पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१६८

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भोजप्रबन्धः


 ततः कविराह-

'अम्वा कुप्यति न मया न स्नुषया सापि नाम्बया न मया।
अहमपि न तया न तया वद राजन्कस्य दोषोऽयम् ॥३०६।।

 इति । राजा च दारिद्रयदोषं ज्ञात्वा कविं पूर्णमनोरथं चक्र ।

 तव कवि ने कहा-

 माँ क्रोध करती है, पर न मुझ पर न अपनी पतोहू ( मेरी पत्नी) पर; और वह ( मेरी पत्नी ) भी न माँ पर क्रोध करती है, न मुझ पर; और मैं न माँ पर क्रोध करता हूँ, न पत्नी पर; तो हे राजा, आप ही कहो कि यह दोष किसका है ?

 और राजा ने दरिद्रता का दोष समझा और कवि का मनोरथ पूर्ण कर दिया।

( २६ ) राज्ञः सर्वस्वदानम्

 एकदा द्वारपाल आगत्य राजानं प्राह-'देव, कविशेखरो नाम महाकवि-रि वर्तते । राजा-'प्रवेशय' इत्याह ।।

 एक बार द्वारपाल आकर राजा से बोला-'महाराज, कवि शेखर नाम का महाकवि द्वार पर उपस्थित है ।' राजा ने कहा--प्रविष्ट कराओ।'

ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा पठति-
 'राजन्दौवारिकादेव प्राप्तमानस्मि वारणम ।
मदवारणमिच्छामि त्वत्तोऽहं जगतीपते' 11 ३५० ॥

 तव कवि ने आकर स्वस्ति' कहा और पढ़ा-

 हे राजा, वारण (वाधा) मुझे द्वारपाल से ही प्राप्त हो चुका है; हे जगत् के स्वामी, मैं तुम से मद युक्त वारण ( हाथी ) चाहता हूँ।

 तदा प्राङ्मुखस्तिष्ठराजांतिसन्तुष्टस्तं प्राग्देशं सर्व कवये दत्तं मत्या दक्षिणाभिमुखोऽभूत् । ततः कविश्चिन्तयति--'किमिदम् । राजा मुखं परावृत्य मां न पश्यति' इति ।