पृष्ठम्:भोजप्रबन्धः (विद्योतिनीव्याख्योपेतः).djvu/२८

विकिस्रोतः तः
Jump to navigation Jump to search
एतत् पृष्ठम् परिष्कृतम् अस्ति
भोनप्रवन्धः


ग्रामे प्रामे कुटी रम्या निझरे निर्भरे जलम् ।
भिक्षायां सुलभ न्वान्नं विभवः किं प्रयोजनम् ।।४६॥

 देव, अस्माकं नैको देशः । सकलभूमण्डलं भ्रमामः । गुलपदेशे तिष्ठामः । निखिलं भुवनतलं करतलानलकवत्पश्यामः । सर्पदष्टं विष- व्याकुलं रोगग्रस्तं शस्त्रभिन्नशिरस्कं कालशिथिलितं तात, तत्क्षणादेव विगतसकलव्याधिसञ्चयं कुर्मः इति ।

 योगी ने कहा--शिव के कल्याणकारीतत्त्वार्थ को जानने वाले योगी पुरुषों का प्रत्येक देश में घर है और प्रत्येक घर में ही मिक्षा का अन्न है और सरोवर और नदी में जल हैं।

 गाँव-गाँव में रमणीय कुटी है, प्रत्येक झरने में जल है, भिक्षा में अन्न सरलता से प्राप्य है। उन्हें ऐश्वयों से क्या प्रयोजन !

 देव, हमारा एक देश नहीं है । समस्त भूमंडल में भ्रमण करते हैं । गुरु के उपदेश पर विश्वास करते हैं । संपूर्ण भुवनमंडल को हथेली पर बरे आँवले के समान देखते हैं। साँप के काटे, विप से छटपटाते, रोगी, शस्त्र द्वारा कटे सिर वाले, मौत से ठंडे पड़े को हे तात, हम क्षण भर में संपूर्ण रोगों से रहित कर देते हैं।

 राजापि कुड्यन्तहित एव श्रुतसकलवृत्तान्तः सभामागतः कापा- लिक दण्डवत्प्रणम्य, योगीन्द्र, रुद्रकल्प, परोपकारपरायण, महापा- पिना मया हतस्य पुत्रस्य प्राणदानेन मां रक्ष' इत्याह । अथ कापालिकोऽपि 'राजन् , मा भैषीः। पुत्रस्ते न मरिष्यति । शिवप्रसादेन गृहमेष्यति । परं श्मशानभूमौ बुद्धिसागरेण सह होमद्रव्याणि प्रेषय' इत्यवोचत् । ततो राज्ञा 'कापालिकेन यदुक्तं तत्सर्वं तथा कुरु' इति बुद्धिसागरः प्रेषितः।

 नोट में खड़ा राजा भी समस्त वृत्तांत सुन कर सभा में आ गया और कापालिक को दंडवत् प्रणाम करके वोला--'रुद्र के समान, परोपकार में लग्न योगिराज, मुझ महापापी द्वारा मार डाले गये पुत्र की रक्षा उसे प्राण देकर कीजिए।' कापालिक ने भी कहा-'राजन्, मत डर । तेरा पुत्र नहीं मरेगा। शिव के प्रसाद से घर आयेगा। परंतु श्मशान भूमि में बुद्धिसागर के