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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/८४

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स्वाराज्य सिद्धि



अंश क्या है ? और उसका योग कैसे है ? आत्मा क्या है ? चेतन की जड़ता किस कारण है ? कैसे उत्पन्न होती है ? उसका कर्तव्य किस प्रकार है ? देव पूजक पशु कर्मठों से जीव तत्त्व का निरूपण करना कठिन है ॥ ३८॥
 ( आत्मा एक चिज्जडात्मा न स्यात ) आत्मा एक होते हुए चित् जड़ रूप नहीं हो सकता, क्योंकि एक अधिकरण में विरुद्ध धर्मों का समावेश हो नहीं सकेगा । ( अथ ) चेतन और जड़ रूपता की उक्ति से अनन्तर विचार किया जाता है कि जड़ रूपता का ज्ञान किससे होगा। जड़ रूप आत्म अंश का जड़ रूपसे ही अर्थात् अपने से ही तो ज्ञान हो नहीं सकेगा। अन्यथा घटादिक जड़ पदार्थ भी अपने को आप ही प्रकाशेंगे और ऐसा होने पर प्रकाशक यह कथन व्यर्थ होगा और यदि कहे कि जड़ अंश का चेतन अंश से ज्ञान होता है सो यह कहना भी आत्माश्रय दोष होने से संभव नहीं । ( विषयः ) जड़ अंश चेतन अंश का विषय है तो ( स ) वह आत्मा ( स्वस्य विषयः स्वयं कथं स्यात् ) अपना विषय आप ही कैसे हो सकता है ? यदि ऐसा कहे कि दोनों अंशों के अंशी से अभेद होने पर भी उक्त दोनों अंशों का परस्पर भेद ही है इसलिये अंशों का विषय विषयी भाव बन सकता है, आत्माश्रय दोष नहीं आता, तो यह कहना भी संभव नहीं क्योंकि ( तौ अंशौ कौ ) चिद् रूप और अचिद् रूप अंश. क्या हैं (योगः ) और तिन श्रंशों का क्या संबंध है ? भाव यह है कि न तो उन अंशों को अवयव रूपता निरूपण कर सकते हैं और न अंशों का कोई संबंध निरूपण कर सकते हैं । अन्यथा आत्मा को सावयवादि प्रसंग प्राप्त होने से अनित्यता दोष प्राप्त होगा और अनित्यता से कृतनाश, अकृताभ्यगम आदि दोष प्राप्त