पृष्ठम्:ब्राह्मस्फुटसिद्धान्तः (भागः ४).djvu/१००

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
एतत् पृष्ठम् अपरिष्कृतम् अस्ति


घनर्णशून्यानां व्यवलनम् ११९१ अत्रोपपत्तिः। यदि धनरूप्यकपञ्वकद्र पकत्रयं घनं विशोध्यते अर्थादल्पं क्रियते तदा रूप्यक द्वयं घनमवशिष्यते । यदि ऋणरूप्यकपञ्चकादृणरूप्यकत्रयमल्पं क्रियते तदा रूप्यकद्वयमृणं स्थास्यति । अथ यस्य रूप्यकपञ्वकं धनमस्ति रूप्यकत्रय मृणमस्ति तदा तदृणस्याधुना विशोधनं जातमर्थाद्येन तदृणं दत्तं तेन न गृह्यते कथ्यते च यदहं तदप्यकत्रयं भवते दत्तवान् तदा तस्य अष्टौ रूप्यकाणि धनं भविष्यति । यदि च रूप्यकपञ्चकमृणं रूप्यकत्रयं च धनं स्यात्तदा तद्प्यकत्रयस्य विशोधनेऽर्थादल्पीकरणे तदप्यक्रत्रयं ऋणात्मकं भविष्यति । तदानीं तस्याष्टौ रूप्य काणि ऋणात्मकानि भविष्यतीति । शेषं स्पष्ट मैवास्ति । सिद्धान्तशेखरे संशोष्य मानं स्वमृणं धनणं धनं भवेदुक्तवदत्र योगः औपत्युक्तमिदं, बीजगणिते ‘सशोध्य मानं स्वमृणत्वमेति स्वत्वं क्षयस्तद्युतिरुक्तवच्च भास्करोक्तमिदंचाऽऽचार्योक्ता नुरूपमेवास्तीति ॥ ३१-३२॥ अब व्यवकलन को कहते हैं। हि. भा–अधिक घन में से अल्प धन को घटाने से श ष घन होता है अचिक ऋण में से अल्प ण को घटाने से शोष ऋण होता है। अल्प धन में अधिक धन को वा अल्पऋण में से अधिक ऋण को घटाने से वह अन्तर विपरीत होता है अर्थात् अधिक धन के घटाने से श ष ऋण होता है । तथा अधिक ऋण के घटाने से श ष वन होता है । क्यों विपरीत होता है सो कहते हैं । ऋण घन होता है, धन ऋण होता है यदि ऋण में से शून्य को घटाते हैं तो ऋण ही रहता है अर्थात् उस ऋणाङ्क में किसी तरह का विकार नहीं होता है । धन में से शून्यको घटाने से शेष घन होता है । शून्य में से शून्य को घटाने से श ष शून्य होता है । यदि ऋणाङ्क में से धनाडू को घटाय जाय वा घनाडु में से ऋणाङ्क को घटाया जाय तब उन दोनों का योग ही अन्तर होता है इति । उपपत्ति । यदि धनात्मक पांच रुपये में से धनात्मक तीन रुपयों को घटाते हैं अर्थात् अल्प करते हैं तो दो रुपये धन शेष रहता है यदि ऋणात्मक पांच रूपयों में से ऋणात्मक तीन रुपयों को अल्प करते हैं तो दो रुपये ऋण रहता है । जिसके पास पांच रूपये वन है और तीन रूपये ऋण है उसके उन तीन रुपयों को घटजाना है लेकिन जिसने तीन रुपये दिये थे वह नहीं लिये कहा कि वह तीनों रुपये आप ही को दे दिये तब उस व्यक्ति के पास आठ रुपये घन हो गया । यदि पांच रुपये ऋण है और तीन रुपये वन है तब उन तीनों रुपयों को विशोधन करने से वे तीनों रुपये ऋण होंगे तब उसको कुल आठ रुपये ऋण होग। शेष विषय स्पष्ट ही है । सिद्धान्त शेखर में ‘संयोज्यमानं स्वमृणं धनर्णामित्यादि' श्रीपयुक्त तथा बीजगणित में ‘संशोध्यमानं स्वगृणत्वमेति’ इत्यादि आस्करोक्त आचयक्त के अनुरूप ही है ।। ३१-३२ ॥