पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२७

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त्रिज्याभक्तः परिधिः कर्णगुणो बाहुकोटिगुणकारः । असकृन्मान्दे तत्फलमाद्यसमं नात्र करणोंऽस्मात् ।। सिद्धान्त शेखर में ( १८ ) त्रिज्याहृतः श्रुतिगुणः परिधिर्यतो दोः कोटयोगुणीमृदुफलानयनेऽसकृत्स्यात् । स्यान्मन्दमाद्यसममेव फलं ततश्च कर्णः कृतो न मृदुकर्मणि तन्त्रकारैः ।। यह श्रीपत्युक्त श्लोक आचार्योक्त श्लोक का ही अनुवाद है । भास्कराचार्य ने भी स्वल्पान्तरत्वान्मृदुकर्मणीह कर्णः कृतो नेति वदन्ति केचित् । त्रिज्योद्धृतः कर्णगुणः कृतेऽपि करणे स्फुटः स्यात्परिधिर्यतोऽत्र । तेनाद्यतुल्यं फलमेति तस्मात् कर्णः कृतो नेति च केचिदूचुः । नाशङ्कनीयं न चले किमित्थं यतो विचित्रा फल वासनाऽत्र । यहाँ कर्ण से जो फल आता है वही समीचीन है । मन्द कर्म में स्वल्पान्तर से करण नुपात नहीं किया गया है, यह कहते हैं मन्दकर्म में मन्दकर्ण तुल्य व्यासार्ध से जो वृत्त होता वह कक्षावृत्त है। जो पाठ पठित मन्द परिधि है वह त्रिज्या परिणत है। अत: उसको कर्ण व्यासार्ध में परिणामन करते हैं, यदि त्रिज्यावृत्त में यह पाठ पठित परिधि पाते हैं, तो कर्णवृत्त में क्या इससे स्फुट परिधि होती है। ‘तत्र स्वेनाहते परिधिना भुजकोटिजीवे' इत्यादि से जो फल होता है उसको त्रिज्या से गुणा कर कर्ण से भाग देने जो उपलब्ध होता है तो वह पूर्व फल के तुल्य ही होता है। यह आचार्य ब्रह्मगुप्त का मत है । यदि इस कणनुपात से परिधि की स्फुटता होती है तो शीघ्रकर्म में क्यों नहीं किया जाता है ? यहाँ चतुर्वेदाचार्य कहते हैं कि ब्रह्मगुप्त ने औरों को ठगने के लिग ऐसा कहा है, परन्तु यह ठीक नहीं है। शीन्नकर्म में क्यों नहीं किया जाता, यह आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल की उपपत्ति विचित्र है । छादक का निर्णय करके राहुकृत ग्रहण नहीं होता हैं । यह आचार्य ने प्रथम वराह मिहिरादिकों के मत का प्रतिपादन किया फिर संहितामत ग्रहणवासना का अवलम्बन कर, उस (वराहमिहिरादिक) मत का निराकरण किया है । राहुकृतं ग्रहणद्वयमागोपालाङ्गनादिसिद्धमिदम् । बहुफलमिदमपि सिद्धं जपहोमस्नानफलमत्र । इसे लोक प्रथा बताकर राहुकृत ग्रहण के समर्थन में आचार्य ने वेद और स्मृति के बाक्यों का उल्लेख किया है । युक्ति से राहुकृत ग्रहण सिद्ध नहीं होता है, परन्तु वेदों में,