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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/७७

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प्रकरण १ श्लो० ३४

लब्ध होती है । भाव यह है कि आत्मा अर्थात् बुद्धि का परमात्मा में सुषुप्ति में लय होता है ऐसा श्रुति कथन है । इन सब हेतुओं से प्राण भी घटादि की तरह अनात्मा ही है । वैसे ही ( एतस्मिन्) इस प्राण के ( संचरति अपि अहं अचलः ) चलायमान होने पर भी मैं स्थिर हूँ ( इति प्रत्ययात् ) इस प्रतीति से भी प्राण अनात्मा है । (स्वोत्क्रांतये) आत्मा । शरीर से अपने निर्गमन के लिये (अस्य) इस वायु के विकार रूप प्राण का ( स्रष्टा ) उत्पादक है तथा ( श्रमरणम् ) मरण पर्यन्त अर्थात शरीर से प्रारणों के वियोग पर्यन्त ( स्य धृतेः ) इस प्राण के धारण से ( जीवशब्दाभिधेय ) आत्मा जीव शब्द का वाच्य होता है अर्थात् जीव शब्द से कहा जाता है । इन उक्त हेतु से आत्मा ( तस्मादन्योऽस्ति ) उस प्रारण से भिन्न है । अर्थ यह है कि जैसे स्थादिक पुरुषकी देशांतर गतिके साधन होने से पुरुष हैं, तैसे ही प्रारण भी श्रात्मा की देशांतर गति के साधन होने से अनात्मा ही हैं । और जैसे रथ के उत्पन्न करने वाला और रक्षा करने वाला पुरुष रथ से भिन्न ही है, तैसे आत्मा भी प्राण का उत्पादक तथा रक्षक होने से प्राण से भिन्न ही है । ( स्वनिलयम् ) घोंसले रूप शरीर की ( अमुना ) इस प्राण द्वारा ( रक्षन् ) पालन करता हुआ ( दीप्तिमान् ) स्वप्रकाश स्वरूप ( एकहंसः ) एक ही आत्मा तीनों अवस्था में विचरता है । इससे भी आत्मा प्राणों से पृथक है । अर्थ यह है कि प्राण जड़ होने से घट के समान तथा करण होने से रथ के समान अनात्मा है ॥३४॥
 अब मन आत्मा है इस मत का निराकरण करते हैं-
उभ्दूतेः साधनत्वादशनमयतया शुद्ध्यशुद्धि प्रती-