पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२८

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( १९ ) स्मृतियों में और युराणों में राहुकृत ग्रहण का प्रतिपादन विद्यमान है। अत: दोनों मतों का समन्वय करते हुए प्राचार्य ने कहा है राहुस्तच्छादयति प्रविशति यच्छुक्लपञ्चदश्यन्ते । भूछाया तमसीन्दोर्वरप्रदानात् कमलयोनेः । चन्द्रोऽम्बुमयोऽधःस्थो यदग्निमयभास्करस्य मासान्ते । छादयति शमिततापो राहुश्छादयति तत् सवितुः । सिद्धान्तशिरोमणि के गोलाध्याय में भी अधोलिखित भास्करोक्ति दिग्देशकालावरणादि भेदान्न छादको राहुरिति ब्रवन्ति । यन्मानिनः केवलगोलविद्यास्तत्संहिता वेदपुराणबाह्यम् । राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्क शशाङ्कगश्छादयतीव बिम्बम् । शम्भुवरप्रदानात् न् । से समन्वय किया गया है। सिद्धान्तशेखर में राहुकृत ग्रहण के खण्डनार्थ ‘राहुनिरा करणाध्याय' नाम का एक अध्याय रक्खा गया है । इसमें श्रीपति ने भी निम्नलिखित श्लोकों ने समन्वय क्रिया है विष्णुलूनशिरसः किल पङ्गोर्दत्तवान् वरमिमं परमेष्ठी । होमदानविधिना तवतृप्तिस्तिग्मशीतमहसोरुपरागे ।। भूमेश्छायां प्रविष्टः स्थगयति शशिनं शुक्लपक्षावसाने । राहुब्रह्मप्रसादात् समधिगतवरस्ततमो व्यासतुल्यः । ऊध्र्वस्थं भानुबिम्बं सलिलमयतनोरप्यधोवति बिम्बम् । संसृत्यैवं च मासव्युपरतिसमये स्वस्य साहित्यहेतोः ।। गोलबन्धाधिकार में मह दृवृत्तों (पूर्वापरवृत्त, याम्योत्तरवृत्त, क्षितिजवृत्त आदि) की रचना तथा लघुवृत्तों (मेषादिक द्वादश राशियों के अहोरात्रवृत्त) की रचना करके परमलम्वन-नति का स्वरूप प्रतिपादन कर प्राचार्य ने टङ्कर्म का प्रानयन किया गोलाध्याय है । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में प्राचार्य ने जैसे गोलबन्ध कहा है वैसे ही सिद्धान्त शेखर में श्रीपति और सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में भास्कराचार्य ने कहा है । ग्रहगोल और नक्षत्रगील में पांच स्थिरवृत्त (पूर्वोपरवृत्त, क्षितिजवृत्त, याम्योत्तरवृत्त,उन्मण्डल, विषुवद्वृत्त) कहे हैं। ये सब कक्षा मण्डल के बराबर हैं । तथा ग्रहों के चलवृत्त मन्दनीचोच्छवृत्त-=७, भौमादि ग्रहों के शीघ्र नीचोच्चवृत्त=५ । मन्दप्रतिवृत्त =७ , शीघ्रप्रतिवृत्त=५ । सात ग्रहों के दृग्मण्डल दृकक्षेप