फिर दोषरहित वेदप्रमाण बलिष्ट क्यों नहीं ? इन्द्रिय के
विना प्रत्यक्षं सिद्ध नहीं होता इसलिये तूं जो केवल प्रत्यक्ष
प्रमाण को मानता है वह तुझे सुगम नहीं है । केवल प्रत्यक्ष
'से अन्य का भाव जानने में समर्थ नहीं होगा, इसीसे तेरा
मिथ्या बकवाद ही है ॥३०॥
( यदि ) यदि आत्मा आदिकों के निश्चय करने में तुम्हारे मत में ( एकं प्रत्यक्ष मानम् ) एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है तो (ते ) तुम्हारा (भाषितम् ) कहा हुआ वचन (कथं प्रमाणम्) किस प्रमाण से प्रमाण माना जायगा ( कथय ) यह तुम कहो । भाव यह है कि यदि प्रत्यक्ष ही प्रमाण है तो तुम्हारे मत में तुम्हारे अनेक प्रकार के शरीरों के भरण पोषणादिक का शास्त्र वाक्यां से किसी को बोध नहीं होगा, क्योंकि तुम्हारा शास्त्र रूप वाक्य तो प्रत्यक्ष से भिन्न है । इसलिये तुम्हारी स्वशास्त्र रूप वाक्य प्रमाण रचना में प्रवृत्ति भी उन्मत्त प्रवृत्ति है । इतने कहने से अनुमान प्रमाण भी इस नास्तिक प्रत्यक्षमात्र मानी चार्वाक को
शब्द प्रमाण की तरह बलात्कार से मानना पड़ेगा। क्योंकि अन्यथा इसकी भोजन आदिकों में प्रवृत्ति के अभाव से मरण
प्राप्त होगा । कारण यह है कि अमुक्त भोजन में तृप्ति का प्रत्यक्ष नहीं है, किंतु उससे तृप्ति अनुमेरा ही है, ( सदोपम् ) भ्रम, प्रमाद, दोष सहित ( तदपि ) तुम्हारा कथन रूप शास्त्र वाक्य ( यदि ) यदि ('संभाव्यार्थम् ) निश्चितार्थ वाला है अर्थात् प्रमाण है तो ( विदोष: ) अपौरुषेय होने से अर्थात् पुरुष द्वारा नहीं रचा होने से उक्त भ्रम श्रमादादि दोप रहित ( वेदः किं बली न ) सव प्रमाणों में यह वेद रूप प्रमाण क्या बलिष्ट प्रमाण नहीं है ? अवश्य है । अब अनुमान प्रमाणं भी तुमको अवश्य मानना
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प्रकरण १ श्लो० ३०