पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/२३४

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                गोलाध्यायः

से वेष्टित (धिराहुआ) नक्षत्र कक्षा के मध्य में यह भूगोल है, जो प्राणियों के शुभ-अशुभ कर्मो से प्राप्त होता है। चन्द्र बुध शुक्रादिग्रह कक्षावृत्तों की क्यों इस तरह उपर्युपरिस्थिति है इस की युक्ति के लिये मध्यगति अध्याय में लिखित उपपत्ति अथवा बटेश्वर सिद्धान्त के मध्यमा धिकार में हमारी लिखी हुई टीका देखनी चाहिये । भूगोल के स्वरूप में बहुत मतान्तर है जैसे पौराणिक लोग देवता स्वरूप भगवती पृथ्वी को अयनक के तल सदृश कहते हैं, कोई कोई कछुए की पृष्ठ के सदृश पृथ्वी के स्वरूप कहते हैं, कोई कोई कमल के आकार के सदृश कहते हैं, हमारे ज्यौतिषिकों के मत से कदम्ब फल के सदृश है और जिस तरह कदम्ब फल में सर्वत्र केसर रहता है उसी तरह इस गोलाकार पृथ्वी के ऊपर सर्वत्र प्राणियों की स्थिति है यह विषय सिद्धान्तशेखर में ‘प्रादशदरसन्निभा भगवती विश्वम्भरा' इत्यादि विज्ञान भाष्य में लिखित श्लोक से श्रीपति ने कहा है, सिद्धान्तशिरोमणि में ‘सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्य चयैश्चित:’ इत्यादि श्लोक से भास्कराचार्य ने भी श्रीपति के कथनानुसार ही कहा है लेकिन नबीन लोग पृथ्वी का आकार दीर्घपिण्डाकार मानते हैं, इसके सम्बन्ध में वटेश्वर सिद्धान्त के मध्यमाधिकार में हमारी लिखी हुई टीका देखनी चाहिये ! ग्रह-नक्षत्र कक्षावृत्तों की स्थिति के सम्वन्ध में सिद्धान्तशेखर में , ‘विधुबुधसितसूर्यारेिज्यपातङ्गिकक्षा' इत्यादि से श्रीपति तथा सिद्धान्त शिरोमणि में ‘भूमेः पिण्डः शशाङ्कज्ञ कविरविकुजेज्याकिं नक्षत्रकक्षावृत्तै: इत्यादि से भास्कराचार्य ने भी अचार्योक्त के अनुरूप ही कहा है । सम्प्रति वेध से चन्द्र पृथ्वी के चारों तरफ भ्रमण करती है तथा सूर्य के चारों तरफ क्रम से बुध-शुक्र पृथ्वी-मङ्गल-गुरु-शनि और परिभ्रमण करते हैं यह सिद्ध होता है, इसलिये प्राचीनों नक्षत्र के ‘पृथ्वी स्थिर है उसके चारों तरफ ग्रह भ्रमण करते हैं। मत में बुध और शुक्र के कर्ण में बहुत अन्तर होता जो नहीं होना चाहिये । तथा उन (प्राचीनों) के मत में बुध और शुक्र का दृश्वाद्दश्यत्व नहीं घटता है । ग्रहों का ऊधधरत्व उन (ग्रहों) के बिम्बीय कर्णज्ञान से समझा जाता है । बिम्बीय कणों का आनयन प्रकार मैं पहले ही मध्यमाध्याय में लिख चुका हूँ। वह वहीं से समझना चाहिये; एवं रवि और ग्रह के बिम्बान्तर वेघ से रवि के चारों तरफ सवग्रह भ्रमण करते हैं यह इस समय नवीनों के मत से समझा जाता है इति ॥२॥

             इदानीं देवासुरसंस्थानमाह ।
       खे भूगोलस्तदुपरि मेरौ देवाः स्थितास्तले दैत्याः ।
               खे भगणाक्षाग्रस्थावुपर्यधश्च ध्रुवौ तेषाम् ॥३॥
 सु. भा-आकाशे भूगोलस्तदुपरि मेरुस्तत्र मेरावुपरि देवाः स्थिताः । तले

मेरुतले कुमेरौ दैत्याः स्थिताः । तेषां दैवदैत्यानां ख आकाशे भगणाक्षाग्रस्थौ भगणाक्षो ध्रुवयष्टिस्तदग्रस्थौ ध्रुवावुपर्यधश्च । देवानामुत्तरो ध्रुव उपरि दक्षि णोऽधो दैत्यानां दक्षिण उपरि उत्तरो ध्रुवश्चाध इति । ‘सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये' इत्यादि भास्करोक्तमेतदनुरूपमेव ॥३॥