पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१२७

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१२१८    ब्राह्मस्फुटसिद्धान्ते
         श्रब  श्रनेक वरर्ग समीकरग को कहते हैं ।

    हि. भा.-प्रथम वरर्ग से श्रन्य जो वरर्ग है उनको इतर (दूसरे) पक्ष में से घटा कर शेष को प्रथम वरर्ग

गुरगक से भाग देने से प्रथम वरर्ग का भाना होता है । एक वरर्ग के श्रनेक माग रहने से दो दो पक्षों के समान हर कर के श्रसकृत् (बार बार) श्रन्व वरर्ग का मान साघन करना चाहिए । एक पक्ष के हर से दुसरे पक्ष के श्रंश श्रौर हर को गुरगा कर श्रौर छेदगम कर के 'श्राद्याद्वरर्गादन्यान्' इत्यादि श्राचार्योक्ति से श्रन्य वरर्ग का मान लाना चाहिये । एव श्रसकृत् कर्म करना चाहिये । श्रन्त में बहुत वरर्गो के श्रग्न्यात रहने से कुदृक होता है श्रर्थात् वहां हुद्दक से मान साधान किया जाता है ॥ सिद्धान्त शेखर में "श्राद्यं वरर्ग प्रोह्य पक्षात्कुतोsपि इत्यादि विग्न्यान भाष्य में लिखित श्रीपतिप्रकार श्राचार्योक्त प्रकार के श्रनुरूप ही है । तथा बीजगरिगत में "श्राद्यं वरर्ग शोधयेदन्यपक्षादन्यान् रूपाण्यन्यतश्चाद्यभक्त" इत्यादि विग्न्यान भाष्य में लिखित पद्यों से भास्कराचार्य ने श्राचार्योक्त प्रकार को वा श्रीपत्युक्त प्रकार को स्पष्टीकररगपूर्व क कहा हैं श्रौर व्याख्या की हैं इति ॥

  इदानीं प्रश्नानाह ।
                            
   गतभगरगयुताद् द्युगखात् तच्छेषयुतात् तदैक्यसंयुक्तात् ।
    तद्योगाद्र द्यु गरगं वा यः कथयति कुद्दकग्न्यः  सः ॥ ५२ ॥
         
    सु.भा.‌-श्रहर्गरगादिष्टग्रहस्य गतभगरगयुताद्योsहर्गरगं कथयति । वाsहर्गणात् तस्य गतभगरगस्य शेषयुताद्योsहर्गणं कथयति । वाsहर्गरगात् तयोर्गतभगरगभगरगशेषयोर्यदैक्यं तेन संयुक्ताद्योsहर्गणं कथयति । वा तयोर्गतभगरगभगरगशेषयोर्योगाद्योsहर्गरगं कथयति स एव कुद्दकग्न्य: ।
    प्रथमप्रश्नसsहर्गरगमानं या १ । भगरगशेषमानं का १
           
   ततो sनुपातेन गतभगरगाः = ग्रभ. या‌-का / ककु      
         
   गभ+या= या (ग्रभ+ककु)-का / ककु = यो ।
        
   ततः का= या (ग्रभ+ककु)-ककु. यो / १
   कुद्दकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् ।
   द्वितीय प्रश्नेsहर्गरगः = या १ । गतभगरगाः = का ।
   भगरगशेषस् = ग्रभ‌+या-ककु. का
   भशे+या=या (ग्रभ+१)-ककु.का=यो
   का = या (ग्रभ+१)-यो / ककु । श्रतः  कुद्दकेन यावत्तावन्मानं सुगमम् ।