सामग्री पर जाएँ

पृष्ठम्:स्वराज्य सिद्धि.djvu/४३

विकिस्रोतः तः
एतत् पृष्ठम् परिष्कृतम् अस्ति
[ ३५
प्रकरण १ श्लो० १९

इन्द्रिय, इच्छा, प्रयत्नादिक गुणों से रहित ईश्वर है । ऐसा ईश्वर निरवयव तथा नीरूप होने से ही अप्रत्यक्ष ( प्रधानम् ) प्रधान और परमाणुओं को (अधिष्ठातु) प्रवृत्त करने में ( न ईशः ) समर्थ नहीं है और ( चेत् ) यदि ( तनु अक्षवत्त्वम् ) ईश्वर को शरीर इन्द्रियादि (स्यात्) हैं तो ( सुचरित दुरितोद्भूतभोग संगः) ईश्वर में भी जीव की तरह पुण्य पाप की उत्पत्ति से सुख दुख का भोग प्राप्त होगा; क्योंकि शरीर आदिकों को भोग की ही सामग्री नियम से माना है । ( दुःखादयम् ) दुःख प्रधान जगत को ( कुर्वतः ) करते हुए (अस्य) अनवस्था के भय से अन्य किसी नियंता से रहित ऐसे स्वतंत्र इस ईश्वर को (विषमा- चार नै एय दोषः प्रसरति ) विषम सृष्टि करना और निर्दयता यह दोनों दोष प्राप्त होंगे। भाव यह है कि सृष्टि में कोई प्रारणी सुखी प्रकट करके तथा कोई दुःखी प्रकट करके, कोई देवता वना दिया तथा कोई असुर बना दिया, कोई मनुष्य बना दिया कोई गौ बना दिया, कोई घोड़ा बना दिया तथा कोई राजा और कोई प्रजा बना दिया। इस प्रकार नाना प्रकार विना ही कारणां से भेदयुक्त सृष्टी रचने से ईश्वर में विषमता का दोप प्राप्त होगा और अतिदुःखी प्राणियों की रचना करने से निर्दयता का दोष प्राप्त होगा। इन उक्त दोनों दोषों के निवृत्त करने के लिये ( कर्मेप्सोः ) इस ईश्वर को प्राणिओं को सुख दुःख भोग प्राप्त करने में प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा अंगीकार करने पर ( चक्रकावऽस्थिति हति विफलत्वान्यथा सिद्धयः स्युः) चक्रक्र. अनवस्था, ईश्वर स्वीकार की निष्फलता तथा प्रथक् निमित्तकारणा मात्र ईश्वर के विना ही जगत् की सिद्धि, ये सर्व दोष प्राप्त होंगे । जहां प्राणियों के कर्मों से ईश्वर की विविध जगत् रचना में प्रवृत्ति होगी वहां ईश्वर की प्रवृत्ति से फिर उस प्रधान और परमाणुओं की प्रवृत्ति द्वारा जगत् की सृष्टी होगी और उस