प्राणो नात्मा जडत्वादशनसिततया वृत्ति लाभात्सुषुप्तावेतस्मिन् संचरत्यप्यहमचल इति प्रत्ययादम्यत्वात् ।
खष्टा स्वोत्क्रान्तयेस्या मरणमपि धृतेर्जीवशब्दाभिधेयस्तस्मादन्योऽस्ति रचन् स्वनिलयममुना दीप्तिमानेक हंसः ॥३४॥
खान पान से बंधे हुए अर्थात् स्थिति पाने वाले
जड़ तथा जलमय होने से प्राण आत्मा नहीं है । सुषुप्ति में
उसकी अधिक प्रवृत्ति होती है । उसे चलते हुए भी मैं
स्थिर हूं ऐसा भान होता है। यह शरीर से जाते हुए वायु
के विकार रूप प्राण उसके उत्पादक है और मरण पर्यन्त
इस प्राण को धारण करने से खात्मा जीव कहलाता है ।
इसलिये आत्मा से यह भिन्न है । शरीर रूप घोंसले को
प्राण से पालन करने वाला स्वप्रकाश रूप अद्वैत आत्मा
इससे भिन्न है ॥३४॥
( प्राणः श्रात्मा न ) प्राण भी आत्मा नहीं है, क्योंकि
( जड़त्वात् ) घटाटिको की तरह प्राण भी जड़ है ( अशनसित
तया ) अन्न का भक्षण करने से प्राण बद्ध है अर्थात् प्रारण को
स्थिति अन्न के अधीन है तथा ( अम्मयत्वात् ) प्राण को वेद
में पोमय लिखा है, इसलिये प्राण जल के अधीन है, तथा
( सुषुप्तौ वृत्तिलाभात् ) सुषुप्ति में प्राणों की अधिक प्रवृत्ति उप-
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