पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१७८

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति
२७५
भोजप्रबन्धः


 यह सुनकर इंदने निकट स्थित अश्विनी कुमारों से कहा-'हे स्वर्ग के

वैद्यों क्या धन्वंतरि का शास्त्र ( आयुर्वेद ) असत्य है ?' तो वे बोले-~है दवराज महाराज, यह शास्त्र झूठा नहीं है, किंतु भोज ऐसे रोग से ग्रस्त है, जिसका ज्ञान देवों को ही है।' इंद्र ने कहा-'यह कौन-सा असाध्य रोग है, क्या आप दोनों को ज्ञात है ?' तो उन दोनों ने कहा-~'देव भोज ने कपाल- शोचन किया था, तभी एक मछली का बच्चा घुस गया. इस रोग की जड़ में वही है। तो मुस्कराते हुए इंद्र ने कहा तो आप दोस्रो लक्ष्मी जीयो, नहीं तो अब से भूलोक में भिषक-शास्त्र मिथ्यता सिद्ध हो जायेगी राजा भोज सरस्वती की विलासलीला का निकेतन और शास्त्रों का उहा कर्ता है।

 ततः सुरेन्द्रादेशेन तावुभावपि तद्विजन्मवेपौ धातनगर, प्राप्य

द्वारस्थ पाहतुः -- 'हारस्थ, आवां सिंघजी काशीदेशादागतौ । श्रीभोजाय विज्ञापय । तेनानृतमित्यङ्गीकृतं वैद्यमितिः शुत्वा तत्प्रतिष्ठापनाय तद्रोगनिवारणाय च' इति । ततो हारस्थ: प्राह-~'भो विप्रो, न कोऽपि भिषवप्रवरः प्रवेष्टव्य इति राज्ञोक्तम् । राजा तु केवलमस्वस्थः । नायम- इसरो विज्ञापनस्य' इति । तस्मिन्क्षणे कार्यवशाद्वहिनिगतो बुद्धिसाग- रस्तौ दृष्ट्वा 'कौ भवन्तौ' इत्यच्छत् । ततस्तौ यथागतमूचतुः । ततो बुद्धिसागरेण तौ राज्ञः समीपं नीती।

 तो सुरराज के मादेश से वे दोनों ब्राह्मण का वेप-धारण करके धारानगरी

पहुँच कर द्वारपाल से बोले-'हे द्वारपाल, हमदोनों काशी देश से आये वैद्य हैं । श्री भोज को सूचना दो । उन्होंने यह मान लिया है कि वैद्यशास्त्र मिथ्या है। हम यह सुनकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा करने और उनका रोग दूर करने आये हैं। तो द्वारपाल वोला-'ब्राह्मणो, राजा ने कहा है कि किसी वैद्यवर को भीतर मत भेजो । राजा तो बस अस्वस्य हैं, सूचना देने का यह अवसर नहीं है।' उसी क्षण किसी कार्य के वश बाहर आये बुद्धिसागर ने उन्हें देखकर पूछा-'आप दोनों कौन हैं ?' तो उन्होंने जैसा पहिले कहा था, बता दिया । तो बुद्धिसागर उन दोनों को राजा के पास ले गया।

 ततो राजा ताववलोक्य मुखनियाऽमानुषाविति बुद्ध्या 'आभ्यां

शक्यतेऽयं रोगो निवारयितुम्' इति निश्चित्य तो वहु मानितवान् ।