अपने जन्म से लेकर कोई दुःखी और कोई सुखी
किस हेतु से होते हैं ? प्रथम प्रवृत्ति किस कारण से होती
है ? शरीर भी किस कारण से होता है ? मरा हुआ क्यों
नहीं जानता ? वैसा स्वभाव ही है ऐसा कहो तो वह
कारण सर्वत्र समान होने से दीप और बीजांकुर के समान
उसका कार्य भी एकसा ही होगा यह सबको विदित है ।
यदि विषमता कर्मजन्य है, ऐसा कहे तो शरीर की उत्पत्ति
के पूर्व श्रात्मा की सिद्धि हुई ॥२६॥
( स्वजन्म प्रभृति ) अपने जन्मकाल से लेकर (कश्चित्
दुःखी ) कोई तो प्रतिकूल वेदनीय लक्षण दुःख वाला ही रहता
( अपर) और कोई दूसरा ( सुखयुतः ) अनुकूल वेदनीय
लक्षण सुख के सहित ही रहता है, ( कस्य हेतोः ) यह सुख
दुःख की व्यवस्था किस कारण से है ? ( आद्या प्रवृत्तिः कस्मात्
हेतोः ) और प्राणियों की पहली स्तन्यपान आदि की प्रवृत्ति भी
किस कारण से होती है ? ( तनुरपि च ) और शरीर भी
( कुतः ) किस कारण से होता है ? ( प्रमीतः ) मरा हुआ (किंन वेत्ति ) क्यों नहीं जानता अर्थात् देहरूप आत्मा मरा हुआ
भी इष्ट अनिष्ट को क्यों नहीं जानता ?
शंका-शरीर ही आत्मा है इस मतमें शरीरों के सुख दुःख की विचित्रता का कारण ( स्वाभाव्यम् ) स्वभाव ही है अर्थात निज निज धर्मवत्त्व ही है ।
समाधान - ( हेतुसाम्ये ) वहां कारण समान होने से
( स्वाभाव्यम् ) स्वभाव भाव अर्थात् निज धर्मवत्त्व भी तो
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प्रकरण १ श्ली० २९