अयं मे वाग्गुम्फो विशदपदवैदग्ध्यमधुरः |
वुनफर बोला-'देव, मैं कालिदास के अतिरिक्त किसी को कवि नहीं मानता। तेरी सभा में काव्य के मर्म को जानने वाला विद्वान् कालिदास के अतिरिक्त कौन है ?
गुरु-कृपारूपी अमृतपाक से उत्पन्न जो सरस्वती वैभव ( काव्य ) है, वह 'कवि को ही प्राप्त होता है, हठपूर्वक कविता पाठ करके प्रतिष्ठा पालने वालों को नहीं । तालाब में दिन भर लोट कर भी केवल सलिल-प्रवाह गॅदला करने वाला मैंसा क्या कमलों की सुगंध प्राप्त कर पाता है ?
उत्तम पदों की विद्वत्तापूर्ण योजना से मधुर, छंदो लालित्य प्रकट करता मेरा काव्यबंध कवि के हृदय को आकृष्ट कर कृतार्थ होता है, अतिरिक्त जन के निकट वह व्यर्थ होता है । अधखुले नयनों की कोर से अद्भुत तिरछे नयनों वाली सुंदरी का कटाक्ष बालक के निकट सारहीन रहता है किंतु तरुण को वह आनंद देता है।
विद्वज्जनवन्दिता सीता प्राह--
विपुलहृदयाभियोग्ये खिद्यति काव्ये जडो न मौर्ख्ये स्वे । |
विद्वानों द्वारा पूजित सीता ने कहा--मूर्ख अपनी मूर्खता पर तो खिन्न नही होता, सहृदयों द्वारा गम्य सत्काव्य पर खिन्न होता है । शुष्क स्तन वाली स्त्री प्रायः चोली की ही निंदा किया करती है ।
ततः कुविन्दः प्राह--
वाल्ये सुतानां स्तुतौ कवीनां समरे भटानाम् । |
ततो राजा 'साधु भोः कुविन्द' इत्युक्त्वा तस्याक्षरलक्षं ददौ । 'मा भैषीः, इति पुनः कुविन्दं प्राह ।