होगा । यही न्याय प्रमातादिकों में भी जान लेना । (अथ ) उक्त दोष से अनंत और दोष सुनो, ( बंध मोक्षा व्यवस्था ) उक्त प्रकार सर्वत्र प्राप्त होने से बंध मोक्ष की भी व्यवस्था नहीं होगी अर्थात् बंध मोक्ष को भी संशय रूपता ही होगी। (ततः) इसलिये ( हे गतक्सन ) हे दिगंबर, अर्थात् लोक परलोक के व्यवहार निश्चयरूप वस्त्रों से रहित नाम मात्रके हे अवधूत(सर्वा-नेकान्तवादः मत्तप्रलापः भाति) यह तेरा सर्वानेकान्त बाद निरर्थक प्रलाप अर्थात् अनुपादेय प्रतीत होता है॥२७॥
अब हिरण्यगर्भ के उपासकों का मत श्रुति प्रतिपादित है इस भ्रम को दूर करके उस मत का खंडन करते हैं-
एवं हैरण्यगर्भायुदितमपि जगत्कारणं नाद-
राह यस्मात् कस्य प्रसूतिः श्रुतिभिरधिगता
क्लृप्तमायुर्मितं च । अस्य ज्ञानादियोगं गमयति
च यतो ब्रह्मतो ब्रह्मबाणी तस्माद ब्रह्मैव माया-
शबलितमुचितं श्रौतकं निदानम् ॥२८॥
हिरण्यगर्भ के उपासकों का हिरण्यगर्भ जगत् का कारण है, यह मत आदर के योग्य नहीं है,क्योंकि वेद वचनों से ब्रह्मा की उत्पत्ति कही है उसकी आयु का तथा श्रायुमान का भी कथन है। वेदवचन से हिरण्यगर्भ का ज्ञान आदि का योग ईश्वर से है, ऐसा कहा है । इससे वेदगम्य एक माया शक्ल ब्रह्म ही जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है यह मानना उचित है ॥२८॥