पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७५

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भोजप्रबन्धः


 तब प्रभात वेला में नगरी की ओर जाते राजा ने अस्ताचल श्रेणी में लटकते चंद्र विम्ब को देखकर कुतुहल पूर्वक सभा में आ उस समय निकटवर्ती कवियों का निरीक्षण करके एक समस्या पढ़ी--'चंद्र विम्ब लटक गया अस्ताचलमाल में ।'

तदा प्राह भवभूनिः-
 'अरुणकिरणजालैरन्तरिक्षे गतर्ने
तो भवभूति ने कहा-
'नम में रवि किरणों से सितारे मिट जाने पर'
-ततो दण्डी प्राह--
'चलति शिशिरवाते मन्दमन्द प्रसाते।'
तव दंडी ने कहा--
'मंद मंद शीत पवन वहते उपाकाल में ।
ततः कालिदासः प्रांह-
'युवतिजनकदम्बे नाथमुक्तौष्ठबिम्वे चरमगिरिनितम्वे चन्द्रविम्वं
ललम्।।
. तदनंतर कालिदास ने कहा--
'स्वामियों से नारियों के मुक्त होते ओष्ठविम्ब चंद्रबिम्व लटक गया
अस्ताचल-भाल में ।'
ततो राजा सर्वानपि संमानितवान् । तत्र कालिदासं विशेषतः
'पूजितवान् ।
तव राजा ने सव कवियों का संमान किया और कालिदास की विशेष
आराधना की।

(३४) रोगीशना

 अथ कदाचिद्धोजो नगराबहिर्निर्गतो नूतनेन तटाकाम्भसा बाल्यः साधितकपालशोधनादि चकार । तन्मलेन कश्चन शफरशावः कपाल प्रविष्टो विकटकरोटिकानिकटवटितो विनिर्गतः। ततोराजा स्वपुरीभवाप। -तदारभ्य राज्ञः कपाले वेदना जाता।