव दातव्यो दक्षिणामपि।। ४५.८१ ।।

पिंडं च पूर्ववद्दद्यात्पृथगष्टप्रकारतः।।
ब्राह्मणानं सहस्रं च भोजयेच्च सदक्षिणम्।। ४५.८२ ।।

एकं वा योगनिरतं भस्मनिष्ठं जितेंद्रियम्।।
त्र्यहं चैव तु रुद्रस्य महाचरुनिवेदनम्।। ४५.८३ ।।

विशेष एवं कथित अशेषश्राद्धचोदितः।।
मृते कुर्यान्न कुर्याद्वा जीवन्मुक्तो यतः स्वयम्।। ४५.८४ ।।

नित्यनैमित्तिकादीनि कुर्याद्धा संत्त्यजेत्तु वा।।
बांधवेऽपि मृते तस्य शौचाशौचं न विद्यते।। ४५.८५ ।।

सूतकं च न संदेहः स्नानमात्रेण शुद्ध्यति।।
पश्चाज्जाते कुमारे च स्वे क्षेत्रे चात्मनो यदि।। ४५.८६ ।।

तस्य सर्वं प्रकर्तव्यं पुत्रोऽपि ब्रह्मविद्भिवेत्।।
कन्यका यदि रांजाता पश्चात्तस्य महात्मनः।। ४५.८७ ।।

एकपर्णा इव ज्ञेया अपर्णा इव सुव्रता।।
भवत्येव न संदेहस्तस्याश्चान्वयजा अपि।। ४५.८८ ।।

मुच्यंते नात्र संदेहः पितरो नरकादपि।।
मुच्यंते कर्मणानेन मातृतः पितृतस्तथा।। ४५.८९ ।।

कालं गते द्विजे भूमौ खनेच्चापि दहेत्तु वा।।
पुत्रकृत्यमशेषं च कृत्वा दोषो न विद्यते।। ४५.९० ।।

कर्मणा चोत्तरेणैव गतिरस्य न विद्यते।।
ब्रह्मणाकथितं सर्वं मुनीनां भावितात्मनाम्।। ४५.९१ ।।

पुनः सनत्कुमाराय कथितं तेन धीमता।।
कृष्णद्वैपायनायैव कथितं ब्रह्मसूनुना।। ४५.९२ ।।

प्रसादात्तस्य देवस्य वेदव्यासस्य धीमतः।।
ज्ञातं मया कृतं चैव नियोगादेव तस्य तु।। ४५.९३ ।।

एतद्वः कथितं सर्वं रहस्यं ब्रह्मसिद्धिदम्।।
मुनिपुत्राय दातव्यं न चाभक्ताय सुव्रताः।। ४५.९४ ।।

इति श्रीलिंगमहापुराणे उत्तरभागे जीवच्छ्राद्वविधिर्नाम पंचचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः।। ४५ ।।