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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/११

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प्रकरण १ श्लो० १

॥ अध्यारोपाख्यं प्रथमं प्रकरणम् ॥

 निष्किंचन विरक्त जिज्ञासु जनों के लिये इस स्वाराज्य सिद्धि ग्रंथ की रचना हुई है । स्वाराज्य पद का अर्थ चक्रवर्तित्व है । इस चक्र वर्तित्व रूप स्वतंत्र पद की प्राप्ति के लिये, ग्रन्थ की देश देशान्तरों में प्रवृत्ति के लिये और आगे शिष्य पर शिष्य शिक्षा के लिये ग्रंथकर्ता आशीर्वाद रूप मंगल को करता है ।

मंगलाचरणम्।
मन्दाक्रान्ता छन्द।

गंगा पूर प्रचलित जटास्रस्त भोगीन्द्र भीता- मालिंगन्तीमचलतनयां सस्मितं वीचमाणः । लीलापांगैः प्रणत जनतां नंदयंश्चन्द्रमौलि मोहध्वांतं हरतु परमानंदमूर्तिः शिवो नः ॥१॥
 श्रीगंगा के प्रवाह से कंपित जटा में से नीचे गिरे हुए सर्पराज से भयभीत होकर, आलिंगन करती हुई तथा प्रणाम करने वाले को स्वाभाविक कृपाकटाच से प्रसन्न करने वाली पार्वती को मंद हास्यपूर्वक देखने वाले, जिनके मस्तक में चन्द्र है तथा जो परमानन्द स्वरूप हैं वह शिव हमलोगों के अज्ञान अंधकार को दूर करें ॥ १ ॥

सरलान्वय पद्य काशिका भाषा टीका ।..

 ( शिवः ) महादेव (नः) हम लोगों के ( मोह ध्वान्तं ) अज्ञान रूप अंधकार को ( हरतु ) नाश करे । कैसा वह शिव