होते हैं ( तथा आत्मा ) वैसे ही आत्मा भी कौन है अर्थात् आत्मा भी अंशों से भिन्न है अथवा अभिन्न है, इत्यादि विकल्प परीक्षा से आत्मा का निरूपण करना भी कठिन है। (च) किंवा ( चेत- तस्य जड़ता किमिति ) उस चेतन को जड़ रूपता भी किस लिये स्वीकार की गई है ( केन वा ) और किस कारण से वह जड़ता उत्पन्न होती है ? असंग में कारण का संबंध ही अवाच्य है । यदि कहो कि कता आदिकों की उत्पत्ति के अर्थ जड़ता का अंगीकार किया गया है तो, हे वादी ( तस्य कर्तृत्वं कीद्दक् ) उस आत्मा की क्रतृता किस प्रकार की है ? वह कर्तृता वास्तव तो है नहीं, क्योंकि श्रुति निष्क्रियत्व का प्रतिपादन करती है । और 'चक्षुषा पश्यामि' इस प्रतीति से भी उस आत्मा की कर्तृता की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि आत्मा संग होने से कारण समूह को धारण ही नहीं कर सकता । ( स ) निष्क्रिय रूप से जो श्रुति में प्रसिद्ध है ऐसा ( एषः ) यह आत्मा ( करण समुद- यम् ) करण समुदाय को ( वा कथं धत्ते ) किस प्रकार धारण करता है ? असंग होने से किसी प्रकार से भी धारण नहीं कर सकता । इसलिये ( देवप्रिय पशुभिः ) देवताओं के पूजक होने से देवताओं के प्यारे और अविवेक होने से पशुओं के समान ( कर्मठः) कर्मका आडंबर रचने वाले कर्म मीमांसकोंसे ( इदं जीवस्य तत्त्वम् ) यह जीव का वास्तव स्वरूप ( दुर्निरूपम् ) निरूपण करने को कठिन है ||३३||
अब तीन श्लोकों से कणाद और गौतम के मत का निरसन करते हैं-
जीवानां वैभवं चेतनु कृति करणादृष्ट साधार- सत्वान् न स्याद्भोग व्यवस्था व्यतिकरमयते