येन सवैर्मनोभिः । नानात्म्यं चाप्रमाणं गदसि यदि तनूपाधिभिस्त्वं व्यवस्थां सिद्धेऽसिद्धेऽपि भेदे यत इह विफलाः कल्पनीया विशेषाः ॥ ३६ ॥
जीवात्मा यदि व्यापक है तो शरीर, प्रयत्न, प्रारब्ध आदि सबको समान होने से भोग की व्यवस्था नहीं होगी क्योंकि मन का भी सब आत्माओं के साथ संबंध होता है । यदि देह रूप उपाधि से व्यवस्था हो सकेगी ऐसा कहेगा तो अनेक श्रात्मा ही प्रमाण होंगे । इस कारण से आत्मा का नानात्व सिद्ध हो अथवा असिद्ध हो विशेष की कल्पना तो निष्फल ही है ॥ ३६ ॥
(जीवानां वैभवं चेत् ) यदि जीवात्माओं को व्यापकता है तो सर्व शरीरों में सब जीवों की अहंता और ममता अनिवार्य होने से भोग व्यवस्था नहीं होगी । अर्थात् यह भोग उसका और यह भोग इसका है और यह भोग मेरा है, इस प्रकार भोग की व्यवस्था नहीं हो सकेगी किंतु सब भोग सभी जीवों को प्राप्त होंगे । ( तनु कृति कररणादृष्ट साधारणत्वात् ). यह शरीर, प्रयत्न, इन्द्रिय और अदृष्टरूप प्रारब्ध किसी एक आत्मा के हैं, इसमें कोई कारण न होने से शरीर, इन्द्रिय और प्रारब्ध ये सर्व जीवों में समान है अर्थात् जीवों को सर्व शरीर प्रयत्न आदिकों में ममता समान है । इसलिये जिस मन के साथ जिस आत्मा का
कोही भोग होता है इस
संयोग है उस मन से उस आत्मा प्रकार ( भोग व्यवस्था न वै स्यात्. )
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