पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१८५

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१२७६ ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते पुनरस्यतृतीयदृढकुदिनस्य च लघुतमापवर्त्यो गवेषणीयः। अग्रेऽप्येवमेव कर्म कार्यम्।अन्ते सर्वेषां दृढकुदिनानां यो लघुतमापवर्त्यस्तेनाहर्गणो युतस्तदा योगतुल्येऽहर्गणे पुनस्तान्येव शेषाणि स्युरिति ॥८९-९०॥

                अत्रोपपत्तिः।

यदि ग्रहाणां दृढकुदिनानि क,ख,ग,दृढभगणाः य,र,ल,कल्प्यन्ते,तथा दृढकुदिनानां लघुतमापवर्त्यश्च=प, तदा 'प+अहर्गण' ऽयमहर्गणो दृढभगणगुणो दृढकुदिनभक्तः प्रथमखण्डे निःशेषभगणाः समागच्छन्ति,प्रयोजनभावाते यदि न गृह्यन्ते तदोद्दिष्टादहर्गणाध्यद् भगणशेषं तदेवा 'प+अहर्गण'स्मादपि,द्वयोर्द्वयोदृढकुदिनसंज्ञयोर्महत्तमापवर्त्तनेन विभक्तयोर्ये लब्धी ताभ्यां परस्परं हारौ सङ्गुण्य लघुतमापवर्त्य एव सम्पादित आचार्येणेति॥८९-९०॥ अब उद्दिष्ट में अहर्गण दो ग्रहों के भगणादि शेष जो है वे ही पुनः किस अहर्गण में होंगे इस प्रश्न के उत्तर कोकहते हैं। हि.भा- जिस अहर्गण से दो ग्रहों के जो भगणादि शेष हैं उन दोनों के अपने अपने दृढ कुदिन को महत्तमापवर्तन से भाग देने से जो लब्धिद्वय होता है उन दोनों से विपरीत दोनों दृढकुदिन को गुणा करना चाहिए अर्थात् प्रथम दृढकुदिन संज्ञक को महत्तमाकवर्त्तन से भाग देने से जो लब्धि हो उससे दृढकुदिन को गुणना चाहिए और द्वितीय लब्धि से प्रथम दृढकुदिन को गुणा करना चाहिए,इस तरह करने से समच्छेद होता है। उस से युत पूर्व साधित अहर्गण से फिर दोनों ग्रहों के वे ही भगणादि शेष होते है अर्थात् उद्दिष्टाहर्गण में पूर्व साधित समच्छेद को जोडने से योग तुल्य अहर्गण में पुनः वे ही दोनों ग्रहों के भगणादि शेष होते हैं। इसी तरह तीन् आदि ग्रहों के इष्टदिन् में जो भगणादि शेष हों वे पुनः कब होंगे इस्का उत्तर पूर्ववत् करना चाहिए। दो ग्रहों के दृढकुदिन संज्ञकों से पूर्ववत् समच्छेद करके नये दृढकुदिन कल्पना करना फिर इसके और तृतीय दृढकुदिन के लघुतमापवर्त्य अन्वेषण (खोजना) करना चाहिए,एवं आगे भी क्रिया करनी चाहिए। अन्त में सब दृढकुदिनों के जो लघुतमापर्त्य हो उसके अहर्गण में जोड देना चाहिए तब योगतुल्य अहर्गण में पुनः वे ही शेष होंगे इति॥

                         उपपत्ति।

यदि ग्रहों के दृढकुदिन क,ख,ग, और दृढभागण य,र,ल कल्पना करते है तथा दृढकुदिन संज्ञकों के लघुतमापवर्त्य= प,तब प+अहर्गण को दृढभागण से गुणाकर दृढकुदिन से भाग देने से प्रथम खण्ड में निःशेष भगण लब्ध होता है, प्रयोजना भाव से यदि उसको छोड देंते हैं तब उद्दिष्ट अहर्गण से जो भगणादि शेष होता है वही प+अहर्गण,इससे भी,आचार्य ने यहां दो ग्रहों के दृढकुदिन को महत्तमपवर्त्तन से भाग देने से जो लब्धिद्वय