पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/४९५

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१५८४ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्ते केन्द्रज्या =११४।४०।१०४।००ll८७l००।६५।४०।।४१००।१४।०० ।। केन्द्रकोटिज्या==३४।२०।६०००८८२००१००००।११३।००॥ ११८I४०॥ अन्त्यफलज्या =८६४१।८६।४१।।८६४१।।८६।४१८६।४१।८६४१।। स्पको =५२२१।२६।४१।।४।४१।१३१।।२६१८३१५ =७५४४६४४२।५२२७४०५१।२२३।२०६५ शोफज्या =७८८२८३६५।८६६५८४२५।।७२e५३४-७५॥ =४१°२२४४१.६२।४६°:४३॥४४.८३॥३७°.६२॥ ६११.८७। exशोफ =३७०६६।४०१.५८।।४१७८ell४०३°४७३३८५८॥ १५१५८३।। आचार्यपिण्डाः==५०१००|१५०१६६२४६॥२६०॥३३३।। मत्साधिताः =५०१००।१५०।१६६।२४६२९१३३४॥ आचार्यपिण्डाः=३७१I४००४१८४०८३४०॥१५०l०।। भत्साधिताः =३७१४०२४१८४०४॥३३६१२० यथा महदन्तरं न भवेत्तथाऽऽदर्शायें मया शोधिते षष्ठपिण्डखुटिश्च पूर्ण कृतेति ।५३-५४॥ अब शुक्रपिण्ड को कहते हैं। हि- भा.यहां मूलोक्त शुक्र के क्रम से चतुर्दश (१४) पिण्ड इस प्रकार है । ५०१००।१५०।१६२४६२०३३३३७१।४००॥४१८।४०८।३४०।१५०१०।। यहां सबसे बड़ा पिण्ड=४१।

  • ?& =४६°२६°४०" = परमफल। इसकी ज्या (१२०) व्यासार्ध में ८६४१ ॥

अन्त्यफलज्या । उपपति । भौमपिण्ड साधन की तरह यहां— =२७४०।५३।४।।७७००॥&६००।११० ०००।११८००।। ११२० केन्द्र कोटिज्या =१६६२०।।१००००४२००७१२०४७।२०।२१।७०। ७००||