पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२६

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अध्याय के बहुत से विषय सूर्यासिद्धान्त के गोलाध्याय में वणित विषयों के सदृश ही हैं। बीच बीच में दोनों ब्राह्मस्फुटीय गोल अध्याय तथा सूर्य सिद्धान्तीय भूगोलाध्याय में कुछ विषायान्तर भी है। सिद्धान्त शेखर के गोलाघ्याम में श्रीपति ने भी कितने ही विषय आचार्योक्त विषयों के सदृश ही कहे हैं। ‘यन्मूलं तद्व्यासो मण्डललिताकृतेर्दशहृतायाः द्वारा श्रीपति ने भी ‘व्यासः स्यात् परिधेर्वर्गाद् दिग्भक्ताच्च पदंत्विह प्रकार के अनुकूल ३४१५ त्रिज्या स्वीकार की है । भास्कराचार्य ने ‘व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्त खवा सूर्यः” के द्वारा परिध्यानयन का विस्तार से प्रतिपादन किया है। इसके विलोम द्वारा परिधि से व्यासानयन होता है। परन्तु व्यास से परिध्यानयन या परिधि से व्यासानयन किसी का भी ठीक नहीं है। क्योंकि व्यास और परिधि का सम्बन्ध स्थिर नहीं है । ज्या प्रकरण में जैसे चापार्धांशज्या आदि का आनयन आचार्य ने किया है वैसे ही सिद्धान्त शेखर में और सिद्धान्त शिरोमणि के गोलाध्याय में किया गया है। ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त में चापार्धांशज्यानयनप्रकार ( १७ ) सिद्धान्तशेखर में तुल्यक्रमोत्क्रमज्यासमखण्डक वर्ग युति चतुर्भागम् । व्यासार्धवर्गतस्तत्पदे प्रथमम् ।। तद्दलखण्डानि तदूनजिनसमानि द्वितीयमुत्पत्तौ । कृतयमलैक दिगीशेषु सप्तरसगुणनवादीनाम् । उत्क्रमक्रमसमानसमज्या खण्डवर्गयुतिवेदविभागम् । व्यासखण्डकृतितस्तमनष्टं शोधयेदथ पदे भवतो ये ।। सिद्धान्तशिरोमणि में श्राद्यमूलमिह तद्दलसंख्यं तद्विहीन जिनसम्मितमन्यत् । ज्यार्धमेवमपराणि समेभ्यो ज्यादलानि न भवन्त्यसमेम्यः ॥ क्रमोत्क्रमज्या कृतियोगमूलाद्दलं तदर्धाशकशिञ्जिनी स्यात् । इस प्रकार प्रकारान्तर से भी चापाधfज्यानयन प्रकार तीनों ग्रन्थों (ब्राह्मस्फुट तसिद्धान्त-सिद्धान्तशेखर-सिद्धान्तशिरोमणि ) में समान ही है। भास्करीय अन्त्यज्योत्पत्ति में अनेक विषयों का विशिष्ट प्रतिपादन देखने में प्राता है । मन्द फल साधन में भी कणनुपात से जो फल होता है वही स्फुटगतिवासना समीचीन होता है, तब कर्णानुपात न करने का कारण क्या है ? यह बात अधोलिखित उक्ति से प्रकट होती है