पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७४

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 रखवाला बोला-'महाराज, इस चोर ने एक वेश्या के घर में सेंध के रास्ते से द्रव्य चुराये हैं ।' तो राजा ने कहा--'इसे दंड दो।'

ततो भुक्कुण्डो नाम चौरः प्राह-
'भट्टिनष्टो भारवीयोऽपि नष्टो भिक्षुर्नष्टो भीमसेनोऽपि नष्टः ।
भुक्कुण्डोऽहं भूपतिस्त्वं हि राजन्भन्मापङ्क्तावन्तकः संनिविष्टः।३१८॥

तो भुक्कुंड नाम का चोर वोला--

नष्ट हुआ भट्टि, भारवीय भी विनष्ट .
हुआ नष्ट, भीमसेन भी विनष्ट है,
मुक्कंड मैं हूँ और तू है भपति भोज
'भा-मा' की पंक्ति में यमराज संनिविष्ट है ।

 तदा राजा प्राह--'भो भुक्कुराड, गच्छ गच्छ यथेच्छ विहर।' तो राजा ने कहा--अरे भुक्कुंड, जा भाग, यथेच्छया विहार करता रह।'

(३३ ) कविसत्कार

 कदाचिद्भोजो मृगयापर्याकुलो बने विचरन्विश्रमाविष्टहृदयः कञ्चित्तटाकमासाद्य स्थितवान्श्रमाप्रसप्तः । ततोऽपरपयोनिधिकुहर

गते भास्करे-
तत्रैवारोचत निशा तस्य राज्ञः सुखप्रदा।
चञ्चञ्चन्द्र करानन्द संदोहपरिकन्दला ॥३१६ ।।

 कभी मृगया में व्यस्त भोज वन मे विचरण करते हुए विश्राम करने की इच्छा से किसी तालाव पर पहुंच जा बैठा और श्रम के कारण सो गया। तव सूर्य के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर वहीं चमकते चंद्रमा की किरणों के आनंद से परिपूर्ण सुखदा यिनी रात राजा को अच्छी लगी।

 ततः प्रत्यूषसमये नगरी प्रति प्रस्थितो राजा चरसगिरिनितम्ब- लम्बमानशशाङ्कविम्बमवलोक्य सकुतूहल: सभामागत्य तदा समीप-, स्थान्कवोन्द्रान्निरीक्ष्य समस्यामेकासवदत--'चरमगिरिनितम्वे चन्द्रविन्द ललम्बे।'