पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७६

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति
१७३
भोजप्रवन्धः


 एक वार भोज नगर से वाहर निकला और नये तालाव के पानी से बचपन से सिद्ध कपाल-शुद्धि आदि की क्रिया की। ताल के नीचे से एक मछली का बच्चा राजा के कपाल में घुस गया और टेढ़ी नस के निकट कृमि छोड़कर बाहर निकल गया। फिर राजा अपनी पुरी में आगया । तब से राजा के कपाल में पीडा होने लगी।

ततस्तत्रत्यभिषग्धः सम्यक्चिकित्सितापि न शान्ता । एवमहनिशं.

नितरामस्वस्थे राज्यमानुषविदितेन महारोगेण ।
क्षामं क्षाममभूद्वपुर्गतसुखं हेमन्तकालेऽब्जद- .
द्वक्त्रं निर्गतकान्ति राहुबदनाक्रान्ताजविम्बोपमम् ।
चेतः कार्यपदेषु तस्य चिमुखं क्लीवस्य नारीनिव
व्याधिः पूर्णतरो बभूव विपिने शुप्के शिखाबानिय ॥३२१॥

 वह पीडा वहाँ के अच्छे चिकित्सकों के द्वारा भली भांति चिकित्सा करने पर भी दूर न हुई। इस प्रकार मनुष्यों को अज्ञात महारोग से राजा के दिन रात निरंतर अस्वस्थ रहने पर-

 सुख-चैन न मिलने से राजा का शरीर अत्यंत क्षीण और मुख हेमंत ऋतु में कमल के समान अभद्र, कांतिहीन, राहु के मुख में पड़े चंद्रविम्ब के सदृश हो गया । जैसे नपुसक स्त्रियों से विमुख रहता है, वैसे ही उसका चित्त राज- काज से विमुख रहने लगा और जैसे सूखे जंगल में आग फैल जाती है, वैसे ही रोग पूरी तरह फैल गया।

 एकमतीते संवत्सरेऽपि काले न केनापि निवारितस्तद्गदः । ततः. श्रीभोजो नानाविधसमानौषधग्रसनरोगदुःखितमनाः समीपस्थं शोक- सागरनिमग्नं बुद्धिसागरं कथमपि संयुताक्षरामुवाच वायम्'बुद्धिसा- गर, इतः परमस्मद्विषये न कोऽपि भिषग्वरो वसतिमातनोतु । बाह्वटादि- भेपजकोशालिखिलान्स्रोतसि निरस्यागच्छ,। मम देवसमागमसमयः समागतः, इति । तच्छुत्वा सर्वेऽपि पौरजनाः कवयवावरोधसमाजश्व विगलदस्त्रासारनयना बभूवु।

 इस प्रकार एक वर्ष का समय बीत जाने पर भी किसी से, उसका रोग दूर न हुआ । तव अनेक प्रकार की एक जैसी औपधों के सेवन और रोग से