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पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/१२

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स्वाराज्य सिद्धि

है ? ( चन्द्रमौलि : ) चन्द्र है मस्तक में जिसके और परमार्थ से ( परमानंद मूर्तिः ) वह शिव निरतिशय आनंद स्वरूप परब्रह्म रूप है । पुनः वह शिव कैसा है ? ( अचल तनयां ) पर्वत. सुता पार्वती को ( सस्मितम् ) मंद मंद हास्य के सहित ( माण ) देखता है । कैसी वह पार्वती है ? ( गंगा पूरेण ) श्रीगंगा के प्रवाह से ( प्रचलित जटाभ्यः ) अत्यन्त कंपित जटाओं से ( स्त्रस्तः ) नीचे को गिरा हुआ जो (भोगींद्रः ) शेष है अर्थात् सर्पराज है, उस सर्पराज से ( भीताम् ) चकित हुई ( लिंगतीम् ) शिव के अंक में, गोद में निमज्जन करती हुई, तथा (प्रणतजनताम् ) प्रणामों से अति नम्र हुए मुमुक्षु जन समूह को ( लीलापांगैः ) स्वाभाविक प्रीति जन्य कटाक्षों से (नन्दयन् ) प्रसन्न करती हुई; ऐसी पार्वती को देखता हुआ, शिव हम लोगों के अज्ञान के अन्धकार को हरे ॥ १ ॥
 मल विक्षेप दोष रहित विवेक वैराग्यादि सर्व साधन संपन्न अधिकारी को मूल सहित अनर्थ की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति श्रीसत् गुरुओं की कृपा से होती है इस अर्थ को क्रम सूचन करते हुए आशीर्वाद रूप मंगल के अनन्तर अब नम्र- स्कार रूप मंगलाचरण को रचते हैं-
स्मारं स्मारं जनिमृतिभयं जातनिर्वेद वृत्ति- ययं ध्यायं पशुपतिमुमाकान्तसंतर्निषण्णम् । पायं पायं सपदि परमान्द पीयूषधारां भूयोभूयी निजगुरुपदाम्भोज युग्मं नमामि ॥२॥
 जन्म मरण के भय को बारंबार याद करके उत्पन्न हुई वैराग्यवृत्ति से हृदय में रहे हुए उमाकान्त पशुपति का