पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/१६९

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भोजप्रबन्धः


 उस समय पूर्व की ओर ( कवि की ओर ) मुख करके बैठे राजा ने अत्यंत संतुष्ट हो 'पूर्व का संपूर्ण देश मैंने कवि को दे दिया'-यह मान लिया और दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ गया । तो कवि ने सोचा--'यह क्या है कि राजा मुँह फेर कर बैठ गया और मेरी ओर देखता भी नहीं ?'

 ततो दक्षिणदेशे समागत्याभिमुखः कविः पठति-- . . .

'अपूर्वेयं धनुर्विद्या भवता शिक्षिता कथम् ।
मार्गणौधः समायाति गुणो याति दिगन्तरम् ॥ ३११ ॥

" ततोराजा दक्षिणदेशमपि मनसा कवये दत्त्वा स्वयं प्रत्यङ्मुखोऽभूत् ।

 तब दक्षिण की ओर आ राजा के संमुख हो कवि ने पढ़ा--आपने यह अनोखी धनुविद्या कहाँ से सीखी है कि वाण समूह तो आता है पर प्रत्यंचा (धनुष की डोरी ) दूसरी ओर चली जाती है, अर्थात् मार्गणोध ( याचक समूह ) के आते ही गुण ( कृपा ) दूसरी ओर हो जाती है।

 तो दक्षिण देश भी कवि को देने का मन में संकल्प कर राजा स्वयम् पश्चिम को मुख करके बैठ गया। ..

 कविस्तत्रागत्य प्राह---

'सर्वज्ञ इति लोकोऽयं भवन्तं भाषते मृपा।
पदमेकं न जानीषे वक्तुं नास्तीति याचके' ।। ३१२ ।।

ततो राजा तमपि देशं कवेर्दत्तं मत्योदङ्मुखोऽभूत् ।

 कवि उधर आकर बोला--

 आपको यह संसार व्यर्थ ही सर्वज्ञ कहता है; आप तो याचक से 'नहीं है' यह एक शब्द भी कहना नहीं जानते ।

 तो राजा ने दह ( पश्चिम ) देश भी कवि को देकर उत्तर की ओर मुख कर लिया।

कविस्तत्राप्यागत्य प्राह--

'सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं कथ्यसे बुधैः ।
 नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः ॥ ३६३ ।।

ततो राजा स्वां भूमि करिदत्तां मत्वोत्तिष्ठति स्म ।