पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७७

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भोजप्रबन्धः


 दुःखी मनवाले श्री भोज ने निकट बैठे शोक के समुद्र में डूबे बुद्धिसागर से किसी प्रकार भरे स्वर में कहा-'बुद्धिसागर, अब के बाद कोई चिकित्सक हमारे राज्य में न रहे । बाह्वट आदि के रचे सब ओषधि कोप ग्रन्थों को नदी में वहा आओ। मेरा देवों से समागम का समय ( मृत्युकाल ) आ गया। यह सुनकर सभी नगरवासी, कवि और अंतःपुर के निवासी जन आँखों से आँसुओं की धाराएँ वहाने लगे ।

 ततः कदाचिदेवसभायां पुरन्दरः सकलमुनिवृन्दमध्यस्थं वीणामुनि- माह-'मुने' इदानीं भूलोके का नाम वार्ता' इति । ततो नारदः प्राह - 'सुरनाथ, न किमप्याश्चर्यम् । किंतु धारानगरवासी श्रीभोजभपालो रोगपीडितो नितनामस्वस्थो वर्तते । स तस्य रोग: केनापि न निवारितः। तदनेन भोजनृपालेन भिषग्दरा अपि स्वदेशान्निष्कासिताः। वैद्यशास्त्र- मप्यनृतमिति निरस्तम्' इति ।

 तव फिर कभी देव समा में सब मुनियों की मंडली के मध्य में स्थित वीणाधारी मुनि नारद से इंद्र ने कहा-'हे मुनि, आजकल भूलोक का क्या समाचार है ?' तो नारद ने कहा-'देवराज, कोई विचित्र बात नहीं है, किंतु धारा नगर का निवासी श्रीभोज राजा रोग से पीडित अत्यंत अस्वस्थ है । उसका रोग किसी से दूर नहीं हो पाया । सो उन भोज नरपाल ने अच्छे- अच्छे चिकित्सक भी अपने देश से निकाल दिये हैं। वैद्य शास्त्र भी झूठा है, सो प्रसिद्ध कर दिया है।

 एतदाकण्ये पुरुहूतः समीपस्थौ नासत्याविदमाह-भोः स्ववैद्यौ, कथमनृतं धन्वन्तरीयं शास्त्रम् । तदा तावाहतुः - 'अमरेश देव, न व्यलीकमिदं शालाम् । किंत्वमरविदितेन योगेणं बाध्यतेऽसौ भोजः' इति । इन्द्रः--'कोऽसायवार्यरोगः किं भवतोर्विदितः । ततस्तावूचतुः--'देव' कपालशोधनं कृतं भोजेन, तदा प्रविष्टः पाठीनः। तन्मूलोऽयं रोगः' इति । तदेन्द्रः स्मयमानमुखः प्राह--'तदिदानीमेव युवाभ्यां गन्तव्यम् । न चेदितःपरं भलोके भिषक्शास्त्रस्यासिद्धिर्भवेत् । स खलु सरस्वतीविलासस्य निकेतनं शास्त्राणामुद्धर्ता च' इति ।