महाभारतम्-15-आश्रमवासिकपर्व-001

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  35. 035
  36. 036
  37. 037
  38. 038
  39. 039
  40. 040
  41. 041

युधिष्ठिरेण राज्यपरिपालनम्।। 1 ।।
कुन्तीद्रौपद्यादिभिर्गान्धार्यां श्वश्रूवद्वर्तनम्।। 2 ।।
भीमवर्जमर्जुनादिभिर्युधिष्ठिरशासनेन विशेषतो धृतराष्ट्रानुवर्तनम्।। 3 ।।

श्रीवेदव्यासाय नमः। 15-1-1x
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।
15-1-1a
15-1-1b
जनमेजय उवाच। 15-1-1x
प्राप्य पैतामहं राज्यं मम पूर्वपितामहाः।
कथमासन्महाराजे धृतराष्ट्रे महात्मनि।।
15-1-1a
15-1-1b
स तु राजा हतामात्यो हतपुत्रो निराश्रयः।
कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च तपस्विनी।।
15-1-2a
15-1-2b
कियन्तं चैव कालं ते मम पूर्वपितामहाः।
स्थिता राज्ये महात्मानस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।।
15-1-3a
15-1-3b
वैशम्पायन उवाच। 15-1-4x
प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन्।।
15-1-4a
15-1-4b
धृतराष्ट्रमुपातिष्ठद्विदुरः संजयस्तथा।
वैश्यापुत्रश्च मेधावी युयुत्सुः कुरुसत्तम।।
15-1-5a
15-1-5b
पाण्डवाः सर्वकार्येषु पर्यपृच्चन्त तं नृपम्।
चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च।।
15-1-6a
15-1-6b
सदाऽभिगम्य ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम्।
पादाभिवादनं कृत्वा धर्मिराजमते स्थिताः।।
15-1-7a
15-1-7b
ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे।
कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत।।
15-1-8a
15-1-8b
द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रियः।
समां वृत्तिमवर्तन्त तयोः श्वश्र्वोर्यथाविधि।।
15-1-9a
15-1-9b
शयनानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च।
राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः।।
15-1-10a
15-1-10b
युधिष्ठिरो महाराज धृतराष्ट्रेऽभ्युपाहरत्।
तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिमवर्तत।।
15-1-11a
15-1-11b
विदुरः संजयश्चैव युयुत्सुश्चैव कौरव।
उपासते स्म तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम्।।
15-1-12a
15-1-12b
श्यालो द्रोणस्य यश्चासीद्दयितो ब्राह्ममो महान्।
स च तस्मिन्महेष्वासः कृपः समभवत्तदा।।
15-1-13a
15-1-13b
व्यासश्च भगवान्नित्यमासांचक्रे नृपेण ह।
कथाः कुर्वन्पुराणर्षिर्देवर्षिपितृरक्षसाम्।।
15-1-14a
15-1-14b
धर्मयुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो विदुरस्तान्यकारयत्।।
15-1-15a
15-1-15b
सामन्तेभ्यः प्रियाण्यस्य कार्याणि सुबहून्यपि।
प्राप्यन्तेऽर्थेः सुलघुभिः सुनयाद्विदुरस्य वै।।
15-1-16a
15-1-16b
अकरोद्बन्धमोक्षं च वध्यानां मोक्षणं तथा।
न च धर्मसुतो राजा कदाचित्किञ्चिदब्रवीत्।।
15-1-17a
15-1-17b
विहारयात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः।
सर्वान्कामानुपस्थाप्य धृतराष्ट्रे न्यवेदयत्।।
15-1-18a
15-1-18b
आरालिकाः सूपकारा रागषाडविकास्तथा।
उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथापुरम्।।
15-1-19a
15-1-19b
वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च।
उपाजह्रुर्यथाकालं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः।।
15-1-20a
15-1-20b
मैरेयमधुमांसानि पानकानि लघूनि च।
चित्रान्भक्ष्यविकारांश्च चक्रुस्तस्य यथा पुरा।।
15-1-21a
15-1-21b
ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुस्ततस्ततः।
उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथापुरा।।
15-1-22a
15-1-22b
कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती च यशस्विनी।
उलूपी नागकन्या च देवी चित्राङ्गदा तथा।।
15-1-23a
15-1-23b
धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासन्धसुता तथा।
एताश्चान्याश्च बह्व्यो वै योषितः पुरुषर्षभ।
किंकराः पर्युपातिष्ठन्सर्वाः सुबलजां तथा।।
15-1-24a
15-1-24b
15-1-24c
यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किञ्चिद्दुःखमाप्नुयात्।
इति तानन्वशाद्भातॄन्नित्यमेव युधिष्ठिरः।।
15-1-25a
15-1-25b
एवं ते धर्मराजस्य श्रुत्वा वचनमर्थवत्।
सविशेषमवर्तन्ति भीममेकं तदा विना।।
15-1-26a
15-1-26b
न हि तत्तस्य वीरस्य हृदयादपसर्पति।
धृतराष्ट्रस्य दुर्बुद्ध्या यद्वृत्तं द्यूतमण्डले।।
15-1-27a
15-1-27b
।। इति श्रीमन्महाभारते आश्रमवासिकपर्वणि
आश्रमवासपर्वणि प्रथमोऽध्यायः।। 1 ।।

[सम्पाद्यताम्]

15-1-2 गान्धारी च यशस्विनीति झ.थ.पाठः।। 15-1-5 उपातिष्ठदाराधितवान्।। 15-1-9 सतां वृत्तिमवर्तन्तेति थ.पाठः।। 15-1-13 तस्मिन्धृतराष्ट्रे समभवत्तन्निकटे अभवत्।। 15-1-14 वासं चक्रे नृपेण हेति क.थ.पाठः।। 15-1-16 प्रभावाद्विदुरस्य वै इति क.थ.पाठः।। 15-1-19 अरया शस्त्रविशेषेण लूनं छिन्नं शाकादि अरालु तत्संस्कुर्वन्ति ते आरालिकाः शाकविशेषकर्तारः रागखाण्डविकास्तथेति झ.पाठः। रागषाडवं पिप्पलीशुठीशर्करोपेतो मुद्गयूषस्तत्कर्तारो रागषाडविकाः।।

आश्रमवासिकपर्व पुटाग्रे अल्लिखितम्। आश्रमवासिकपर्व-002