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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/५७

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प्रकरण १ श्लो० २६

प्रसिद्ध अर्थ को नहीं माप्त होगा अर्थात् तुम्हारे मत में 'बहिर' इस पद को निरालम्बता ही प्राप्त होगी । दूसरे तुम्हारे मत में ( विज्ञान भेदाः) ज्ञानों के भेद और ज्ञानों की विलक्षणता आदिक (कथं वेद्याः ) कैसे जाने जायेंगे ? क्योंकि ज्ञान तुम्हारे मत में क्षणिक है और स्थायि ज्ञानान्तर का तुम्हारे मत में अभाव है । (अथ ) ज्ञान रूप ही अखिल पदार्थ हैं इसके अंगीकार के अनन्तर भी ( विविधा बासना वा कुतः ) नाना प्रकार की वास- नायें भी किस कारण से ( स्युः ) होंगी ? यहां ज्ञानों को हेतु मानोगे तो अन्योन्याश्रय आदि दोष प्राप्त होंगे और बाह्य पदार्थ कोई तुम्हारे मत में हैं ही नहीं, जिसको तुम उक्त दोष की निवृत्ति के अर्थ वहां कारण रूप मान लोगे।(क्षणिक चिति ) क्षणिक विज्ञान में ( प्रागुक्त दोषाः ) पूर्व श्लोक में कहे हुए दोष अर्थात् क्षणिक पदार्थों को कारणत्व आदि नहीं बन सकता इत्यादिक दोप ( स्युः ) होंगे । ( तेन ) इसलिये क्षणिक विज्ञान वाद ( हतः ) विनष्ट हुआ ॥२५॥

 अब अभाव से वा शून्य से ही जगत उत्पन्न होता है, इस मत का खंडन करते हैं-

नाभावाद्भाव जन्म क्वचिदपि कलितं निर्वि शेषाद्विचित्रं न स्यात् तेनानुविद्धे ह्यसदस- दिति च प्रत्ययः स्यादशेषे । केनाभाव प्रथा ते किमिति न सकलं सर्वतः स्वादभीष्टं सर्वेषां स्यादयत्नं किमिति जड भवानात्मघाते प्रवृत्तः ॥२६॥
 ४ स्वा. सि.