पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/११

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सम्पूर्ण टीका उपलब्ध थी । इसी कारण उसके आधार पर इस ग्रन्थ के वारहवें (व्यक्त)
अध्याय और अठारहवें (अव्यक्तगणित) अध्याय का कोलब्रक महाशय कृत, आङ्गल भाषा
में अनुवाद सन् १८१७ (१७३९ शाकवर्ष) ई० में ही उपलब्ध हो गया था।

इस ग्रन्थ (ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त ) में १००८ श्लोक (आर्यावृत्त ) हैं ।
पूर्वार्ध और उत्तरार्ध नामक दो भागों में बंटा हुआ है । पूर्वार्ध में (१) मध्यगति
(२) स्फुटगति (३) त्रिप्रश्नाध्याय (४) चन्द्रग्रहणाध्याय
ग्रन्थ का विषय (५) सूर्यग्रहणाध्याय, (६) उदयास्तमयाध्याय, (७) चन्द्रशृगो
विभाजन न्नत्यध्याय, (८) चन्द्राच्छायाध्याय, ( ९ ) ग्रहयुत्यध्याय और
(११) भग्रहयुत्यध्याय, ये दस अध्याय हैं। उत्तरार्ध में (१) तन्त्र
परीक्षाध्याय, (२) गणिताध्याय, (३) मध्यमत्युत्तराध्याय, (४) स्फुटगत्युत्तराध्याय
(५) त्रिप्रश्नोत्तराध्याय, (६) ग्रहणोत्तराध्याय, (७) छेद्यकाध्याय, (८) श्रृंगोन्नत्युत्तरा
ध्याथ, (8) कुट्टाकाराध्याय, (१०) छन्दश्वित्युत्तराध्याय, (११) गोलाध्याय, (१२) यन्त्रा
ध्याय, (१३) मानाध्याय और (१४) संज्ञाध्याय । ये चौदह अध्याय हैं । दोनों पूर्वार्ध और
उत्तरार्ध को मिला कर १० + १४ इस ग्रन्थ में कुल चौबीस अध्याय हैं ।

इन अध्यायों में तन्त्रपरीक्षाध्याय बहुत बिचारणीय हैं क्योंकि इस अध्याय में आचार्य
ने और अनेक आचार्यो के नामों और उनके मतों का उल्लेख किया है ।

लाटात् सूर्यशशाङ्कौ मध्याविन्दू च चन्द्रपातौ च ।
कुजबुध शीघ्रबृहस्पतिसितशीघ्र शनैश्चरान् मध्यान् ।
युगपातवर्षभगणान् वासिष्ठाद्विजयनन्दिकृतपादात् ।
मन्दोच्चपरिधिपातस्पष्टीकरणाद्यमार्यभटात् ।।
श्रीषेणेन गृहीत्वा रक्षोच्चयरोमकः कृतः कन्था ।
एतानेव गृहीत्वा वासिष्ठो विष्णुचन्द्रण ।
अनयोर्न कदाचिदपि ग्रहणादिषु भवति दृष्टिगणितैक्यम् ।
यद्भवति तद्घुणाक्षरमतोऽस्फुटाभ्यां किमेताभ्याम् ।।

इन श्लोकों के द्वारा श्रीषेणाचार्यकृत ‘रोमकसिद्धान्त' है और विष्णुचन्द्रकृत
‘वासिष्ठसिद्धान्त ।' दोनों के दोष कहते हैं, यह टीकाकार चतुर्वेदाचार्य का कथन है ।
‘पञ्चसिद्धान्तिका' में श्रीषेण और विष्णुचन्द्र के नामों का उल्लेख नहीं है । इससे मालूम
होता है कि वराहमिहिराचार्य के बाद और ब्रह्मगुप्त से पूर्व ४२६ और ५५० शाकवर्षे
के मध्य इन दोनों आचायों (श्रीषेण और विष्णुचन्द्र) ने ज्यौतिषसिद्धान्त के विशाल
ग्रन्थों की रचना की। इस बात को• स्वयं वेध द्वारा स्थिर करके आचार्य ने ‘यद् भवति
तदूधुणाक्षरम्’ इत्यादि प्रौढोक्ति से पुष्ट किया है।