लिङ्गपुराणम् - उत्तरभागः/अध्यायः ४४

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लिङ्गपुराणम् - उत्तरभागः
  1. अध्यायः १
  2. अध्यायः २
  3. अध्यायः ३
  4. अध्यायः ४
  5. अध्यायः ५
  6. अध्यायः ६
  7. अध्यायः ७
  8. अध्यायः ८
  9. अध्यायः ९
  10. अध्यायः १०
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  12. अध्यायः १२
  13. अध्यायः १३
  14. अध्यायः १४
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  16. अध्यायः १६
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  18. अध्यायः १८
  19. अध्यायः १९
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  29. अध्यायः २९
  30. अध्यायः ३०
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  43. अध्यायः ४३
  44. अध्यायः ४४
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  49. अध्यायः ४९
  50. अध्यायः ५०
  51. अध्यायः ५१
  52. अध्यायः ५२
  53. अध्यायः ५३
  54. अध्यायः ५४
  55. अध्यायः ५५

सनत्कुमार उवाच।।
अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।।
पूर्वोक्तदेशकाले च मंडपे च विधानतः।। ४४.१ ।।

प्रणयात्कुंडमध्ये च स्थंडिले शिवसन्निधौ।।
पूर्वं विष्णुं समासाद्य पद्मयोनिमतः परम्।। ४४.२ ।।

मंत्राभ्यां विधिनोक्ताभ्यां प्रणवादिसमंत्रकम्।।
नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।। ४४.३ ।।

ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे।।
शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट्वषट् तथा।। ४४.४ ।।

पूजयित्वा विधानेन पश्चाद्धोमं समाचरेत्।।
सर्वद्रव्यं हि होतव्यं द्वाभ्यां कुंडविधानतः।। ४४.५ ।।

ऋत्विजौ द्वौ प्रकर्तव्यौ गुरुणा वेदपारगौ।।
तानुद्दिश्य यथान्यायं विप्रेभ्यो दापयेद्धनम्।। ४४.६ ।।

शतमष्टोत्तरं तेभ्यः पृथक्पृथगनुत्तमम्।।
वस्त्राभरणसंयुक्तं सर्वालंकारसंयुतम्।। ४४.७ ।।

गुरुरेको हि वै श्रीमान् ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः।।
तेषां पृथक्पृथग्देयं भोजयेद्ब्राह्मणानपि।। ४४.८ ।।

शिवार्चना च कर्तव्या स्नपनादि यथाक्रमम्।। ४४.९ ।।

इति श्रीलिंगमहापुराणे उत्तरभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः।। ४४ ।।