आदित्यानामहं विष्णुः वसूनामस्मि पावकः ।
रुद्राणां शङ्करश्चाऽस्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।। ६१ ।।
पुरोधसाञ्च मुख्यं मां वित्त देवाः ! बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ ६२ ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ।। ६३ ।।
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणाञ्च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कंपिलो मुनिः ॥ ६४ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां वित्त माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणाञ्च नराधिपम् ॥ ६५॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ ६६ ॥"
यो में चेतना हूं,॥ ६ ॥ (द्वादश ) आदित्योंमें मैं विष्णु हूं, (अष्ट । वसुओमें पावक हूँ, ( एकादश ) रुद्रोमे शङ्कर हूं और पर्वतोंमें मैं मेरुहूँ ॥६॥ हे देवगण ! मुझको पुरोहितोमे श्रेष्ठ पुरोहित बृहस्पति जानो. सेनानायकोने में स्कन्द (कान्तिकेय) हूँ और जलाशयों में ( मैं ) सागर हूँ॥ ६२ ॥ महर्षियों में मैं भृगु और वाणियोंमें मैं एक अक्षर अर्थात् ॐकार हूँ, यज्ञोंमें जपयज्ञ हूं और स्थावरों में हिमालय हूँ ॥६३॥ सब वृक्षोंमें मैं अश्वत्थ अर्थात् पीपलका वृक्ष हूं, देवर्षियोमें नारद हूं, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धोंमे कपिल मुनि हूं ॥ ६ ॥ अश्वोमें मुझको अमृत अर्थात् अमृत जिससे उत्पन्न हुआ है ऐसे समुद्र.. से उत्पन्न उच्चैःश्रवा जानो, गजेन्द्रोमे ऐरावत और मनुष्योंमें नराधिप अर्थात् प्रजाओंको प्रसन्न रखनेवाला नृप जानो ॥६५॥ मैं वैश्वानरनामक अग्नि होकर प्राणियों के देहको आश्रय करके प्राण और अपान वायुओंसे युक्त होता हुआ चतुर्विध ( लेह्य चूष्य पेय आदि)